तीसरा मार्ग1 मिनट
सामान्य शिष्यों का गॉस्पेल मूवमेंट
जेम्स पॉल
समर्पण
मेरे माता-पिता, पॉल पापाराव और रव रत्नकुमारी को — जिन्होंने तीसरे मार्ग को यह नाम मिलने से पहले ही जी लिया और मुझ तक पहुँचाया।
आरंभिक वचन
परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है कि ज्ञानवानों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है कि बलवानों को लज्जित करे। और परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्छों को, वरन् जो हैं भी नहीं, उन को भी चुन लिया, कि उन्हें जो हैं, व्यर्थ ठहराए।
— 1 कुरिन्थियों 1:27-28
परिचय6 मिनट
1878 में, आंध्र प्रदेश के ओंगोल में एक बात हुई। जिन लोगों को समाज ने नीची निगाह से देखा था, जिनके पास न कोई योग्यता थी न कोई ओहदा, उन लोगों ने यीशु को पाया। और पाने के बाद वे उसे अपने भीतर छिपाकर नहीं रख सके। उनके पास न बड़े मंच थे, न पैसा। फिर भी सुसमाचार नहीं रुका। एक सामान्य आदमी ने जो उसे मिला था, वह दूसरे सामान्य आदमी को बता दिया। सुनने वाला जाकर अपने लोगों को बता आया। इस तरह कहते-कहते, एक से दूसरे तक, एक घर से दूसरे घर तक, सुसमाचार फैलता चला गया। हमारे परिवार में विश्वास भी इसी राह से आया। और उसी राह से सुसमाचार को पूरे भारत में फैलते हुए मैं जीवन भर अपनी आँखों से देखता आया हूँ।
इस पुस्तक में जिसे तीसरा मार्ग कहते हैं, वह यही राह है। यही गॉस्पेल मूवमेंट है। मतलब यह कि सामान्य लोग पहचानें कि यीशु कौन है, उसकी आवाज़ सुनें, उसकी आज्ञा मानें, और दूसरों को भी ऐसा करने में मदद करें। यह कोई ऐसा काम नहीं जो सिर्फ़ बड़े लोगों से हो सके; यह वह काम है जो हम जैसे मामूली लोग कर सकते हैं। बस इतना ही।
लेकिन जहाँ कहीं सुसमाचार का काम ज़ोर पकड़ता, वहाँ विशेषज्ञ आ जाते। वे अच्छी नीयत से ही आए। वे इस काम से प्रेम करते थे, इसलिए चाहते थे कि यह सँभलकर आगे बढ़े। वे जानना चाहते थे कि सचमुच यीशु के पास आए लोग कितने हैं और काग़ज़ पर ही बढ़े हुए आँकड़े कितने। वे यह भी चाहते थे कि जिन्हें उन्होंने भेजा है, वे थककर गिर न जाएँ। इसी फ़िक्र से वे रणनीतियाँ बनाते गए, सिद्धांत लिखते गए, तरीक़े, चरण और पैमाने गढ़ते गए। ये सब मदद के लिए ही पैदा हुए थे। इनमें से कई साधन मैंने भी काम में लिए। कुछ को सचमुच काम आते हुए देखा भी।
पर जैसे-जैसे साल बीते, ये सारे साधन एक के ऊपर एक चढ़ते गए और आख़िर में एक ऊँची मीनार बन गए। अब एक सामान्य विश्वासी उस मीनार की ओर सिर उठाकर देखता है। देखकर वह सोचता है कि यीशु की दी हुई महान आज्ञा शायद प्रशिक्षित और अभिषिक्त लोगों के लिए है — और "यह मेरे बस की बात नहीं" कहकर पीछे हट जाता है। मेरा दुख यह नहीं कि हमने वह मीनार बनाई। मेरा दुख यह है कि बनाते-बनाते हम नीचे के उस हिस्से में एक दरवाज़ा खुला छोड़ना भूल गए, जहाँ सामान्य विश्वासी खड़ा है।
इसीलिए इतने वर्षों की सेवकाई में मैंने लगातार एक ही काम किया है। जटिल साधनों और सामग्री को उनके सार तक निचोड़ा। और जिनके मन में तुरंत काम शुरू करने की चाह है, उनके हाथ में जितना हो सके उतने सरल रूप में रखता गया।
सरल समझ कितनी ज़रूरी है, यह मुझे अपने अनुभव से पता है। सगाई तय होने के बाद, भारत से इतनी दूर का सफ़र करके पहली बार अमेरिका आया हुआ लड़का था मैं। अमेरिका में, होने वाले सास-ससुर के घर के बाहर मैंने पहला खाना पास्टर साहब के घर ही खाया। टाको नाम की उस चीज़ को मैंने वैसे ही खाने की कोशिश की जैसे हम अपने यहाँ चपाती खाते हैं: रोटी को टुकड़ों में तोड़ा और उनसे ग्रेवी लगाकर खा लिया। टाको को कैसे मोड़कर पकड़ना और खाना है, यह किसी ने प्रेम से दिखा दिया। उसके बाद से मैं ठीक से ही खा रहा हूँ। मुझे बड़े-बड़े पाठ नहीं चाहिए। सबसे सरल समझ भर मिल जाए, फिर मैं काम शुरू कर सकता हूँ।
सुसमाचार के काम को ज़रूरत से ज़्यादा जटिल बना देना किसी एक देश की बात नहीं; यह हर जगह, हर लोगों के बीच होता आया है। कुछ समाजों में अच्छी जानकारी भरपूर उपलब्ध है। किताबों पर किताबें, प्रशिक्षण, पॉडकास्ट। फिर भी इनसे सामान्य विश्वासी को बल मिलने के बजाय अक्सर ऐसा लगता है जैसे वह पहला क़दम भी नहीं उठा सकता। सच तो यह है कि उस विश्वासी को और जानकारी नहीं चाहिए। उसे बस इतना चाहिए कि बात इतनी सार तक निचुड़ी हो कि वह इसी हफ़्ते काम शुरू कर सके।
सरल रखिए।
पर एक बात: सरल का मतलब आसान नहीं है, और क्रूस से बचकर निकलने का रास्ता तो बिल्कुल नहीं। फिर भी इतने वर्षों में मैंने जो देखा वह एक ही है। सामान्य लोगों को कटनी के काम से दूर रखने वाली कभी यह सरल राह नहीं रही; दूर रखा है काम को ज़रूरत से ज़्यादा जटिल बना लेने की हमारी अपनी आदत ने।
यह पुस्तक सामान्य शिष्य के लिए ही लिखी गई है। वह व्यापारी हो सकता है, स्विमिंग कोच हो सकता है, स्कूल का विद्यार्थी हो सकता है, रिटायर हो चुका कोई बुज़ुर्ग हो सकता है। सेवकाई में उसके पास न कोई डिग्री हो, न कोई ओहदा। पर वह यीशु से प्रेम करता है। इधर कुछ दिनों से उसके मन में कुछ चल रहा है, पर वह बता नहीं पाता कि क्या। वह सोचने लगा है कि अब तक उसे जो मसीही जीवन सिखाया गया, क्या बस इतना ही है। वह अपनी भोजन की मेज़ पर बैठे लोगों को, अपनी गली के लोगों को नई नज़र से देखने लगा है। यह पुस्तक उसी के लिए है।
जो अगुवे वर्षों से इस काम में हैं और भूल चुके हैं कि आज्ञा मानना कभी कितना सरल हुआ करता था — यानी वे मूवमेंट अगुवे जो मूवमेंट को सुलगाकर आगे ले चलते हैं — उनके लिए दूसरी पुस्तक आ रही है। पर अगुवा हो या नया आदमी, शुरुआत सबकी यहीं से होती है।
इस पुस्तक को धीरे-धीरे पढ़िए। हर अध्याय पर एक पल रुकिए, और प्रभु से ही पूछिए कि वह आपसे क्या कह रहा है। आज्ञा मानने के अगले क़दम के रूप में वह जो दिखाए, वही कीजिए।
जेम्स पॉल चिनूक, मोंटाना 4 जुलाई 2026
इन पन्नों को पढ़ते हुए कहीं आपके मन में एक चाह उठ सकती है: दूसरों की मदद करने की चाह, ताकि वे भी वही करें जो यह पुस्तक कहती है। उसके लिए एक साथी पुस्तक है: The Making of a Movement Catalyst (मूवमेंट अगुवे की तैयारी)। अभी उसे एक तरफ़ रख दीजिए। यह पुस्तक आपके लिए है। आज आप जहाँ हैं, वहीं से इसे शुरू कीजिए।
भूमिका10 मिनट
वॉरेन और रूथ के घर का भोज
मई 2026 की एक शुक्रवार की रात, अमेरिका के पसाडेना नाम के शहर में हो रहे एक भोज के लिए मैं अपने दो दोस्तों के साथ निकला। जाते हुए भी मेरे मन में वही सवाल घूम रहा था जिसका जवाब उस पूरे हफ़्ते हमारे अगुवों की सभा में हममें से कोई नहीं दे पाया था।
कार में जाते हुए, रास्ते में हम हाईवे से मुड़कर अल्टाडेना नाम की जगह में गए। एक शांत गली में, कार चला रहे मेरे दोस्त ने रफ़्तार धीमी की और एक घर की ओर इशारा किया। वह जैकी और उनके पति ऐलन का घर था।
वह जगह ख़ाली पड़ी थी। जनवरी की उस बड़ी आग ने सब कुछ राख कर दिया था। उस गली में जहाँ कभी घर थे, वहाँ अब जली हुई दीवारों के अवशेष ही खड़े रह गए थे। बग़ल का घर एक तरफ़ से जला हुआ था। जिस कैनसस सिटी में मैं रहता हूँ, वहाँ रहते हुए मैंने उस आग की ख़बर देखी थी, पर मुझे यह नहीं पता था कि जले हुए घरों में एक जैकी का भी है। एक पल हम कार में ही बैठे रह गए। घास भर नई उग आई थी, बाक़ी सब चला गया था। बचा हुआ रास्ता हम बिना ज़्यादा बोले तय करते रहे।
उस रात के भोज के लिए हमें बुलाया था वॉरेन और उनकी पत्नी रूथ ने। नवंबर में वॉरेन हमारे साथ भारत आए थे। वे और रूथ मेरे साथ गाँव-गाँव घूमे, उन दूर-दराज़ इलाक़ों तक भी आए जहाँ पहुँचना मुश्किल है। रूथ को चलने के लिए वॉकर का सहारा चाहिए। फिर भी वे दोनों आए।
मैं उनके घर तीसरी बार आया था। पहली बार जब आया था, तब बारिश में घर के पीछे जो हुआ, उसे मैं आज तक पूरी तरह समझा नहीं सकता। स्विमिंग पूल के ऊपर बिजली चमकी। उसी पल, शब्दों में न आने वाली प्रभु की उपस्थिति ने हमें घेर लिया। बाद में उन्होंने मुझे बताया कि हमारे एक दोस्त को, जिन्हें स्वर्गदूतों को देखने का वरदान है, उस घर में स्वर्गदूत दिखे थे। तब मुझे समझ आया कि वह मेरा भ्रम नहीं था।
हम पहुँचे तो वॉरेन दरवाज़े पर ही आगे बढ़कर मिले और हमें प्रेम से भीतर बुलाया। कुछ ही मिनटों में ऐलन और जैकी भी आ गए। थोड़ी देर पहले रास्ते में हमने जो जला हुआ घर देखा था, वह इन्हीं का तो था। इतनी तकलीफ़ के बीच भी उनका उस भोज में आना मुझे भीतर तक छू गया।
भोज में लेबनान के व्यंजन परोसे गए। यह कोई प्रार्थना सभा नहीं थी, दोस्तों का साथ बैठकर खाना था। और उस रात जो कुछ हुआ, वह मेज़ के चारों ओर बैठकर खाते-खाते ही हुआ। हाँ, वॉरेन नहीं चाहते थे कि वह शाम बस गरम खाने और हल्की-फुल्की बातों में ख़त्म हो जाए, इसलिए उन्होंने हममें से एक से कहा कि बातचीत को आगे बढ़ाए। मेरे दोस्त ने उसे आगे बढ़ाया, पर किसी को यह लगा तक नहीं कि वह कुछ चला रहा है। यही उसका तरीक़ा है। इस तरह खाते हुए, बातें करते हुए, एक-एक करके हम सबने अपनी-अपनी बात रखी।
पहले जैकी बोलीं। जैकी पास्टर नहीं हैं, कलीसिया की एक मामूली सदस्य हैं। वर्षों तक उन्होंने अपने घर के दरवाज़े खोलकर, पहले घर में ही और फिर अपनी कलीसिया में, एक ट्रेनिंग ग्रुप चलाया। सैकड़ों सामान्य शिष्यों ने उसमें प्रशिक्षण पाया। उस आग में घर जल जाने के बाद भी उन्होंने गॉस्पेल मूवमेंट में आगे बढ़ना नहीं छोड़ा। जैकी की बात ख़त्म होने पर ऐलन ने बात उठाई। जिस डिस्कवरी ग्रुप में वे हैं, उसने उनमें नया उत्साह भर दिया है। उनकी कलीसिया में कार्ली नाम की एक महिला है। लोगों को जोड़ लेना उसका सहज स्वभाव है। हर शुक्रवार की रात वह कुछ दोस्तों को पिकलबॉल नाम का खेल खेलने के लिए एक जगह इकट्ठा करती है। ऐलन ने उससे कहा कि वह प्रार्थना करे — क्या उन्हीं दोस्तों के बीच एक डिस्कवरी ग्रुप शुरू किया जा सकता है। कार्ली ने जाकर उनसे पूछा। पूछते ही दस लोग तैयार हो गए। उसका कोई नाम नहीं है, वह कलीसिया का कार्यक्रम नहीं है, किसी की अपनी चीज़ नहीं है। फिर भी तब से वह बढ़ता ही जा रहा है। यह बात पूरी कहने लायक़ है। आगे मैं आपको पूरी कहानी बताऊँगा।
फिर जॉन और उनकी पत्नी जूडी बोले। वे मेरे प्रिय दोस्त हैं। बहुत साल पहले जॉन के माता-पिता भारत में मिशनरी थे। पर जॉन न मिशनरी हैं, न पास्टर। वे एक व्यापारी हैं, एक सामान्य शिष्य। वे दोनों अपने घर में ही बैठे-बैठे, लैपटॉप पर, दूर अफ़्रीका में बैठे दोस्तों से वीडियो कॉल पर बात करते हुए उन्हें गॉस्पेल मूवमेंट में आगे ले जा रहे हैं।
फिर मेरे दोस्त क्रिस ने बात रखी। वे और मैं अभी-अभी अफ़्रीका से साथ लौटे थे। उन्होंने वहाँ की गवाहियाँ सुनाईं: परमेश्वर पूरे महाद्वीप में अगुवे खड़े कर रहा है। कितने ही घरों में सुसमाचार उतना ही सहज होता जा रहा है जितनी साँस। शिष्य नए शिष्य बना रहे हैं। वे नए शिष्य फिर और लोगों को बना रहे हैं। भारत भर में परमेश्वर जो कर रहा है, उसके बारे में मैंने बताया। उनमें से एक थी शेरोन की गवाही। शेरोन एक पास्टर की पत्नी हैं। पच्चीस साल से यीशु के साथ चल रही हैं। फिर भी उनके ज़रिए यीशु के पास आने वाले थोड़े ही थे। फिर उन्होंने अपनी पाँच सहेलियों के साथ मिलकर एक डिस्कवरी ग्रुप शुरू किया। वह ग्रुप बढ़ता गया और नब्बे से ज़्यादा शिष्य बन गए। ग्रुप से ग्रुप जन्म लेते गए और वह चार पीढ़ियों तक चला।
आख़िर में वॉरेन बोले। उन्होंने उन विश्वासियों के बारे में बताया जो ऐसे इलाक़ों में, जहाँ सुसमाचार अभी पहुँचा नहीं है, सपनों और दर्शनों के ज़रिए यीशु के पास आए। वे यीशु से बड़े-बड़े हॉलों में नहीं मिले। रसोईघरों में, दुकानों में, घरों में ही मिले। बोलते-बोलते उन्होंने अलमारी से उन विश्वासियों की गवाहियों की एक किताब निकालकर मेरे हाथ में रख दी।
इस तरह उस भोज की मेज़ पर, दुनिया के चारों कोनों से मैंने एक ही तरह की गवाही सुनी। परमेश्वर हर जगह एक ही तरह से काम कर रहा है। वे गवाहियाँ सुनते-सुनते ही, पूरे हफ़्ते मेरे मन में इधर-उधर घूम रहा वह सवाल एक जगह आकर बैठ गया।
उस रात परमेश्वर ने मुझे कोई नई परिभाषा नहीं दी। वर्षों से मैं जो चार आदतें बताता आया हूँ, वही थीं: सामान्य शिष्य, परमेश्वर की आवाज़ सुनना, परमेश्वर की आज्ञा मानना, दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। इनमें कुछ नया नहीं जुड़ा। उस रात परमेश्वर ने मुझे जो दिया, वह इन चारों को देखने की एक नई नज़र थी।
उसका नाम: जीवन-शैली।
इतने बरस सेवकाई में हम नतीजे गिनते आए। कितनी कलीसियाएँ, कितने ग्रुप, कितनी पीढ़ियाँ — हिसाब लगाते आए। नतीजे सच हैं, गिनना काम की चीज़ है। पर हमारी नज़र वहाँ नहीं थी जहाँ होनी चाहिए थी। सचमुच ख़ुश होने की बात वे संख्याएँ नहीं हैं; बात यह है कि सामान्य शिष्य उन चार आदतों को अपनी रोज़ की ज़िंदगी बनाकर जी रहे हैं। उस भोज में मौजूद हर एक व्यक्ति वैसे ही जी रहा था। उनके लिए वही मामूली मसीही जीवन है। असली सफलता यही है।
उस मेज़ पर बैठा हर एक उसी जीवन-शैली में था। उस रात हमने उस पर न कोई शिक्षा दी, न प्रवचन। अपनी ज़िंदगी की सबसे सहज बात की तरह हमने उसे एक-दूसरे से बाँटा। उस मेज़ पर कुछ लोग ऐसे सामान्य शिष्य थे जिनके पास सेवकाई का कोई ओहदा नहीं: वर्षों तक अपने घर में ट्रेनिंग ग्रुप चलाने वाली एक महिला; अपने घर के कमरे से लैपटॉप पर अफ़्रीका के दोस्तों को शिष्य बनाता एक जोड़ा। उस रात बातों में जिन पिकलबॉल खिलाड़ियों का ज़िक्र आया, वे भी वैसे ही सामान्य शिष्य हैं। हम बाक़ी सब पूर्णकालिक सेवक थे।
पर जैसे-जैसे एक-एक करके लोग कहते गए, पूर्णकालिक सेवकों और सामान्य शिष्यों के बीच का फ़र्क़ मिटता चला गया। हम सब हर हफ़्ते आम तौर पर यही करते हैं: परमेश्वर की आवाज़ सुनना, उसकी आज्ञा मानना, दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। हम गॉस्पेल मूवमेंट के बारे में बाहर से बात नहीं कर रहे थे। हम उसके भीतर ही हैं, और वह हमारे भीतर है। तीसरा मार्ग हमारा मामूली मसीही जीवन बन चुका है। साँस ले रहे हैं, यह हमें याद ही कहाँ रहता है। वह भी वैसे ही हमारी ज़िंदगी में घुल गया है। जीवन-शैली का मतलब यही है।
उस रात परमेश्वर ने मुझे जो वचन दिया, वह यही है। तब से हर जगह मैं यही कहता आ रहा हूँ।
गॉस्पेल मूवमेंट का मतलब है — सामान्य शिष्यों का परमेश्वर की आवाज़ सुनना, उसकी आज्ञा मानना, और दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना; जब तक कि यही मामूली मसीही जीवन न बन जाए।
यह मामूली मसीही जीवन बन गया है, यह कब पता चलेगा? जब यह आपके लिए खाना खाने और साँस लेने जितना मामूली हो जाए।
अब उस सवाल पर आता हूँ जिसका ज़िक्र शुरू में किया था।
उस भोज से पहले पूरे हफ़्ते, कैलिफ़ोर्निया के तट पर हुई हमारी वार्षिक सभा में मैं सेवकाई के कुछ अगुवों के साथ था। मेरे दोस्त नॉरिस के पीछे एक ही सवाल पड़ा हुआ था: "सचमुच गॉस्पेल मूवमेंट का मतलब क्या है?" हम सबकी ज़ुबान पर एक परिभाषा रटी हुई थी: शिष्यों का नए शिष्य बनाते जाना, चार पीढ़ियों तक चलना, सौ ग्रुप तक बढ़ना। परिभाषा ज़ुबान पर तो थी, पर उससे उनके मन को चैन नहीं मिला। क्योंकि वे यह तय ही नहीं कर पा रहे थे कि वे ख़ुद सचमुच किसी गॉस्पेल मूवमेंट के भीतर हैं या नहीं। इसीलिए हर सुबह वही सवाल किसी न किसी रूप में पूछते रहे। हममें से कोई भी उन्हें साफ़ और सरल जवाब नहीं दे सका। शुक्रवार दोपहर तक भी उस सवाल का जवाब मिले बिना सभा ख़त्म हो गई। वही सवाल मन में लिए मैं पसाडेना के लिए निकला।
उस हफ़्ते मैं दो मेज़ों पर बैठा। एक, दफ़्तर की मीटिंग की मेज़। इसी काम को ज़िंदगी बना चुके हम सब उस मेज़ के चारों ओर बैठकर हफ़्ते भर रणनीतियों पर बात करते रहे। फिर भी गॉस्पेल मूवमेंट का मतलब एक वाक्य में नहीं कह सके। दूसरी, खाने की मेज़। जैकी, ऐलन, जॉन और जूडी ने उसे परिभाषित करने की कोशिश तक नहीं की। वे उसे बेहद सहज ढंग से जी रहे हैं। आख़िरकार नॉरिस के सवाल का जवाब उस मीटिंग की मेज़ पर नहीं मिला, खाने की मेज़ पर मिला। दफ़्तर के कमरे में नहीं, एक घर में मिला। स्टाफ़ के बीच नहीं, दोस्तों और परिवार के बीच मिला। हफ़्ते भर ढूँढ़ने पर भी जो बात नहीं मिली, वह साथ खाना खाते हुए, संगति करते हुए, उसी मामूली भोज में मुझे मिल गई। यह सिद्धांत नहीं है, कार्यक्रम नहीं है। यही वह जीवन-शैली है।
उबर लेकर हवाई अड्डे पहुँचा और रात ग्यारह बजे की उड़ान से घर की राह पकड़ी। नीचे लॉस एंजेलिस की रोशनियाँ दूर होती जा रही थीं, और मुझे साफ़ हो गया कि एक पुस्तक लिखनी है। वह पुस्तक नहीं जो दस साल से मेरे मन में थी — यह उससे सरल पुस्तक है। इन दिनों मैं इसे तीसरा मार्ग कहता हूँ। वह नाम क्यों, यह बताता हूँ।
पिछले ढाई सौ वर्षों में, यीशु की दी हुई महान आज्ञा को पूरा करने का काम ज़्यादातर दो मार्गों से हुआ है। पहला मार्ग: मिशनरी संस्था। दूसरा मार्ग: पूर्णकालिक सेवकों द्वारा स्थापित स्थानीय कलीसिया। ये दोनों बेहतरीन हैं, परमेश्वर के दिए हुए हैं। पर ये काफ़ी नहीं हैं। शुरू से ही एक तीसरा मार्ग भी रहा है: सामान्य शिष्य। वे जहाँ पहले से रह रहे हैं, वहीं, परमेश्वर ने जिन लोगों को उन्हें सौंपा है उनके साथ, अपने सामने पड़े छोटे-से काम को करते रहते हैं। तब तक करते रहते हैं जब तक आस-पास के सब लोगों के लिए वही मामूली जीवन न बन जाए। पहले दोनों मार्ग इसीलिए हैं कि इस तीसरे मार्ग का सहारा बनें। यह बात हम भूल गए। आपके हाथों में जो यह पुस्तक है, वह भूली हुई उस बात को फिर से याद करने की एक छोटी-सी कोशिश ही है।
उस भोज की मेज़ पर मैंने जैसी गवाहियाँ सुनीं, वैसी एक गवाही आपकी ज़िंदगी भी बन सकती है।
पहला अध्याय24 मिनट
दो मार्ग, और वह तीसरा मार्ग जो शुरू से था
पिछले मार्च में, मैं और मेरी बड़ी बेटी सिमोना कार से अमेरिका के कैनसस राज्य के एक छोटे-से क़स्बे के लिए निकले। किससे मिलने गए थे, पता है? उन्नीस साल के एक लड़के से मिलने।
यह बात उससे चौदह महीने पहले की है। कोरी मेरा दोस्त है। युवाओं के लिए "ज़ीरो आवर" नाम की एक सेवकाई चलाता है। हर साल मिसूरी राज्य के एक बाइबल कैंप की जगह पर वह यूथ कैंप कराता है। उस कैंप में मैं और मेरी पत्नी गए थे। कोरी ने मुझसे वहाँ एक क्लास लेने को कहा। कुल मिलाकर एक घंटा। दस मिनट में मैंने अपनी गवाही सुनाई। बीस मिनट में विद्यार्थियों को तीन-चार के समूहों में बाँटकर, लूका के दसवें अध्याय पर डिस्कवरी ग्रुप कैसे होता है, यह उन्हीं से करवाकर दिखाया। बाक़ी आधे घंटे में स्लाइड दिखाते हुए उनके सवालों के जवाब दिए। बस इतना ही। सिर्फ़ एक घंटा। (डिस्कवरी ग्रुप क्या है और उसमें कौन-से सवाल पूछे जाते हैं, यह अगर आपने अब तक नहीं देखा, तो चौथे अध्याय में सब विस्तार से है।)
कैंप ख़त्म होने के दो दिन बाद, वे विद्यार्थी अपने ग्रुप चैट में, कैंप में लिखे अपने "मैं करूँगा" संकल्प एक-एक करके पोस्ट करने लगे। उनमें से एक मेरे मन में रह गया। एवा नाम की एक लड़की ने लिखा कि जो उसने सीखा है वह अपनी सहेली तक पहुँचाएगी, और सही समय आने पर उसके साथ एक डिस्कवरी ग्रुप शुरू करेगी। उस सहेली के लिए वह पहले ही एक बाइबल ख़रीद चुकी थी।
वह बाइबल उसने कैंप ख़त्म होने के अगले ही दिन ख़रीदी थी। यानी अपना "मैं करूँगा" संकल्प लिखने से भी पहले।
पर कार लेकर जिससे मिलने मैं गया, वह डैनी था।
डैनी उन्नीस साल का है। मैं जिस कैनसस सिटी में रहता हूँ, वहाँ से आधे घंटे की दूरी पर एक छोटे क़स्बे का लड़का। उस यूथ कैंप में मैंने जो क्लास ली थी, उसी में लूका 10 वाले प्रैक्टिस ग्रुप में वह बैठा था। यूथ कैंप से घर लौटते समय उसके हाथ में कोई किताब नहीं थी, किसी की कोचिंग नहीं थी। उसने किसी से इजाज़त नहीं ली। फिर भी घर पहुँचते ही, अपने आस-पास पहले से मौजूद अपने ही लोगों के साथ बाइबल खोलकर उसने एक डिस्कवरी ग्रुप शुरू कर दिया।
यह बात मेरे कानों तक पहुँचते-पहुँचते, तीन डिस्कवरी ग्रुप चल रहे थे। पहले ग्रुप के पीछे-पीछे, बिना किसी के कहे, दूसरा और तीसरा भी उसने ख़ुद ही शुरू कर दिया।
यह बात मुझे इतना छू क्यों गई, इसका एक कारण है। कारण है वह क़स्बा जहाँ डैनी रहता है।
डैनी के यूथ कैंप जाने से दो साल पहले, उसी क़स्बे की एक घरेलू कलीसिया की पास्टर ने मुझे एक रविवार सुबह प्रचार करने बुलाया था। वे एक विश्वासयोग्य स्त्री हैं। कितने ही उतार-चढ़ावों में उन्होंने उस कलीसिया को आँख की पुतली की तरह सँभालकर चलाया है। पर मैंने उनसे एक बात पूछी: प्रचार के बजाय, क्या मैं कलीसिया को डिस्कवरी ग्रुप से परिचित करा सकता हूँ? वे मान गईं। उस सुबह मैंने प्रचार नहीं किया। पूरी कलीसिया को पाँच छोटे ग्रुपों में बाँटकर सबसे डिस्कवरी ग्रुप करवाया। उस सुबह के बाद एक-दो ग्रुप शुरू तो हुए, पर कुछ ही दिनों में बंद हो गए।
उसी क़स्बे में, मिसूरी के यूथ कैंप से लौटे एक उन्नीस साल के लड़के के हाथों अब तीन ग्रुप चल रहे हैं।
यह बात पास्टर के कानों तक पहुँची। उन्होंने मुझे फ़ोन पर संदेश भेजा और पूछा कि क्या हम चारों — यानी वे, डैनी, मैं, और मेरे साथ आने वाली सिमोना — एक बार मिल सकते हैं?
इसीलिए पिछले मार्च में सिमोना और मैं उस क़स्बे के लिए निकले। इस अध्याय की शुरुआत में जिस सफ़र का ज़िक्र किया, वह यही है। एक कॉफ़ी शॉप में डैनी और पास्टर के साथ हम घंटे भर बैठे। डैनी ने जो तीन ग्रुप शुरू किए हैं, वे उस समय के पास्टर के ग्रुपों की तरह बंद न हो जाएँ, इसके लिए साथ खड़े होकर कोचिंग देने वाली एक टीम कितनी ज़रूरी है — यह मैंने उन दोनों को समझाया।
उस पूरे घंटे में डैनी में भरोसा और सहजता दिखी। वह कुछ जता नहीं रहा था। पास्टर के चेहरे पर ख़ुशी थी और राहत भी। दो साल से वे इस दुख में थीं कि अपने ही क़स्बे में उन्होंने जो बीज बोए, वे उगे ही नहीं। अब डैनी के हाथों में कटनी दिखी तो वे बहुत ख़ुश हुईं।
तो फिर पास्टर के हाथों में जो रुक गया, वह डैनी के हाथों में क्यों टिक गया? तब से यह सवाल मेरे मन में घूमता रहा है। उनमें विश्वास की कोई कमी नहीं। प्रभु से प्रेम में तो कमी बिल्कुल नहीं। बहुत सोचने के बाद जो ईमानदार जवाब मुझे मिला, वह यह है: दोनों के हाथों में वही चार आदतें थीं। वे चार ये हैं: सामान्य शिष्य, परमेश्वर की आवाज़ सुनना, परमेश्वर की आज्ञा मानना, दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। डिस्कवरी ग्रुप में भी यही चार होते हैं। पर दोनों ने उन्हें पकड़ा अलग-अलग तरीक़े से। पास्टर ने उन्हें एक ऐसा साधन समझा जिसे ज़रूरत पड़ने पर काम में लाया जाए। डैनी ने उन्हें अपनी जीवन-शैली बना लिया। वही चार आदतें, वही क़स्बा। पकड़ने का तरीक़ा भर दो तरह का। इसमें पास्टर की कोई ग़लती नहीं। उन्हें जो सिखाया गया था, वे उसी रास्ते पर चलीं। कामों के बोझ में दबे पास्टर के हाथ में सबसे पहले साधन ही आते हैं। यही उन्हें सिखाया गया था। उस लड़के तक तो अभी कोई प्रशिक्षण पहुँचा ही नहीं था। वह गया और उन चार आदतों को आदत की तरह जी लिया, बस इतना।
एक बार इन दोनों को साथ रखकर देखिए। दो साल पहले उन पास्टर के हाथ में जो साधन आया था, वही अब इस कैनसस क़स्बे के लड़के के हाथ में आया। पास्टर के हाथ में वह रुक गया। रुके हुए उस काम को वे फिर से उठा नहीं सकीं। और उस लड़के ने दो ग्रुप और शुरू कर दिए।
आख़िर में बात यह निकली: उस क़स्बे में इस काम को टिकाया कलीसिया नाम की व्यवस्था ने नहीं। उन्नीस साल के एक लड़के ने इस काम को टिकाया।
तभी, महीनों से मेरे भीतर बढ़ता आ रहा वह सवाल मेरे सीने में गहरे धँस गया।
अब यह क्यों टिक रहा है?
घर लौटते पूरे रास्ते मैं उसी के बारे में सोचता रहा। उसके बाद कितने ही सफ़रों में वह सोच मेरे साथ-साथ चली। सच कहूँ तो पंद्रह साल से मैं इस सवाल के साथ जी रहा हूँ। जवाब इतने बरसों तक मुझे मिला ही नहीं। आख़िरकार, उस कैनसस के लड़के से मिलने के बाद वह जवाब मुझे साफ़ दिखा। जवाब यह है: जब तक यह काम थोड़े-से लोगों के हाथ में एक साधन बना रहेगा, तब तक रुकता रहेगा। जब यह सामान्य शिष्यों की जीवन-शैली बन जाता है, तब टिका रहता है।
थोड़ी देर में मैं विलियम कैरी के बारे में और डोनाल्ड मैकगैवरन के बारे में बताने वाला हूँ। पर उन नामों तक जाने से पहले आपको यह जान लेना चाहिए कि ये बातें लिख कौन रहा है।
मैं मिशन के काम में ही जन्मा और पला-बढ़ा। हमारे परिवार में यह पाँच पीढ़ियों की बात है। मेरे नाना-नानी ने एक स्थानीय मिशन चलाया — यानी अपने ही लोगों का चलाया हुआ मिशन। बचपन से मैं अनाथ बच्चों के साथ ही खाने की क़तार में खड़ा होकर बड़ा हुआ। उस उम्र तक पहुँचते-पहुँचते उस मिशन से एक बड़ा अनाथालय और कितनी ही कलीसियाएँ शुरू होकर चल रही थीं। मैं ग्यारह साल का था जब मेरे पिता पॉल पापाराव और माँ रत्नकुमारी ने अपनी सेवकाई शुरू की। विश्वास पर निर्भर होकर जीने के लिए वे परिवार को दूसरे क़स्बे ले गए। किशोरावस्था में "टीन मिशन्स" नाम की संस्था के साथ स्कूल और अनाथालय बनाने के कामों में मेरी सारी गर्मियों की छुट्टियाँ छतों पर ही बीतीं। आज नक़्शे में ढूँढ़ने पर भी जो क़स्बे मुझे नहीं मिलते, वहाँ वे स्कूल और अनाथालय खड़े हैं। बीस साल की उम्र में मैं एक बड़े मिशनरी सम्मेलन में गया। वहाँ से घर लौटते-लौटते मुझे ऐसा लगा जैसे शरीर में नया ख़ून चढ़ा दिया गया हो — इस काम पर नए विश्वास से भर गया। इससे बेहतर मैं इसे बता नहीं सकता।
बड़े होकर भी मैं उसी राह पर चला। जिस मिनिस्ट्री टीम का मैं हिस्सा हूँ, वह दशकों से भारत में कलीसियाएँ स्थापित करती आ रही है। उस काम के पास रहने के लिए ही मैं और मेरी पत्नी सोलह साल वहीं रहे। हमारे बच्चे वहीं पैदा हुए। जान से प्यारे दोस्तों को हमने वहीं खोया।
ये बातें कहने वाले आदमी के बारे में एक बात और। गॉस्पेल मूवमेंट पर लिखी गई क़रीब-क़रीब सारी किताबें बाहर के लोगों की लिखी हैं। एक सेवक अपने से अलग किसी देश में, अपने से अलग किसी जनता के बीच जाता है, वहाँ मूवमेंट सुलगाने में मदद करता है, और फिर लिखता है कि वह कैसे शुरू हुआ, परमेश्वर ने पहले से तैयार किए हुए एक स्थानीय व्यक्ति से होकर वह दूसरों तक कैसे फैला। वे गवाहियाँ सच्ची हैं। मैं उनका आभारी हूँ। पर भीतर के आदमी की बात हमें लगभग कभी सुनने को नहीं मिलती। कौन है वह? वह अपना आदमी, जो उसी देश में जन्मा और पला, और जिसने उस सेवक के हवाई जहाज़ पकड़कर अपने देश लौट जाने के बाद उस मूवमेंट को सचमुच आगे बढ़ाया। सारी ज़िंदगी मैं वही आदमी रहा हूँ, अपने ही लोगों के बीच। जिस दुनिया को ज़्यादातर किताबें बाहर से ही बयान कर पाती हैं, उसे मैं इस पुस्तक में भीतर से लिख रहा हूँ।
तो एक बात साफ़ कर दूँ: मैं वह आदमी नहीं हूँ जो बाहर खड़ा होकर मिशन के काम पर और कलीसिया स्थापना पर पत्थर फेंकता है। मैंने उन्हीं में सेवा की है। आज भी कर रहा हूँ।
ऐसा आदमी हूँ मैं। 2011 की एक दोपहर मैं अपनी पूरी सेवकाई को याद करते हुए बैठा था। तभी एक सच्चाई मेरी आँखों के सामने साफ़ खड़ी हो गई। कितनी भी कोशिश की, उसे लाँघकर आगे नहीं जा सका।
इतने बरसों में हमने इतना कुछ बनाया। फिर भी सामान्य विश्वासी अब तक जागा नहीं। यह होश उसे नहीं आया कि यह काम उसका अपना है।
हमने क्या नहीं किया। कलीसियाएँ बनाईं और लोगों से भरीं, उनके लिए ढाँचा और व्यवस्था खड़ी की, पास्टरों को प्रशिक्षण दिया, आराधना के गीत बनाए और जारी किए, गीतों की किताबें बाँटीं। पर रविवार सुबह दरवाज़ा खोलकर भीतर आने वाले लोगों ने यह नहीं माना कि सुसमाचार दूसरों तक पहुँचाने वाले वे ही हैं। उन्होंने सोचा कि वह काम मेरा है, या उनके पास्टर का, या मेरे स्टाफ़ का, या अमेरिका से आने वाले मेहमानों का।
पूरा काम हमने पूर्णकालिक सेवकों के इर्द-गिर्द खड़ा किया। पर सच तो यह है कि इस सुसमाचार को हर गली तक, हर घर तक ले जा सकने वाले सामान्य विश्वासी ही हैं। पूर्णकालिक सेवक थोड़े-से हैं। वे कितनी भी मेहनत करें, पहुँच थोड़ों तक ही पाएँगे। सामान्य विश्वासी तो देश भर में हैं। वे पहले से ही हर गाँव में, हर गली में, लोगों के बीच ही रह रहे हैं। कटनी इतनी बड़ी है। इतनी बड़ी कटनी काटनी है तो सबको उठना होगा। थोड़े-से मज़दूर काफ़ी नहीं।
पहले कह चुका हूँ: पंद्रह साल से जिस सवाल से मैं जूझ रहा था, उसका जवाब मुझे डैनी से मिलने के बाद ही मिला।
अब उन दो नामों पर आता हूँ। पिछले ढाई सौ वर्षों में, यीशु की दी हुई महान आज्ञा को पूरा करने के लिए हम ज़्यादातर दो मार्गों पर चले हैं। भूमिका में कहा था कि मार्ग हमेशा दो से ज़्यादा ही रहे हैं। पर बड़े ये दो हैं।
पहला मार्ग: मिशनरी संस्था। 1792 में इंग्लैंड में जूते सिलने वाले एक कारीगर विलियम कैरी ने एक ही ज़रूरी संदेश लेकर एक छोटी-सी किताब लिखी: यीशु की दी हुई महान आज्ञा की मियाद ख़त्म नहीं हुई है। मसीहियों को उठना ही होगा। उसने क़लम उठाई इंग्लैंड के एक छोटे गाँव में, अपनी काम की मेज़ पर ही। उसी साल के आख़िर में उसने एक मिशनरी संस्था खड़ी की। अगले साल जहाज़ पर चढ़कर भारत के लिए चल पड़ा। ध्यान दीजिए वह था कौन: जूते सिलने वाला। रोज़ी-रोटी के लिए जूते सुधारने वाला एक सामान्य आदमी। उसी काम की मेज़ से आधुनिक मिशनरी मूवमेंट का जन्म हुआ। सुसमाचार को पृथ्वी के छोर तक ले जाने वाली दो सदियों की मिशनरी संस्थाएँ वहीं से आईं।
दूसरा मार्ग: कलीसिया की वृद्धि और कलीसिया की स्थापना। 1955 में मिशन के काम का अध्ययन करने वाले अमेरिकी विद्वान डोनाल्ड मैकगैवरन ने द ब्रिजेज़ ऑफ़ गॉड (परमेश्वर के पुल) नाम की एक छोटी किताब छापी। वह जन्मा और पला भारत में ही था। अमेरिकी मिशनरियों का बेटा। किसान, दिहाड़ी मज़दूर, आदिवासी, और समाज ने जिन्हें नीची निगाह से देखकर एक तरफ़ कर दिया था — ऐसे कितने ही लोग: इन्हीं के ज़रिए स्थानीय कलीसिया को फैलते हुए उसने अपनी आँखों से देखा। विदेशी संस्था जिस रफ़्तार से चल सकती थी, कलीसिया उससे कहीं तेज़ बढ़ती चली गई। अपनी आँखों से देखे उस काम को मैकगैवरन ने अपनी किताब में एक नाम दिया और दुनिया के सामने रखा। अमेरिका के फुलर सेमिनरी नाम के धर्मशास्त्रीय कॉलेज में उसने विश्व मिशन का स्कूल स्थापित किया। वहीं से कलीसिया वृद्धि मूवमेंट आया। पिछली सदी में यह सारा काम मिशनरी के इर्द-गिर्द जमाया गया था; वैसे ही इस मूवमेंट ने कलीसिया के एक बड़े हिस्से को पास्टर और कलीसिया-स्थापक के इर्द-गिर्द जमा दिया।
ये दोनों परमेश्वर के दिए हुए उपहार हैं। इन्हीं दो मार्गों का फल मैं हूँ। आप भी वही हैं। आपके बग़ल में बैठकर आराधना करने वाले कितने ही विश्वासी भी वही हैं। इन दोनों मार्गों से मैं प्रेम करता हूँ। अपना जीवन मैंने इन्हीं को दिया है।
पर इन दोनों में एक समानता पर ध्यान दीजिए।
दोनों शुरू सामान्य लोगों के हाथों ही हुए। कैरी ने शुरू किया अपनी काम की मेज़ पर। भारत में कलीसिया फैली किनके ज़रिए? उन्हीं लोगों के ज़रिए जिन्हें सत्ता में बैठे किसी ने गिनती में नहीं रखा। पर इन पहले दो मार्गों को उनके असली रूप में हममें से बहुतों ने कभी देखा ही नहीं। जब तक वे हमारे हाथ तक पहुँचे, तब तक वे पूर्णकालिक सेवक के इर्द-गिर्द खड़ी की गई व्यवस्थाएँ बन चुके थे।
मिशनरी संस्था ने मिशनरी को बड़ा किया। कलीसिया वृद्धि और कलीसिया स्थापना के मूवमेंटों ने पास्टर को और कलीसिया-स्थापक को बड़ा किया। सामान्य विश्वासी के हिस्से जो जगह आई, वह बस इतनी थी — "साथ देने वाला": प्रार्थना करने वाला, देने वाला, हाज़िर रहने वाला।
परमेश्वर के काम को आगे बढ़कर चलाने वाले असली आदमी के रूप में उसे देखने वाले बहुत कम रहे।
ये दोनों मार्ग आज भी फल दे रहे हैं। मैं दोनों का हिस्सा रहा और दोनों के फल के रूप में जन्मा — इसके लिए परमेश्वर का आभारी हूँ। मैं उन्हें आदर देता हूँ। सुसमाचार समुद्र पार गया। कलीसिया इकट्ठी हुई, पोषित हुई। यह सब देखकर मैं ख़ुश हूँ। उसी समय, उनके ठीक बग़ल में, पवित्रशास्त्र जो तीसरा मार्ग हमें दिखा रहा है, उस ओर मेरी नज़र जाती है। क्योंकि व्यवस्थाएँ अकेले इस काम को पूरा नहीं कर सकतीं। पास्टरों समेत हममें से बहुतों की गढ़ाई उसी व्यवस्था के भीतर हुई है जिसने महान आज्ञा को पूर्णकालिक सेवक के हाथ में रख दिया। पर पूर्णकालिक सेवक जितना बोझ उठा सकता है, वह सीमित है। और सामान्य विश्वासी से किसी ने कहा ही नहीं: यह काम तेरा भी है।
हिसाब लगाकर देखें तो भी यही निकलता है: यह काम थोड़े-से लोगों से होने वाला नहीं। हम पूर्णकालिक सेवकों को एक-एक करके, सावधानी से, धीरे-धीरे तैयार करके भेजते रहे। इस बीच दुनिया की आबादी उस रफ़्तार से बढ़ती गई जिसे न कोई मिशनरी संस्था पकड़ सकती है, न कोई सेमिनरी। जानते हैं, आज कितने लोग ऐसे हैं जिन्होंने यीशु का नाम एक बार भी नहीं सुना? कैरी जिस दिन जहाज़ पर चढ़ा था, उस दिन पृथ्वी पर जितनी कुल आबादी थी, उससे भी ज़्यादा। वह फ़ासला घट नहीं रहा। बढ़ता ही जा रहा है। कुछ और पूर्णकालिक सेवक जोड़ देने भर से इस बढ़ते फ़ासले को नहीं पाटा जा सकता। ज़्यादा लोगों तक पहुँचना है तो ज़्यादा लोगों को जाना ही होगा। परमेश्वर जिस रफ़्तार से कटनी बढ़ा रहा है, उसे इतिहास में सिर्फ़ एक ही चीज़ पकड़ पाई है: सामान्य लोग, अपने सामने पहले से मौजूद लोगों तक सुसमाचार ले जाएँ। यह उन दोनों मार्गों की नाकामी नहीं है। एक छोटी गाड़ी पर पूरे गाँव की फ़सल नहीं लादी जा सकती। यह गाड़ी का दोष नहीं, फ़सल ही इतनी बड़ी है। वैसे ही यह काम उन दोनों मार्गों की ताक़त से आगे बढ़ गया है। इसीलिए सब सामान्य लोगों को उठना होगा।
मैंने भी वह मीनार बनाई है
आगे बढ़ने से पहले एक बात सीधे कह देना चाहता हूँ। इस पुस्तक की भूमिका में मैंने एक मीनार का ज़िक्र किया था। याद है? रणनीतियाँ, सिद्धांत, तरीक़े, प्रशिक्षण — एक के ऊपर एक चढ़ते-चढ़ते ऊँची होती गई वह इमारत। सामान्य विश्वासी उसके सामने खड़ा होता है, सिर उठाकर देखता है, और "यह मेरे बस की बात नहीं" सोचकर लौट जाता है। वही है वह मीनार। अब मैं आपको उसके पास ले चलकर दिखाने वाला हूँ। पर पहले एक सच मानना होगा: उस मीनार को बनाने में मेरा भी हाथ है।
भारत में अपनी सेवकाई के सारे वर्षों में, दुनिया भर में मूवमेंट के काम में लगे लोगों ने जो तरीक़े और योजनाएँ बनाईं, उन्हें मैंने भी अपनी टीम के साथ काम में लिया। बाद में उन सब तरीक़ों को निचोड़कर मैंने अपना एक सरल तरीक़ा बनाया। आज भी वही सिखाता हूँ। मूवमेंट सुलगाने वालों के लिए और साथ खड़े होकर कोचिंग देने वालों के लिए वह काम का साधन है।
पर मूवमेंट अगुवों से — यानी उन अगुवों से जो मूवमेंट सुलगाकर आगे ले चलते हैं — जब भी मैं मिलता हूँ, एक ही बात होती है। इस मूवमेंट के काम का जो हिस्सा जिसके दिल के सबसे क़रीब है, उसी एक हिस्से के चारों ओर वह एक पूरा कार्यक्रम खड़ा कर देता है। कोई प्रार्थना मूवमेंट के कार्यक्रम चलाता है। कोई चंगाई के प्रशिक्षण स्कूल चलाता है। कोई शांति के व्यक्ति को पहचानने पर अलग पाठ तैयार करता है। कोई पीढ़ियों की गिनती की व्यवस्थाएँ खड़ी करता है। सबको एक के ऊपर एक रख दीजिए, ऊँची मीनार बन जाती है। मूवमेंट अगुवा उस मीनार में क़दम रखे तो उसे अपने घर जैसा लगता है। पर हमारी कलीसिया का सामान्य शिष्य उसी मीनार को एक बार सिर उठाकर देखता है और पीछे मुड़कर चला जाता है।
यह मीनार वाली मुश्किल सिर्फ़ नीचे खड़े होकर ऊपर देखने वाले सामान्य शिष्य की नहीं, भीतर रहने वाले अगुवे की भी है। जिन हफ़्तों में मेरा कैलेंडर नब्बे प्रतिशत संस्था के कामों से भरा रहा, सच कहूँ तो उन दिनों में मैंने पवित्र आत्मा के लिए जगह ही नहीं छोड़ी। ऐसे हफ़्तों में मैं शिष्यों के बीच एक शिष्य नहीं रह पाता।
मैंने अपनी मीनार को पत्थर-दर-पत्थर उतारना शुरू कर दिया है। इसीलिए यह पुस्तक लिख रहा हूँ। मीनार पर थोड़े-से ही चढ़ सकते हैं। दरवाज़े से होकर सब चल सकते हैं। इसलिए मीनार की जगह मैं जो चाहता हूँ, वह एक छोटा-सा दरवाज़ा है: एक सरल रास्ता, जिससे कोई भी सामान्य विश्वासी चलकर भीतर आ सके। उस दरवाज़े के उस पार का जीवन कैसा है, वह आगे के पन्नों में आपको दिखाऊँगा।
उस दरवाज़े के उस पार कुछ सामान्य लोग हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। थोड़ी देर में उनसे मिलेंगे। पर पहले उस एक की ओर देखें जिसके पीछे वे चले। क्योंकि यह नमूना सबसे पहले उसी का है।
यीशु ने सेवकाई अपने ही लोगों के बीच की, अपने ही देश में: गलील में, कुछ समय यहूदिया में, सामरिया से होकर जाने वाले रास्ते पर। वह रोम नगर नहीं गया। पृथ्वी के छोर तक वह ख़ुद नहीं गया। वह घर के पास ही रहा।
घर के पास रहते हुए ही उसने वह सब किया जिसे आज हम "कलीसिया" कहते हैं। पहाड़ पर से और नाव में से भीड़ को उसने शिक्षा दी। खुले में हज़ारों को प्रचार किया। सब्त के दिन आराधनालय जाकर खड़े होकर पवित्रशास्त्र पढ़ा। पर्वों पर मंदिर गया। लोग बीमारों को उसके पास लाए तो उसने उनके लिए प्रार्थना की। वे चंगे हुए। भीड़ उसके चारों ओर इतनी जुटी कि दरवाज़े पर खड़े होने तक की जगह न बची। अगर आपको इकट्ठी हुई कलीसिया पसंद है, उपदेश पसंद है, वचन पढ़ना पसंद है, पर्व का दिन पसंद है, बड़ी-बड़ी सभाएँ पसंद हैं — तो आप उसी राह पर हैं जिस पर यीशु चला। इन तरीक़ों से सेवकाई करना उसे भी अच्छा लगता था।
पर भीड़ से हटकर, चुपचाप, उसने एक और काम भी किया। नीकुदेमुस नाम के एक ही आदमी के साथ रात गए तक अकेले बैठकर बात की। निराशा में डूबे दो आदमियों के साथ इम्माऊस नाम के गाँव तक सात मील चला। रास्ते भर उन्हें पवित्रशास्त्र खोलकर समझाया। जक्कई के घर वह ख़ुद ही मेहमान बनकर गया और उसकी खाने की मेज़ पर बैठा। तीन साल तक उसने अपना समय और अपनी शक्ति बारह सामान्य आदमियों पर उँडेल दी। अपने पास जो कुछ था वह उनके हाथ तक पहुँच जाए, इतने पास रहकर वह उनके साथ जिया। भीड़ ने उसकी बात सुनी। वे थोड़े-से लोग उसके हाथों में गढ़े गए।
उसने दोनों किए। मैं एक को दूसरे के मुक़ाबले खड़ा नहीं कर रहा। बड़ी सभाएँ, कलीसिया की आराधनाएँ, पर्व — इनका होना कोई समस्या नहीं। ये हैं, इसके लिए परमेश्वर की स्तुति हो। यीशु के पास भी ये थे। हमने धीरे-धीरे जो छोड़ दिया, वह उसका दूसरा काम है। यानी क्या? रात को किसी घर में बैठकर एक ही आदमी से बात करना। किसी परिवार के साथ उनकी खाने की मेज़ पर बैठना। रास्ते में चलते-चलते दो आदमियों को पवित्रशास्त्र खोलकर समझाना। थोड़े-से लोगों के साथ चलते हुए, जब तक वे ख़ुद आगे न ले जा सकें, तब तक सब कुछ उनके हाथ में सौंपते जाना। कलीसिया की सभाएँ, आराधनाएँ, पर्व — ये हम करते ही रहे हैं। ये छोटे काम ही हमने करना छोड़ दिया।
यीशु ने जितने तरह की सेवकाई दिखाई, उनमें से यह पुस्तक जिस पर नज़र रखती है, वह शिष्य बनाने का वही चुपचाप किया जाने वाला काम है। क्योंकि दुनिया तक पहुँचने की उसकी योजना की कुंजी वही है। उसने अपने ही लोगों पर ध्यान दिया। उसके गढ़े और भेजे हुए शिष्य ही दुनिया तक पहुँचे। पुलपिट से भी मेरा कोई झगड़ा नहीं, मिशन क्षेत्र से भी नहीं। दोनों से प्रेम करके अपना जीवन ही दे दिया है। पर यहाँ मैं जो दिखाना चाहता हूँ, वह वही हिस्सा है जिसे हम आम तौर पर एक तरफ़ रख देते हैं। क्योंकि जिन्हें सुसमाचार मिला, अगर वे उसे अपने ही पास रख लें, अपने ही लोगों तक कोई आगे न पहुँचाए, तो हिसाब कभी नहीं बैठेगा। इतनी बड़ी दुनिया तक पहुँचना है तो विश्वास करने वाले हर एक को मूवमेंट टीम का हिस्सा बनना ही होगा।
अभी कहा था कि उस दरवाज़े के उस पार कुछ लोग हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। ये हैं वे: नए नियम के सामान्य शिष्य। ये लोग मेरा पीछा नहीं छोड़ते। इनमें से कोई पूर्णकालिक सेवक नहीं था। किसी के पास तीन साल का प्रशिक्षण नहीं था। परमेश्वर की कृपा ने उन्हें चकित कर दिया। बस इतना। किसी और प्रशिक्षण या योग्यता के आ जाने तक वे रुके नहीं। अपने आस-पास के पूर्णकालिक सेवक जिस दुनिया तक नहीं पहुँच सकते थे, अपनी उसी दुनिया में इनमें से हर एक सुसमाचार ले गया।
दोपहर के समय कुएँ पर पानी भरने आई सामरी स्त्री। क़ब्रों के बीच रहने वाला गिरासेनियों के देश का वह आदमी, जिसने बाद में दस नगरों के पूरे इलाक़े में बताया कि यीशु ने उसके लिए क्या किया। उसी रात, उसी घड़ी बपतिस्मा लेने वाला फिलिप्पी के बंदीगृह का दारोगा। रोमी सेना का सूबेदार कुरनेलियुस। फिलिप्पी नगर में बैंजनी रंग बेचने वाली व्यापारी लुदिया। अपने ही घर में खड़े होकर यह कहने वाला जक्कई कि जो लूटा है उसे चौगुना लौटाऊँगा। यूहन्ना के सुसमाचार के नौवें अध्याय का वह आदमी जो जन्म से अंधा था और जिसे दृष्टि मिली। महासभा के सामने उसकी गवाही इतनी सीधी थी कि उससे कोई बहस नहीं कर सका: "मैं एक बात जानता हूँ कि मैं अंधा था और अब देखता हूँ।"
गॉस्पेल मूवमेंट का नमूना ये ही हैं।
पूरे नए नियम में सुसमाचार को आगे ले जाने के लिए परमेश्वर ने ऐसे ही लोगों को काम में लिया। सामान्य लोगों की जगह वह सारा काम करने के लिए आज की आधुनिक कलीसिया जिस तरह के सेवक तैयार करती है, वैसा इनमें कोई नहीं था।
कुएँ पर मिली उस सामरी स्त्री ने अपने गाँव के सब लोगों को ख़ुद ही यीशु के बारे में बताया। उसे किसी ने प्रशिक्षण नहीं दिया था। पर आज हम क्या कर रहे हैं? उस जैसे सामान्य लोगों का काम उनकी जगह करने के लिए पूर्णकालिक सेवक तैयार करते हुए बरसों बिता रहे हैं। हमें उसकी जगह काम करने वालों की ज़रूरत ही नहीं है। उसे चाहिए था बस एक: एक ऐसा आदमी जो उससे कहे — "यह सुसमाचार तेरे लोगों तक पहुँचाने वाली तू ही है" — और उस पर भरोसा करे।
यही वह मार्ग है जिसे हम सबसे ज़्यादा भूले हैं। इसी को मैं तीसरा मार्ग कहता हूँ: सामान्य विश्वासी, जहाँ वह पहले से रह रहा है वहीं, परमेश्वर ने जिन लोगों को पहले से उसे दिया है उन्हीं के बीच, परमेश्वर की आवाज़ सुने और जो वह कहे वह करे।
मिशनरी संस्थाएँ, कलीसिया, और सामान्य शिष्यों का मूवमेंट — परमेश्वर के ये तीनों काम साथ मिलकर कैसे खड़े होते हैं, यह देखना हो तो इस पुस्तक के आवरण पर बने चिह्न को एक बार देखिए। तीन गोले एक-दूसरे को काटते हैं। तीनों जहाँ मिलते हैं वहाँ एक तारा है। वे तीन गोले परमेश्वर के वही तीन भले काम हैं। मैंने जान-बूझकर उन्हें एक-दूसरे से मिलते हुए बनवाया है। क्योंकि वे आपस में होड़ करने के लिए नहीं बने। वे तीन रूपों में परमेश्वर का एक ही काम हैं।
वह तारा वहीं है जहाँ तीनों मिलते हैं। वही जगह है जहाँ वे अकेले नहीं, साथ मिलकर काम करते हैं। वहीं, कुएँ पर मिली स्त्री जैसी सामान्य शिष्या के हाथ में काम आता है। वहीं से वह निकलती है। परमेश्वर की आवाज़ सुनते हुए, जो वह कहे वह करते हुए, और अपने पास के किसी एक को भी वैसा ही करने में मदद करते हुए वह चलती है।
हमारे इतिहास में बहुत लंबे समय तक, पहले दोनों काम उसे इकट्ठा करते रहे, उसे शिक्षा देते रहे, उस तक पहुँचने के लिए प्रशिक्षित लोगों को भेजते रहे। वह काम उन्होंने अच्छे से किया। पर रविवार सुबह उसे इकट्ठा करके, रविवार दोपहर घर भेजते समय, वे उसे यह बताए बिना ही भेजते रहे कि वह है किसलिए। रविवार को बैठकर सुनने भर के लिए वह पैदा नहीं हुई। जिस दिन मिशनरी संस्था और कलीसिया उसकी जगह काम करना बंद करके, उसी को बीच में खड़ा करके, काम अपने पास रखने के बजाय उसके हाथ में सौंप देंगे, उस दिन वह उन लोगों तक पहुँचना शुरू करेगी जिन तक सिर्फ़ वही पहुँच सकती है। अब तक सेवा पाती आई थी वह। अब सेवा करने वाली वही है।
तीसरे मार्ग का मतलब यह नहीं कि मौजूदा दो के बग़ल में एक तीसरी इमारत खड़ी की जाए। यह कोई नई आज्ञा नहीं, शुरू से चला आ रहा असली काम ही है। वे दोनों मार्ग जिसकी सेवा के लिए बने थे, बात उसी सामान्य शिष्या की है। हम दोनों का आदर करते हैं। उनके फल के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं। और उसी समय दोनों से बस एक बात माँगते हैं: अब से उसकी सेवा कीजिए।
तो हमारे सामने का काम तीसरी संस्था खड़ी करना नहीं, कोई और नेटवर्क बनाना भी नहीं। बस एक शब्द।
जगाना।
कुएँ पर मिली स्त्री के समय से परमेश्वर जिस सामान्य आदमी को काम में लेता आया है, उसे जगाना।
यह सवाल आपसे पूछने से पहले मैंने ख़ुद से पूछा है।
परमेश्वर ने जो लोग पहले से आपको दिए हैं, उनके लिए आपकी क्या योजना है? दुनिया के लिए नहीं, अपने देश के लिए भी नहीं। इस हफ़्ते प्रभु ने आपके मन में जिन तीन-चार लोगों को रखा है, उनके लिए पूछ रहा हूँ। उनके नाम पहले से आपके फ़ोन में ही हैं।
कैनसस के क़स्बे का वह युवक, डैनी, पहले ही शुरू कर चुका है। भारत में एक पास्टर की पत्नी शेरोन पहले ही शुरू कर चुकी है। अमेरिका के आइडाहो इलाक़े में, पति को खो चुकी एक बहन पहले ही शुरू कर चुकी है।
मेरी चाह यही है कि आप भी इसी राह पर चलें।
मनन के लिए
वे चार आदतें आपके हाथ में किस रूप में हैं? ज़रूरत पड़ने पर काम में लाए जाने वाले साधन के रूप में, या आपकी जीवन-शैली बनकर? ईमानदारी से कहें तो आज आप किसके ज़्यादा क़रीब हैं?
अपनी कलीसिया के कामों और सेवकाई के कामों की भागदौड़ में, कोई ऐसा मौक़ा रहा जब आपने पवित्र आत्मा के लिए जगह नहीं छोड़ी?
इस हफ़्ते प्रभु ने आपके मन में जिन चार लोगों को रखा है, और जो आपके फ़ोन में हैं — वे कौन हैं?
दूसरा अध्याय26 मिनट
गॉस्पेल मूवमेंट क्या है?
इस काम को सरल शब्दों में कह पाने की हालत तक पहुँचने में मुझे बरसों लगे। उससे पहले सालों तक मैं इसे बड़े-बड़े शब्दों में बयान करता रहा।
जो आदमी किसी मूवमेंट के भीतर ही जन्मा और पला हो, उसके ख़ून में उसके तौर-तरीक़े कब के उतर चुके होते हैं। पर वे हैं क्या, इसे शब्दों में रखकर कह पाने की हालत बहुत देर से आती है।
अपनी सेवकाई के ज़्यादातर साल मैंने तरीक़ों के साथ काम किया। लूका 10 में यीशु ने जो दो-दो करके भेजा, वह एक तरीक़ा। डिस्कवरी, आज्ञाकारिता, मल्टिप्लिकेशन — इन तीन शब्दों वाला दूसरा तरीक़ा। ऐसे कितने ही तरीक़े। ये सब काम के हैं, ज़्यादातर सही भी हैं। कुछ मैंने ख़ुद बनाए। बहुत कुछ दूसरों से लेकर, अपने काम के ढंग के हिसाब से सरल कर लिया। पर तरीक़ा तो नक़्शे जैसा है। वह उस जगह की जगह नहीं ले सकता जिसे वह दिखाता है। नक़्शा रट लेने के बाद भी उस ज़मीन पर एक क़दम न रखने वाले लोगों से मैं बार-बार मिलता आया हूँ।
किसी मूवमेंट को तय क्या करता है? वही काम जो लोग बिना सोचे, सहज ढंग से करते हैं। बरसों में वे कितने ही पाठ सीख सकते हैं। पर भीतर उतरकर ज़िंदगी बदलने वाले थोड़े-से ही होते हैं।
इसीलिए पिछले दस साल से मैं एक ही सवाल पूछता आया हूँ: "सब कुछ निचोड़ दें तो बचता क्या है? कौन-सी थोड़ी-सी आदतें हों तो बाक़ी सब अपने आप आ जाएँ? कौन-सी एक भी न हो तो सब कुछ रुक जाए?"
जितनी बार सोचा, हर बार मैं उन्हीं चार आदतों पर पहुँचा।
उन चारों के नाम बताने से पहले, गॉस्पेल मूवमेंट से हमारा मतलब क्या है, यह समझा दूँ।
पहले यह कि सुसमाचार है क्या।
यीशु ने ख़ुद यूहन्ना 3:16 में कहा: "क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।"
वही एक वाक्य नींव है। इस पुस्तक में बाक़ी सब उसी पर खड़ा है। गॉस्पेल मूवमेंट का मतलब रणनीतियों का मूवमेंट नहीं, तरीक़ों का मूवमेंट नहीं। यह उन लोगों का मूवमेंट है जिन्होंने इस शुभ समाचार पर विश्वास किया कि परमेश्वर ने उनसे इतना प्रेम किया कि अपना पुत्र ही दे दिया। उनका जीवन अब मसीह में छिपा हुआ है।
यीशु की दी हुई महान आज्ञा कोई नया प्रोजेक्ट नहीं जो पिता ने हमारे हाथ में थमा दिया हो। वह वही काम है जो पिता शुरू से करता आ रहा है। क्रूस के दिन से लेकर आज तक वह लोगों को मसीह के पास खींचता ही रहा है। जब तक सब सुन न लें, उसका काम रुकेगा नहीं। हमारा काम क्या है? यह देखना कि वह क्या कर रहा है, और उस काम में उसके साथ जुड़ जाना।
गॉस्पेल मूवमेंट हम अपने बल से नहीं बनाते। हमारे जन्म से पहले से जिस मूवमेंट को पिता चला रहा है, हम उसी में शामिल होते हैं। मसीह के साथ एक हुए हैं, इसीलिए इस सुसमाचार को आगे ले जा पाते हैं।
अब देखें कि यह किस तरह का मूवमेंट है।
नए नियम में एक ढंग दिखाई देता है। उसी ने मेरी पूरी सोच को गढ़ा। यीशु ने जिन्हें बुलाया, वे क़रीब-क़रीब सब सामान्य लोग थे। बारह में से चार मछुए। एक चुंगी लेने वाला। एक उस टोली का जो रोमी शासन का विरोध करती थी। कोई भी धर्मगुरु नहीं था। फरीसी शाऊल पौलुस बना। फिर भी तंबू सीने का काम उसने अपने हाथ में ही रखा। प्रेरित कौन थे? उस समय एक ख़ास काम के लिए प्रभु ने अलग करके भेजे हुए सामान्य लोग ही।
शुरुआती कलीसिया भी सामान्य लोगों से ही भरी थी। ऊपरी कमरे में जो इकट्ठे हुए, वे एक सौ बीस सामान्य लोग थे। प्रेरितों के काम की पुस्तक के घर सचमुच घर ही हैं, कोई ख़ास इमारतें नहीं। कलीसिया के सेवकों (डीकनों) को कलीसिया ने अपने ही भीतर से चुना। सुसमाचार को आगे कौन ले गया? किसान, दस्तकार, सैनिक, दासियाँ, स्त्रियाँ, बच्चे। दो सदियों तक सुसमाचार ऐसे ही चला।
नए नियम में, प्रेरित न होते हुए भी सुसमाचार को आगे ले जाने वाले सामान्य लोग भी हैं। पहले अध्याय में आप उनसे मिल चुके हैं। कुछ यीशु से ख़ुद मिले: सामरी स्त्री, जक्कई, गिरासेनियों के देश का आदमी। कुछ प्रेरितों के ज़रिए उससे मिले: कुरनेलियुस, लुदिया, फिलिप्पी का जेलर। इनकी बातें एक-एक करके आगे के अध्यायों में पूरी पढ़ेंगे। इनमें से किसी को प्रेरित का ओहदा नहीं दिया गया। हर एक जो पाया उसे लेकर अपने ही घर लौट गया।
बाद में पूर्णकालिक सेवक एक अलग वर्ग बनने लगे। बिशप एक अलग वर्ग हो गए। पुरोहित एक और वर्ग। सेमिनरी की डिग्री के बिना सेवकाई न कर पाने की हालत आ गई। जो काम सब करते आए थे, वह अब अकेला पूर्णकालिक सेवक करने लगा। सामान्य शिष्य बैठकर देखता रह गया।
हमारे ज़माने में उन दोनों के साथ भी यही हुआ। पहले अध्याय के कैरी और मैकगैवरन याद हैं न — जूते सिलने वाले से शुरू हुआ कैरी, और भारत में मिशनरी रहा मैकगैवरन। छोटे पैमाने पर ही सही, और अच्छी नीयत से ही, यह हुआ।
1792 में जब कैरी ने अपनी मिशनरी संस्था शुरू की, तब वह जूते सिलकर जीने वाला एक सामान्य कारीगर था। सौ साल बीतते-बीतते उसके उत्तराधिकारी सेमिनरी की डिग्रियों वाले मिशनरी बन गए। मैकगैवरन ने, भारत में दशकों मिशनरी रहने के बाद, फुलर नाम की सेमिनरी में विश्व मिशन का स्कूल स्थापित किया। भारत में बड़े पैमाने पर लोगों को मसीह की ओर मुड़ते हुए उसने अपनी आँखों से देखा, उसका गहरा अध्ययन किया, और उसे "पीपुल मूवमेंट्स" नाम दिया। उस स्कूल से डिग्रियों और रणनीतियों के साथ कलीसिया वृद्धि के विशेषज्ञों और कलीसिया-स्थापकों की एक पूरी पीढ़ी निकली।
इसी को स्पेशलाइज़ेशन कहते हैं। यानी सबका काम विशेषज्ञों के हाथ में चला जाना। स्पेशलाइज़ेशन अपने आप में ग़लत नहीं। जब भी सामान्य लोग कोई काम अच्छी तरह करने लगते हैं, यह होता ही है। कोई उसका एक तरीक़ा बना देता है। कोई उस पर डिग्रियाँ और योग्यताएँ लगा देता है। सब पूरा होते-होते, जिस सामान्य आदमी ने वह काम सबसे पहले शुरू किया था, वही काम के बीच से हटकर किनारे हो चुका होता है। ऐसा हो, यह कोई तय नहीं करता। फिर भी हो जाता है।
उसी सामान्य आदमी को फिर से काम के बीच में खड़ा करना — यही इस पुस्तक का काम है।
हम इसे गॉस्पेल मूवमेंट कहते हैं। कलीसिया स्थापना मूवमेंट से इसका फ़र्क़ दिखाने के लिए ही यह नाम। कलीसिया स्थापना मूवमेंट भी उस काम का एक रूप है जो परमेश्वर दुनिया में कर रहा है। वह मूवमेंट और यह गॉस्पेल मूवमेंट, दोनों हमें चाहिए। पर कलीसिया स्थापना मूवमेंट, बाइबल के ज़माने में हो या आज, हमेशा किस पर खड़ा होकर बढ़ा है? अपनी ही जगहों में, अपने ही लोगों तक सुसमाचार पहुँचाने वाले सामान्य लोगों के मूवमेंट पर ही। सामान्य शिष्या ही इस फ़सल की मिट्टी जैसी है। बाक़ी सब उसी मिट्टी से उगता है।
पास्टरों और धर्मशास्त्रियों से एक बात। इस पुस्तक की नज़र तीसरे मार्ग पर ही है। कलीसिया के प्राचीन, बपतिस्मा, प्रभु भोज, पुलपिट — इनकी बात हम यहाँ नहीं कर रहे। वे होते हैं। पीढ़ियों से जहाँ-जहाँ कलीसिया जमी हुई है, वहाँ वे पहले से हो ही रहे हैं। ग्रुप बढ़कर कलीसिया की सभाएँ बन जाते हैं। उन सभाओं के लिए ज़रूरी व्यवस्थाएँ वहाँ अपने आप आ जाती हैं, क्योंकि कलीसिया की जड़ें वहाँ कब से गहरी उतरी हुई हैं। हमारा ख़तरा और है। जमी हुई कलीसिया अपनी इमारत में, अपने कार्यक्रमों में डूबकर बैठी रह जाती है। बाहर कटनी का खेत वैसे का वैसा पड़ा रह जाता है। उस खेत में सामान्य शिष्य फिर से क़दम रखे, इसका रास्ता क्या है? वही चार आदतें। वही तीसरा मार्ग। वही हमारे सामने का काम।
नाम इतना ज़रूरी नहीं। कुछ लोग इन सामान्य शिष्यों को मूवमेंट अगुवे कहते हैं। कुछ शिष्य बनाने वाले सामान्य लोग कहते हैं। कुछ बस शिष्य ही कहते हैं। आपको जो शब्द अपना लगे, वही इस्तेमाल कीजिए। ज़रूरी शब्द नहीं, लोग हैं। ये प्रेरित नहीं हैं। परमेश्वर ने प्रेरितों को जिन्हें जगाने के लिए भेजा था, ये वही लोग हैं।
तो, गॉस्पेल मूवमेंट को जन्म देने और टिकाए रखने वाली वे चार आदतें ये हैं:
एक। सामान्य शिष्य। दो। परमेश्वर की आवाज़ सुनना। तीन। परमेश्वर की आज्ञा मानना। चार। दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना।
हर एक इतनी सरल कि बच्चों को भी बताई जा सके। फिर भी उन्हें जीने में पूरी ज़िंदगी लग जाती है। इनमें से एक भी न हो तो मूवमेंट रुक जाता है। जहाँ चारों हों, वहाँ और कुछ न हो तब भी वह चलता ही रहता है।
ये बातें आपको उलझाएँ नहीं, इसलिए सबको एक बार साथ रखकर कहता हूँ। तीसरे मार्ग का मतलब कोई तरीक़ा नहीं, एक व्यक्ति है। वह सामान्य शिष्या है। वह मामूली विश्वासिनी जो जहाँ पहले से रह रही है वहीं सुसमाचार पहुँचाती है। पहले दोनों मार्ग बने ही उसकी सेवा के लिए थे। चार आदतों का मतलब है उसके जीने का ढंग। वह सामान्य शिष्या है। परमेश्वर की आवाज़ सुनती है। उसकी आज्ञा मानती है। दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करती है। गॉस्पेल मूवमेंट वह है जो तब जन्मता है जब बहुत सारे लोग ऐसे जीने लगते हैं: सुसमाचार किसी पूर्णकालिक सेवक के लिए रुके बिना, एक मामूली ज़िंदगी से दूसरी मामूली ज़िंदगी तक पहुँचता चला जाए। मंज़िल क्या है? वे चारों मामूली जीवन-शैली बन जाएँ। यानी मामूली मसीही जीवन। वे चार इतने मामूली हो जाएँ कि अब कोई रुककर उन्हें नाम भी न दे। इन सबके नीचे एक भाव है: पवित्र आत्मा सुनने वाले किसी भी शिष्य से बात करता है — यह पक्का भरोसा। इसलिए हमारा काम कभी विशेषज्ञ बनना नहीं है। एक-दूसरे को सुनने और आज्ञा मानने में मदद करना ही है।
अगर आपने इन मूवमेंटों के बीच समय बिताया है, तो इन चारों के भीतर आपको जाने-पहचाने पुराने शब्द ही दिखेंगे। डिसाइपल मेकिंग मूवमेंट्स, यानी शिष्य बनाने वाले मूवमेंट, बरसों से जो तीन शब्द कहते आए हैं, ये वही हैं: डिस्कवरी, आज्ञाकारिता, मल्टिप्लिकेशन। यहाँ बस उन्हीं शब्दों को ज़्यादा आत्मीय, रिश्तों की भाषा में कहा गया है। शब्द बदला है, सार वही है। डिस्कवरी यहाँ परमेश्वर की आवाज़ सुनना बन गई: पवित्रशास्त्र के ज़रिए, और जो कुछ भी प्रभु काम में लेता है उसके ज़रिए सुनना। आज्ञाकारिता परमेश्वर की आज्ञा मानना बन गई। मल्टिप्लिकेशन दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना बन गई। इन तीनों से पहले, पहले स्थान पर, सामान्य शिष्य खड़ा हुआ। यह काम शुरू से जिसका था, वह वही है।
मूवमेंट पर सिखाने वालों ने कभी-कभी योग्यताओं की सूचियाँ बना दीं। वे इतनी लंबी हैं कि जो सिखाते हैं उन्हें भी भीतर ही भीतर लगता है कि वे पूरे नहीं उतरते। चार आदतें वैसी नहीं हैं। वे पहुँच से बाहर की ऊँचाई नहीं हैं। वे सबके लिए खुले दरवाज़े जैसी हैं। कोई भी भीतर क़दम रख सकता है।
अब एक-एक को सीधे-सीधे बताता हूँ।
सामान्य शिष्य
गॉस्पेल मूवमेंट सामान्य शिष्यों से बनता है।
यहाँ एक बात पहले साफ़ कर देनी चाहिए। "शिष्य" सुनते ही हममें से बहुतों को तुरंत बारह प्रेरित याद आते हैं। पर नए नियम में शिष्य का मतलब सिर्फ़ वे बारह नहीं हैं। जो भी यीशु पर विश्वास करता है, उसकी बात सुनता है और उसके पीछे चलता है, वह हर एक शिष्य है। उन बारह के अलावा और भी कितने ही उसके साथ चले। लूका 10 में उसने सत्तर को भेजा। प्रेरितों के काम की पुस्तक में सब मामूली विश्वासियों को "शिष्य" ही कहा गया है। इसलिए इस पुस्तक में सामान्य शिष्यों का मतलब कहीं दूर के कोई बड़े लोग नहीं। आप ही हैं। मैं ही हूँ। यीशु से प्रेम करने वाला हर मामूली विश्वासी।
ये वे सामान्य शिष्य हैं जो जहाँ पहले से रह रहे हैं वहीं, परमेश्वर ने जिन लोगों को उनके चारों ओर रखा है उन्हीं के बीच जीते हैं। न पूर्णकालिक सेवक, न किसी ख़ास ओहदे वाले। वे मामूली विश्वासी जिनसे किसी ने कभी नहीं कहा — "यह काम तेरा भी है।"
यह पहली आदत है। क्योंकि बाक़ी तीनों इसी पर खड़ी होती हैं। अगर मूवमेंट को पूर्णकालिक सेवकों के इर्द-गिर्द खड़ा किया जाए, तो आख़िर में जो बचता है वह कलीसिया स्थापना है या मिशन का काम। ये दोनों क़ीमती बुलाहटें हैं। अपने जीवन के बरसों मैंने इन्हीं को दिए हैं। पर ये दोनों गॉस्पेल मूवमेंट नहीं हैं। गॉस्पेल मूवमेंट क्या है? वह जीवन-शैली जो तब जन्मती है जब वह काम, जिसकी इजाज़त अब तक सिर्फ़ पूर्णकालिक सेवकों को थी, सामान्य शिष्य करने लगते हैं।
मैं जिस तरह के व्यक्ति की बात कर रहा हूँ, वह कैसा है — यह समझना हो तो प्रेरितों के काम 16 में फिलिप्पी नगर की लुदिया को देखिए। वह बैंजनी रंग बेचकर जीने वाली व्यापारी थी। नदी किनारे पौलुस की बात सुनकर, अपना घर खोलकर, यूरोप महाद्वीप की सबसे पहली कलीसिया को अपने ही घर में जगह देने वाली वही है। उसकी पूरी बात छठे अध्याय में पढ़ेंगे। यह पूरी पुस्तक उसी ढंग की बात करती है। न पुरोहित, न रोमी अधिकारी। जहाँ वह रह रही थी वहीं, परमेश्वर ने उसके जीवन में जिन लोगों को रखा था उन्हीं के बीच, काम करके जीने वाली एक स्त्री।
लुदिया जैसे सामान्य लोगों के साथ भी हमने वही किया। उनकी जगह काम करने के लिए विशेषज्ञ तैयार करते हुए बरसों बिता दिए। पर हमें शुरू से चाहिए वही थी।
शिष्य बनाने वाले सामान्य लोग पूरे भारत में बढ़ते जा रहे हैं, यह मैं देखता रहता हूँ। उनकी रफ़्तार को हमारे हिसाब भी नहीं पकड़ पाते। वे पास्टर नहीं हैं। राजमिस्त्री, प्याज़ बेचने वाले, दर्ज़ी, बच्चों की माँएँ, किशोर। ऐसे ही मामूली लोग। मसीह इन्हें बुलाकर इनके अपने ही रिश्तेदारों के पास, इनके अपने ही पड़ोसियों के पास भेज रहा है। दुख यह है कि जिन पूर्णकालिक सेवकों को इन्हें तैयार करना था, उन्होंने ही कई बार यह नहीं माना कि ये लोग यह काम कर सकते हैं। "ये करेंगे?" — ऐसा शक किया।
सामान्य विश्वासी यह काम कर सकता है, इसका एक ठोस कारण है। पतरस ने कलीसियाओं को लिखा: "पर तुम एक चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और परमेश्वर की निज प्रजा हो।" पुराने नियम के समय में एक ही गोत्र के लोग याजक थे। बाक़ी सबकी ओर से वे ही परमेश्वर की उपस्थिति में जाते थे। जब यीशु क्रूस पर मरा, मंदिर का परदा ऊपर से नीचे तक फटकर दो हो गया। वह पुरानी व्यवस्था वहीं ख़त्म हो गई। अब जो कोई उसे प्रभु कहकर पुकारता है, वह बीच में किसी के बिना, सीधे परमेश्वर की उपस्थिति में आता है। यानी सामान्य शिष्य भी पहले से याजक है।
कलीसिया इस सच्चाई को दोबारा खोज रही हो, ऐसा पहली बार नहीं है। पाँच सौ साल पहले जीने वाले कलीसिया-सुधारक मार्टिन लूथर ने इसे सीधे कहा: बपतिस्मा पाया हुआ हर विश्वासी पहले से याजक है। उसने भी यह बात पतरस के उसी वचन से ली थी। एक तरफ़ कैरी जैसा जूते सिलकर जीने वाला कारीगर, दूसरी तरफ़ बड़ा बिशप। परमेश्वर की उपस्थिति में दोनों बराबर हैं। दोनों उससे उतने ही पास हैं। वह कारीगर एक क़दम भी पीछे नहीं है। लूथर के बाद की सदियों में हमने इस सच्चाई को फिर हाथ से जाने दिया। सब विश्वासियों के याजकपन का संदेश एक बार फिर ज़ोर से कहने का समय आ गया है।
गॉस्पेल मूवमेंट की पहली आदत यही है: यह भरोसा दोबारा पाना कि सामान्य शिष्य यह काम कर सकते हैं।
परमेश्वर की आवाज़ सुनना
गॉस्पेल मूवमेंट डिस्कवरी से बनता है।
डिस्कवरी कोई सिखाने का तरीक़ा नहीं, एक भाव है। वह भाव यह कहता है: "पवित्र आत्मा पवित्रशास्त्र में से सामान्य शिष्यों से सीधे बात करता है। उन्हें अर्थ खोल-खोलकर समझाना हमारा काम नहीं। उन्हें उसके सामने खड़ा कर देने वाले सवाल पूछना ही हमारा काम है।"
तीसरे मार्ग को मैं कभी सोचने का एक ढंग कहा करता था। अब भाव शब्द ही इस्तेमाल करता हूँ। क्योंकि सोच सिर में ही रह सकती है। हाथ पहले की तरह पुराना काम करते रह सकते हैं। भाव ऐसा नहीं। वह पूरे आदमी को हिला देता है और कामों में ही दिखता है।
हममें से बहुतों की आदत सिखाने की ही है। पास्टर सिखाता है। संडे स्कूल सिखाता है। कॉन्फ्रेंस सिखाती है। बाक़ी समय किताब और पॉडकास्ट सिखाते हैं। सिखाने की अपनी जगह है। जीवन भर मुझे उससे लाभ हुआ है। पर अकेले सिखाना मूवमेंट को जन्म नहीं देता।
मूवमेंटों को जन्म देने वाला भाव और है। वह मैंने पहली बार कहाँ देखा, पता है? उन गाँव वालों के घरों में जिन्हें पढ़ना नहीं आता था। पढ़ना न आते हुए भी वे अपने बच्चों के साथ बाइबल की एक बात सुनकर, उस पर आपस में बात करके, प्रभु की बात सुन सके। वह भाव यह कहता है: "मैं विशेषज्ञ नहीं हूँ। चलो हम साथ मिलकर खोजें। जिस आत्मा ने ये वचन दिए, वही उन्हें हर पूछने वाले पर खोलता है।"
दीवार बनाते समय बग़ल में लगाई जाने वाली टेक देखी है? सवाल वैसे ही हैं, कुछ समय के लिए। हमें असल में वह भाव ही चाहिए। भाव आ जाने के बाद टेक हटाई जा सकती है। दीवार उसके सहारे के बिना खड़ी रहती है।
जहाँ वह भाव है, वहाँ मूवमेंट अपने आप चलता रहता है। पर जब डिस्कवरी की जगह सिखाना आकर बैठ जाता है, तब मूवमेंट धीमा पड़ता है और आख़िर में रुक जाता है। जो जगह कभी जीवित थी, वहाँ मसीहियत गूँगी क्यों हो जाती है? इससे बड़ा कारण और कोई नहीं है।
परमेश्वर की आज्ञा मानना
गॉस्पेल मूवमेंट आज्ञाकारिता से बनता है।
हममें से बहुतों ने जो आदत खो दी, वह यही है।
हमें जो प्रशिक्षण मिला, उसका ढंग यह है: आदमी को सिखाओ कि क्या मानना है, और उम्मीद करो कि सही चाल-चलन अपने आप आ जाएगा। तीसरे मार्ग का ढंग और है: पूछो कि "इस हफ़्ते प्रभु तुझसे क्या करने को कह रहा है?" — और जब तक वह काम हो न जाए, उस आदमी के साथ खड़े रहो। एक ही वचन-भाग दोनों को जन्म दे सकता है। फ़र्क़ बस इतना है कि सभा किस पर ख़त्म होती है: नोट्स से भरे पन्ने पर, या किसी के यह तय कर लेने पर कि "इस हफ़्ते मैं यह करूँगा।"
2011 से, यानी जिस साल मैंने इसे पहली बार देखा, आज्ञाकारिता पर खड़ी शिष्यता को पूरे भारत में बढ़ते हुए देखता आया हूँ। उसी समय यह भी देखा कि सिर्फ़ सीखने पर खड़ी शिष्यता कलीसियाओं को दशकों तक जोड़े रखती है। पर उसने शिष्य बनाने वाला एक भी नया आदमी पैदा नहीं किया। फ़र्क़ लोगों में नहीं है। भारत में मेरे साथ काम करने वाले लोग अमेरिका के कैनसस सिटी में मेरे साथ काम करने वालों से ज़्यादा भक्त नहीं हैं। फ़र्क़ पूरा उसी सभा में है।
"इस हफ़्ते आप क्या करेंगे?" — इस सवाल पर ख़त्म होने वाली और अगले हफ़्ते "क्या किया? क्या हुआ?" पूछने वाली सभा शिष्य बनाती है।
नोट्स पर ख़त्म होने वाली सभा विद्यार्थी बनाती है।
दोनों अच्छी हैं। पर मूवमेंट को जन्म एक ही देती है।
क्या मूवमेंट है और क्या नहीं, यह तय करने की सरल परख आज्ञाकारिता ही है। ईमानदारी से देखें तो चार सभाओं में ही आपको पता चल जाएगा कि आपका ग्रुप मूवमेंट की ओर जा रहा है या नहीं। देखना क्या है? यह कि जिस काम में क़ीमत चुकानी पड़ती है, वह कोई सचमुच कर रहा है या नहीं।
दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना
हमने जो सीखा — यानी परमेश्वर की आवाज़ सुनना और आज्ञा मानना — उसे कोई और भी कर सके, इसमें मदद करते हैं, तभी गॉस्पेल मूवमेंट जन्मता है।
कुछ शिक्षक इसे मल्टिप्लिकेशन कहते हैं। मैंने भी बरसों वही शब्द इस्तेमाल किया। जिस दुनिया भर में फैले गॉस्पेल मूवमेंट परिवार में मैं चलता हूँ, उसमें भी मल्टिप्लिकेशन एक प्रमुख मूल्य है। पर पश्चिमी सेवकाई की भाषा में इस शब्द से धीरे-धीरे हिसाब-किताब की गंध आने लगी। जीने लायक़ ज़िंदगी की जगह वह पहुँचने का टारगेट बन गया। इसीलिए इस पुस्तक में मैं दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना कहता हूँ। शब्द अपनापन लिए हुए हो गया। सार वही है। पहली तीन आदतों का स्वाद चख चुका एक सामान्य शिष्य अपने जीवन में बिल्कुल पास खड़े आदमी की ओर मुड़ता है और जो काम उसने अभी-अभी शुरू किया है, वही करने में उसकी मदद करता है।
वही असली क़दम है। उसके बिना पहली तीन आदतें, चाहे कितनी भी क़ीमती हों, अभी मूवमेंट नहीं हैं। क्योंकि कुछ भी किसी और के हाथ तक नहीं पहुँच रहा।
नए नियम के हर गॉस्पेल मूवमेंट में यह क़दम है। पहले अध्याय में आप जिन सामान्य शिष्यों से मिले, उनमें से हर एक अपने ही लोगों को अपने साथ ले गया: अपने साथ खाना खाने वालों को, घरवालों को, दोस्तों को, पड़ोसियों को। यानी उन लोगों को जिन्हें परमेश्वर पहले से उनके जीवन में रख चुका था। हर बार एक ही बात सुनाई देती है: "प्रभु ने तेरे लिए जो किया, वह अपने लोगों को बता।" वही बात मूवमेंट का दिल है।
इस पुस्तक से और कुछ याद न रहे तो यह याद रखिए: गॉस्पेल मूवमेंट का दिल हज़ार लोगों से बोल सकने वाला कोई बड़ा वक्ता नहीं है। जो काम उसने अभी-अभी शुरू किया है, वही एक और आदमी कर सके — इसमें मदद करने वाली सामान्य शिष्या ही वह दिल है।
आदतें चार ही हैं। वे चारों मिलकर जो दिखता है, वही गॉस्पेल मूवमेंट का पूरा रूप है।
सामान्य शिष्य। परमेश्वर की आवाज़ सुनना। परमेश्वर की आज्ञा मानना। दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना।
ये आपके बच्चों को भी बताई जा सकें, इतनी सरल हैं। फिर भी इन्हीं पर एक पूरा जीवन और एक पूरा मूवमेंट खड़ा होता है। चारों साथ ही होनी चाहिए।
इनमें से एक भी न हो, तो मूवमेंट होता ही नहीं।
सिर्फ़ पूर्णकालिक सेवकों से बनाया गया मूवमेंट मिशनरी संस्था बन जाता है या कलीसिया स्थापना का नेटवर्क। पूर्णकालिक सेवक जितने हैं, वह उतना ही बढ़कर रुक जाता है।
डिस्कवरी के बिना सिखाना बहुत कुछ सीखे हुए विश्वासी देता है। पर वे जो सीखा है उसे किसी और तक नहीं पहुँचा पाते।
आज्ञा मानने के बिना का ज्ञान आदर पाने वाले सदस्य देता है। पर उनके चारों ओर कुछ नहीं बदलता।
किसी और की मदद न करने वाला शिष्य आत्मिक वारिस छोड़े बिना ही इस दुनिया से चला जाता है।
पर जहाँ चारों हैं, वहाँ मूवमेंट में प्राण आते हैं और वह जीता है। जब तक चारों ओर का वातावरण ही न बदल जाए, सामान्य शिष्य अपनी ही जगहों पर और सामान्य शिष्य खड़े करते रहते हैं। यह धीरे-धीरे होता है। इसके लिए इमारत नहीं चाहिए, किसी की इजाज़त नहीं चाहिए। सचमुच चाहिए तो वही चार।
आपको आगे भेजने से पहले एक चेतावनी। मूवमेंट के इन सिद्धांतों को कलीसिया पर बरसाने की लाठी बनाते हुए मैंने बहुतों को देखा है। मैं आपके हाथ में वह नहीं दे रहा। कुछ लोग कलीसिया से नाराज़ रहते हैं। उन्हें लगता है कि घरों में होने वाले छोटे ग्रुपों के ढंग पर चले जाएँ तो सब ठीक हो जाएगा। ठीक नहीं होता। कलीसिया में दिखने वाली सारी समस्याएँ असल में आदमी के हृदय की समस्याएँ हैं। अधिकार जताना, लोगों को दबाना। ये हज़ारों की बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में और छोटे ग्रुपों में एक जैसे ही घुस आते हैं। इकट्ठा होने की जगह बदल लेने भर से आदमी की समस्याओं से नहीं बचा जा सकता।
दूसरों के काम पर अंक देने की तालिका के रूप में भी मैं ये चार नहीं दे रहा। असल ज़िंदगी में चारों को बिना किसी कमी के जीने वाला कोई नहीं होता। हमारे ज़्यादातर ग्रुप लँगड़ाते हुए ही चलते हैं। "इस हफ़्ते क्या करेगा?" — यह सवाल पूछना कोई भूल जाता है। दूसरों की मदद करना कोने में पड़ा रह जाता है। कुछ महीने बिना किसी के ख़ास सुने ही बीत जाते हैं। फिर भी परमेश्वर उन ग्रुपों को, उन दिनों को काम में लेता ही रहता है। किसी ग्रुप के चारों को परफ़ेक्ट करने तक रुकने की उसे ज़रूरत नहीं। इसलिए मूवमेंट में बढ़ते हुए, एक-दूसरे के प्रति धीरज और अनुग्रह से रहें।
हमारे इस्तेमाल किए शब्दों को जाने बिना ही इन चारों को जीने वाले बहुत लोग हैं। इंग्लैंड के पास वेल्स नाम के देश में एक प्रार्थना केंद्र के चारों ओर जुड़ा "स्थानीय प्रार्थना घर" नाम का एक नेटवर्क है। जो वे करते हैं उसे वे कभी डिस्कवरी ग्रुप नहीं कहते। पर जब भी मैं उनके प्रार्थना कमरों में बैठा, चारों आदतें दूसरे नामों से वहाँ जीती-जागती दिखीं।
पूरे अमेरिका में विश्वासी हमारी मूवमेंट टीमों के चलाए प्रार्थना ग्रुपों में इकट्ठे हो रहे हैं। एक ग्रुप कुछ महीनों तक मिलता है: प्रार्थना करना सीखने के लिए, परमेश्वर की आवाज़ सुनना सीखने के लिए, अपने इलाक़े को आशीष देने के लिए। उनमें से बहुत-से उसे गॉस्पेल मूवमेंट नहीं कहते। पर उस कमरे में जो जीवित हैं, वे वही चार हैं। भूमिका वाले उस भोज में आप जिस जैकी से मिले, वह बरसों से ये प्रार्थना ग्रुप चला रही है। सैकड़ों लोगों की एक कलीसिया को उनके ज़रिए जागते हुए उसने अपनी आँखों से देखा।
किसी आदमी के पास मूवमेंट के सारे शब्द हो सकते हैं: किताबें, प्रशिक्षण, बड़ी-बड़ी बातें, सब कुछ। पर हो सकता है वह इनमें से कुछ भी न जी रहा हो। कोई और आदमी, वेल्स के प्रार्थना घरों के विश्वासियों की तरह, सब कुछ जी रहा हो सकता है — और हमारे एक भी शब्द का इस्तेमाल न करता हो। कौन-से शब्द इस्तेमाल हो रहे हैं, यह कभी पैमाना नहीं। क्या जिया जा रहा है, वही पैमाना है। इसलिए किसी और विश्वासी के काम को देखकर "उनमें फ़लाँ आदत नहीं है" कहकर फ़ैसला सुनाने में जल्दी मत कीजिए। अपने काम में चारों को जीवित रखिए। दूसरों के काम पर अंक देने का काम प्रभु पर ही छोड़ दीजिए।
साल बीतते-बीतते हमने गॉस्पेल मूवमेंट की एक हिसाबी परिभाषा बना ली: ग्रुप से ग्रुप जन्मते हुए चार पीढ़ियाँ चलें, तभी मूवमेंट। उस चौथी पीढ़ी तक न पहुँचे काम के बारे में सुनाई देता है — "यह अभी मूवमेंट नहीं है।" गिनने की अपनी जगह है। मैं भी गिनता हूँ। पर गिनती कभी सार नहीं होती। सार वही चार आदतें हैं। कभी-कभी ग्रुपों की क़तार चौथी पीढ़ी तक पहुँचने से पहले ही रुक जाती है। तब उसी जगह नए लोगों के साथ फिर से शुरू करते हैं। कभी-कभी सुसमाचार पूरे इलाक़े तक एक ही लंबी क़तार से नहीं पहुँचता। कितनी ही छोटी-छोटी क़तारों से ही पहुँचता है। गिनती से मदद मिलती हो तो पीढ़ियाँ गिनिए। पर आपकी आँखों के सामने जो हो रहा है वह मूवमेंट है या नहीं, यह गिनती तय न करे।
यह सब एक ही जीवन में भी दिख सकता है। हमारी टीम से आई एक गवाही है। जैक नाम का एक खिलाड़ी इन्हीं प्रार्थना ग्रुपों में से एक में बैठा। उसमें जो सबसे गहरा उतरा, वह था परमेश्वर की आवाज़ सुनना सीखना। अपने खेल के जीवन के बारे में प्रार्थना करते हुए उसे एक ही बात साफ़ सुनाई दी: "रेगी को फ़ोन कर।" जैक ने उस बात को माना। उस महीने हो रहे एक इंडोर टूर्नामेंट को चलाने वाले आदमी को रेगी जानता था। उसी जान-पहचान से जैक को उसमें जगह मिली। उस खेल से एक सिलेक्शन ट्रायल तक रास्ता खुला। एक प्रोफ़ेशनल टीम ने जैक को चुन लिया। उसी ट्रायल पर उसने दो लोगों को मसीह तक पहुँचाया। टीम में आने के बाद, मैदान में उतरने से पहले वह अपने साथी खिलाड़ियों के लिए प्रार्थना करता। ड्रेसिंग रूम का माहौल ही बदल गया। प्रार्थना ग्रुप का गॉस्पेल मूवमेंट बन जाना यही है: एक आदमी परमेश्वर की आवाज़ सुने, आज्ञा माने, और अगला आदमी भी वैसा ही कर सके इसमें मदद करे।
इस अध्याय से आपको जो ले जाना है वह कोई नई रणनीति नहीं, वही चार आदतें हैं। चारों आपके भीतर उतर जाएँ, तो रणनीति क्या है, पता है? कल सुबह प्रभु आपके सामने जो एक छोटा काम रखे, उसकी आज्ञा मानना। उसके अगले दिन, उसके पीछे आने वाले दूसरे काम की आज्ञा मानना।
एक क़दम और आगे बढ़ने से पहले यह बता दूँ कि ये चार असल में कहाँ से आए। ये मेरी सोच नहीं हैं। यीशु ने ख़ुद जिस तरह जिया, वह यही है। परमेश्वर का पुत्र यीशु एक छोटे क़स्बे में, सामान्य लोगों के बीच, हममें से एक बनकर जीने आया। उसने देखा कि उसका पिता क्या कर रहा है। सुना कि वह क्या कह रहा है। जो देखा और सुना, उसी के अनुसार जिया। क्रूस तक पिता की आज्ञा मानी। दूसरे भी वैसा कर सकें, इसमें उसने हमेशा मदद की। वही हैं ये चार। हमें देने के लिए वह जो जीवन-शैली लेकर आया, वही यह है। हम किसी रणनीति के नहीं, उसी के पीछे चल रहे हैं।
चार आदतों से भी गहरी एक नींव है। असल में वह कोई चीज़ नहीं, कोई व्यक्ति है। इस काम को चलाने वाला पवित्र आत्मा ही है। वह जिस साधन को काम में लेता है, वह परमेश्वर का वचन है। सबकी शुरुआत सुसमाचार से है — यानी उस काम से जो परमेश्वर ने यीशु मसीह में किया। सुनने वाले सामान्य लोगों के ज़रिए जब आत्मा काम करता है, तब जो रूप दिखता है, वही ये चार हैं। बस इतना। आत्मा के बिना चारों शून्य हैं। सुसमाचार के बिना चारों खोखले कार्यक्रम हैं। मैं आपके हाथ में कोई तरीक़ा नहीं दे रहा। सामान्य लोगों के जीवन में पवित्र आत्मा को जगह देने पर वह क्या करता है, वही दिखा रहा हूँ।
सामान्य शिष्य। परमेश्वर की आवाज़ सुनना। परमेश्वर की आज्ञा मानना। दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। ये नाम मैं इस्तेमाल करता हूँ। ज़रूरी नहीं कि आप भी यही इस्तेमाल करें। शब्द ज़रूरी नहीं, सार ज़रूरी है। अपने लोगों के लिए जो शब्द ठीक बैठें, वे आप ख़ुद खोज सकते हैं। कुछ लोगों को "सामान्य शिष्य" शब्द पसंद नहीं आता। मेरा दोस्त ली उन्हें "शिष्य बनाने वाले सामान्य लोग" कहता है। कुछ लोगों को "परमेश्वर की आवाज़ सुनना" के बजाय "डिस्कवरी" पसंद है। आपको वह अच्छे से समझ आता हो तो वही इस्तेमाल कीजिए। मेरे दोस्त टॉम रुटोलो ने हाल में मुझसे कहा कि पश्चिम में बहुतों को "आज्ञा मानना" शब्द कठोर लगता है। अर्थ बिगाड़े बिना नरम सुनाई देने वाला कोई और शब्द हो तो वही इस्तेमाल कीजिए। अर्थ ही ज़रूरी है। "दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना" के बजाय कुछ लोगों को "मल्टिप्लिकेशन" भाता है। अपने लोगों के लायक़ शब्द इस्तेमाल कीजिए। बस यह देखिए कि चारों आपके जीवन में हों।
डिस्कवरी ग्रुप के मामले में भी यही है। उसे अपनी पसंद के नाम से पुकारिए। जिनके साथ आप पढ़ते हैं, उनके हिसाब से सवालों को ढालिए। बस यह देखिए कि सभा में चारों आदतें हों। रूप को सार की सेवा करनी चाहिए। इतना ही।
परमेश्वर सर्वशक्तिमान है। इन नामों के बिना, इन रूपों के बिना भी वह यह सब कर सकता है। वह इन नामों और रूपों से कहीं बड़ा है। फिर भी उसने जो राह चुनी है वह मामूली ही है: अपने पुत्र जैसे जीवन वाले सामान्य लोगों के ज़रिए काम करना। उस जीने के ढंग को हमने जो नाम दिए हैं, वही ये चार हैं।
अब शुरू करें।
मनन के लिए
इन चार आदतों में से इस समय आपके जीवन में सबसे मज़बूत कौन-सी है? कौन-सी कमज़ोर है?
ये चारों आपको कैसी लगती हैं? ऐसे खुले दरवाज़े की तरह जिससे कोई भी भीतर आ सके, या अपने बस से बाहर की बात की तरह?
"इस हफ़्ते यह कर" — ऐसा कौन-सा छोटा और साफ़ काम है जो प्रभु आपके सामने रख रहा है?
तीसरा अध्याय27 मिनट
सामान्य शिष्य
चार आदतों में पहली यही है। और सबसे ज़्यादा हम इसी को भूले हैं।
गॉस्पेल मूवमेंट बनता ही सामान्य शिष्यों से है। पूर्णकालिक सेवकों से नहीं, स्टाफ़ से नहीं। जो लोग जहाँ पहले से रह रहे हैं वहीं, परमेश्वर के दिए हुए लोगों के बीच रहते हैं — उन्हीं सामान्य लोगों से वह बनता है।
विश्वासी और शिष्य के बीच का फ़र्क़ मैं ऐसे बताता हूँ। विश्वासी वह है जिसने यीशु के बारे में सच्चाई सुनी, उस पर विश्वास किया, और उसे मान लिया। और शिष्य? इस शब्द के दो अर्थ चलन में हैं। आगे बढ़ने से पहले दोनों देख लें।
आम तौर पर सुनाई देने वाला अर्थ यह है: शिष्य वह है जिसने उद्धार पाया, जो विश्वास की नींव में जम रहा है और सही शिक्षा में बढ़ रहा है। यह ज़रूरी है, बाइबल के अनुसार है। पर जब मैं "सामान्य शिष्य" कहता हूँ, तब मेरा मतलब यह नहीं होता।
गॉस्पेल मूवमेंट में शिष्य वह है जो नए शिष्य बनाता है। वह काम कब शुरू होता है? उसी पल जब कोई परमेश्वर की आवाज़ सुनता है, उसकी आज्ञा मानता है, और किसी और की भी ऐसा करने में मदद करना शुरू करता है। इसके लिए बरसों की ट्रेनिंग नहीं चाहिए। पूरा धर्मविज्ञान पहले से जमा हुआ होना ज़रूरी नहीं। जहाँ सुनना, आज्ञा मानना और मदद करना शुरू हुआ, वहीं शिष्यता शुरू हो गई।
इसीलिए, आप अभी जिस सामरी स्त्री से मिलने वाले हैं, वह आधी शिष्या या होने वाली शिष्या नहीं है। वह पूरी शिष्या है। वह किसी प्रशिक्षण के लिए नहीं रुकी। न किसी ख़ास अनुभव के लिए, न किसी के हाथ रखकर भेजे जाने वाले अभिषेक के लिए। पहले अपना जीवन सुधार लूँ, यह सोचकर भी नहीं रुकी। कुएँ पर उसने यीशु की बात सुनी। सुनते ही अपने गाँव की ओर दौड़कर आज्ञा मानी। जिन्हें वह जानती थी, वे सब भी उसके पास आएँ — इसमें मदद की। यह सब एक ही दोपहर में हुआ। जक्कई की बात भी वैसी ही है। कुरनेलियुस हो, लुदिया हो, फिलिप्पी के बंदीगृह का दारोग़ा हो — सबका ढंग वही है। सुनकर, आज्ञा मानकर, किसी और की ओर मुड़ने के उसी पल में उनके जीवन में चारों आदतें काम करने लगीं। गॉस्पेल मूवमेंट इस शब्द को जिस अर्थ में इस्तेमाल करता है, उस अर्थ में वे उसी समय शिष्य हैं।
अगर हम उन्हें ऐसे न देखें, तो नए नियम के साथ हम एक अजीब काम करने लगते हैं। उनकी कहानियों का फल उनसे लेकर सुसमाचार लाने वाले बाहरी आदमी के खाते में डाल देते हैं। कुरनेलियुस के घर का फल पतरस के खाते में चला जाता है। लुदिया का घर और उससे जन्मी फिलिप्पी की कलीसिया पौलुस के खाते में चली जाती है। हम भी वैसे ही हैं: जब हम सपना देखते हैं कि परमेश्वर हमें काम में ले, तो हम ख़ुद को पतरस या पौलुस की तरह बाहर से आने वाला बड़ा आदमी मान लेते हैं। पर उन कहानियों को एक बार ठहरकर देखिए। मूवमेंट बाहर से आए आदमी के ज़रिए नहीं चला। भीतर के आदमी के ज़रिए ही चला। जो उस घर में, उस गाँव में, उस काम में पहले से था — उसी के ज़रिए।
मूवमेंट अगुवा जो करता है वह यह है: जो जगह उसकी अपनी नहीं, वहाँ दरवाज़ा खोलना। सामान्य शिष्य जो करता है वह यह है: भीतर से ही काम को सुलगाना। वह पहुँचता अपने ही लोगों तक है, अपनी ही दुनिया में।
तीस साल से कलीसिया में बैठकर सिर्फ़ सुनता आया विश्वासी एक पल में सामान्य शिष्य बन सकता है। जिस पर पूरे गाँव ने पापी का ठप्पा लगा दिया हो, वह भी। कोई भी हो: यीशु से मिलकर, उसकी आवाज़ सुनकर, आज्ञा मानकर, और अपने जीवन के किसी एक आदमी की मदद करना शुरू करने के उसी पल में वह सामान्य शिष्य बन जाता है। पतरस और पौलुस जिस ऊँचाई तक बढ़े, वहाँ तक उसे बढ़ाने में प्रभु को एक पूरा जीवनकाल लग सकता है। वह उसका काम है, उसका समय है। पर उसका अपना काम उस बढ़ने के लिए नहीं रुकता। उसका काम यही है: सुनना, आज्ञा मानना, और तुरंत अपने परिवार की ओर, अपने दोस्तों की ओर, परमेश्वर ने जिन लोगों को पहले से उसके जीवन में रखा है उनकी ओर मुड़ना।
गॉस्पेल मूवमेंट ऐसे ही लोगों पर चलता है।
अब ऐसे ही कुछ लोगों से मिलते हैं।
कुएँ पर मिली स्त्री
कुएँ पर मिली उस स्त्री की बात इसकी बड़ी मिसाल है।
यूहन्ना का सुसमाचार, चौथा अध्याय। यीशु सामरिया के सूखार नाम के गाँव में आया। थका हुआ था, प्यासा था। वह दोपहर का समय था, धूप जलाने वाली घड़ी। शिष्य खाना ख़रीदने गाँव में गए थे। यीशु अकेला याकूब के कुएँ पर बैठा था।
उसी तपती धूप में एक स्त्री पानी भरने आई। सब जिस ठंडी घड़ी में आते हैं, उस घड़ी न आकर इस समय क्यों आई, पता है? ताकि गाँव की औरतों की नज़र में न पड़े। उसके जीवन में पाँच पति आए और गए। अब जो उसके साथ है, वह उसका पति नहीं। पूरे गाँव को यह मालूम था। गाँव की नज़र में वह नीची निगाह से देखी जाने वाली पापी थी। ऐसी ही स्त्री से यीशु ने कहा — "मुझे पीने को पानी दे।"
वह बातचीत दस मिनट भी नहीं चली होगी। उसने उसके पति के बारे में पूछा। उसने कहा, "मेरा पति नहीं है।" तब उसने कहा: मैं जानता हूँ कि तेरे जीवन में पाँच पति आए और गए। यह भी जानता हूँ कि अब जो तेरे साथ है वह तेरा पति नहीं। उसने बात बदलकर आराधना के बारे में पूछा। उसने उसका भी उत्तर दिया, और आख़िर में सीधे कहा: जो तुझ से बोल रहा है, वह मसीह मैं ही हूँ। वह अपना घड़ा वहीं छोड़कर गाँव की ओर दौड़ी और सबसे कहा: "आओ, एक मनुष्य को देखो, जिस ने सब कुछ जो मैं ने किया मुझे बता दिया: कहीं यह तो मसीह नहीं है?"
पूरा गाँव उठकर आया और उससे मिला। उसकी गवाही सुनकर बहुतों ने विश्वास किया। उन्होंने उससे कहा कि वह उनके यहाँ ठहरे। वह दो दिन ठहरा। उसके अपने वचन सुनकर और भी बहुतों ने विश्वास किया, यूहन्ना ने लिखा। उस अध्याय के अंत में गाँव के लोगों ने उससे यह कहा: "अब हम तेरे कहने ही से विश्वास नहीं करते; क्योंकि हम ने आप ही सुन लिया, और जानते हैं कि यही सचमुच में जगत का उद्धारकर्ता है।"
किसी और की बात पर जाने से पहले, इसी एक कहानी में चारों आदतें देखिए।
पहली आदत: सामान्य शिष्या। वह अगुवा नहीं थी। उसके पास कोई मंच नहीं था। अपने ही गाँव की नज़र में वह बदनाम स्त्री थी। फिर भी उस दिन यीशु ने बात करने के लिए उसी को चुना। चाहता तो मंदिर के याजक को चुन सकता था। पर उसने उसी को चुना।
दूसरी आदत: परमेश्वर की आवाज़ सुनना। यीशु ने उसे प्रवचन नहीं दिया। सवाल पूछे। वह कौन है, यह अपने ही मुँह से उसे बताया। बीच में अर्थ खोलकर समझाने वाला कोई पंडित नहीं था। प्रभु ने ख़ुद कुएँ पर उससे भेंट की। उसने उसकी आवाज़ ख़ुद अपने कानों से सुनी।
तीसरी आदत: परमेश्वर की आज्ञा मानना। उसने अपना घड़ा नीचे रख दिया। वही घड़ा रखना उसका आज्ञा मानना था। सोचिए क्यों: वह कुएँ पर आई ही उस घड़े के लिए थी। पर अभी-अभी सुनी हुई नई बात उसके लिए अपने लाए हुए पुराने काम से बड़ी हो गई। इसीलिए घड़ा वहीं रह गया।
चौथी आदत: दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। वह दौड़ी कहाँ? किसी नए गाँव नहीं, अपने ही गाँव। परमेश्वर ने जो लोग पहले से उसे दिए थे, उन्हीं के पास। जिस गाँव ने उसे नीची निगाह से देखा था, उसी गाँव को वह यीशु के पास ले आई। उसकी गवाही सुनकर बहुतों ने विश्वास किया, और यीशु के वचन सुनकर और भी बहुतों ने — यूहन्ना ने लिखा। जो गाँव उसे जानता था, वह उस दिन बदल गया।
गॉस्पेल मूवमेंट यही है: सामान्य शिष्या, परमेश्वर की आवाज़ सुनना, परमेश्वर की आज्ञा मानना, दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना।
एक बात सोचिए। वह "मसीही" नहीं थी। उसके हाथ में बाइबल भी नहीं थी। फिर भी चार आदतों ने उसे चलाया।
यानी चार आदतें मसीहियों का निकाला हुआ कोई तरीक़ा नहीं हैं। यूहन्ना के चौथे अध्याय के दिन से यीशु गाँव-गाँव यही काम करता आ रहा है।
अब मैं आपको अपने ही ज़माने के कुछ ऐसे लोग दिखाता हूँ जिनमें ये चारों आदतें काम करती हुई मैंने अपनी आँखों से देखी हैं।
एक किशोर लड़का, एक विश्वासयोग्य पास्टर
डैनी को आप पहले अध्याय से जानते हैं। कैनसस के क़स्बे में पहली आदत कैसे काम करती है, यह आँखों के सामने दिखाने वाला वही है। उस घरेलू कलीसिया की पास्टर के विश्वास में कोई कमी नहीं थी। कितने ही दौरों से अपने लोगों को आँख की पुतली की तरह सँभालती आई हैं वे। वे पहले दो मार्गों पर चलीं। पर तीसरे मार्ग को चाहिए कौन? अपने ही क़स्बों तक पहुँचने वाले सामान्य शिष्य। डैनी ने वही किया। यह होते हुए अपनी आँखों से देखकर उन पास्टर की आँखों में राहत के आँसू आ गए।
यही पहली आदत, जहाँ भी मैं देख पाता हूँ, अब वहीं दिखाई देती है।
डटी रही एक बहन
पूरे भारत में यह पहली आदत मुझे सबसे साफ़ किनमें दिखी, पता है? उन स्त्रियों में जिन्होंने कभी ख़ुद को सेवा करने वाली माना तक नहीं।
पास्टर की पत्नी शेरोन की बात आपने भूमिका में सुनी थी। अब पूरी बात बताता हूँ। वे भारत के एक शहर में रहती हैं। पच्चीस साल अपने पति के साथ एक छोटी कलीसिया में सेवा की। विश्वासयोग्य सेवा ही थी। पर फल थोड़ा ही था। उनके ज़रिए यीशु के पास आने वाले थोड़े ही थे।
तब उन्हें डिस्कवरी ग्रुपों के बारे में पता चला।
पाँच बहनों को इकट्ठा करके उनके साथ मरकुस का सुसमाचार खोला। किसी ने किसी को पाठ नहीं पढ़ाया। सबने साथ मिलकर सुना। पूछा कि प्रभु क्या कह रहा है। तय किया कि इस हफ़्ते क्या करेंगे। अगले हफ़्ते आकर बताया कि क्या किया।
कुछ सभाओं के बाद, उन पाँच में से दो चली गईं। यह सरल तरीक़ा उन्हें पसंद नहीं आया। प्रवचन सुनने की आदी उन बहनों को यह दूध-भात जैसा लगा।
कुछ समय बाद दो और भी चली गईं। आख़िर में बची सिर्फ़ एक बहन।
फिर भी शेरोन और वह एक बहन, दोनों रुकी नहीं। चलती रहीं।
उस एक बहन ने कुछ विश्वासियों के साथ अपना डिस्कवरी ग्रुप शुरू किया। उस दूसरे ग्रुप में से एक ने किसी और परिवार के साथ तीसरा ग्रुप शुरू किया। उस परिवार के पिता को दिल की बीमारी थी। डॉक्टरों ने कहा कि तुरंत ऑपरेशन करना होगा। डिस्कवरी ग्रुप ने उसके लिए प्रार्थना की। अस्पताल पहुँचने पर डॉक्टरों ने कहा: ऑपरेशन की ज़रूरत ही नहीं।
वह पूरा परिवार विश्वास में आकर बपतिस्मा ले चुका। उन्होंने अपने रिश्तेदारों के साथ नया ग्रुप शुरू किया। उस ग्रुप से दूसरी पीढ़ी, और उससे तीसरी पीढ़ी के ग्रुप जन्मे।
तब, शुरू में चली गई वे चारों बहनें लौट आईं। जिस सरल तरीक़े को उन्होंने कभी ठुकराया था, वही उन्हें भी सिखाने को उन्होंने शेरोन से कहा।
लौटी हुई उन बहनों में से एक अब चार पीढ़ियों के डिस्कवरी ग्रुप चला रही है। उनमें एक चार-पाँच साल के बच्चों का ग्रुप है। वे बच्चे जो सीखते हैं, अपने घर ले जाकर अपने परिवारों को सुनाते हैं। "बच्चे अच्छी बातें सीख रहे हैं" कहकर वे परिवार उन्हें भेजते ही रहते हैं।
पच्चीस साल एक छोटी कलीसिया में सेवा करने वाली शेरोन अब कितने ही गाँवों में, चार पीढ़ियों तक, नब्बे से ज़्यादा शिष्यों के बीच सेवा कर रही हैं।
उस सरल राह की उन्होंने जो क़ीमत चुकाई: चार स्त्रियों का चले जाना। आख़िर में उस राह ने जो उपहार दिया: क़रीब सौ लोगों का विश्वास में आना।
वे बार-बार जो कहती हैं, वह सबसे सरल बात है: स्त्रियाँ अगुवाई कर सकती हैं। बच्चे भी कर सकते हैं। किशोर भी कर सकते हैं। घंटों बैठकर एक ही प्रचारक को सुनना ज़रूरी नहीं। हम सब साथ मिलकर सीख सकते हैं, साथ मिलकर बात कर सकते हैं।
डायमंड्स डॉटर्स
शेरोन अकेली नहीं हैं। वे एक नेटवर्क का हिस्सा हैं। उसका नाम है डायमंड्स डॉटर्स, यानी डायमंड की बेटियाँ। वह नाम मेरी माँ से ही आया है। पहले अध्याय में जिनका ज़िक्र किया, वही मेरी माँ रत्नकुमारी। अंग्रेज़ी में उनका नाम डायमंड है। जैसे हीरा अपनी चमक भीतर छिपाए रखता है, वैसे ही मेरी माँ में भी एक छिपी हुई ताक़त थी। इस नेटवर्क की स्त्रियाँ वही ताक़त लेकर उन क़स्बों और गाँवों में जा रही हैं जो नक़्शे में ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलते।
डायमंड्स डॉटर्स अब भारत के कितने ही इलाक़ों में, और उससे भी आगे फैला हुआ स्त्रियों का नेटवर्क है। उनमें ज़्यादातर बीस और तीस की उम्र की युवतियाँ हैं। जिन शहरों और गाँवों में वे पहले से रह रही हैं, वहीं डिस्कवरी ग्रुप चला रही हैं। अपनी बहनों के साथ चलते हुए तीसरी और चौथी पीढ़ी के फल तक पहुँच रही हैं। कुछ एक ही ग्रुप के साथ रहती हैं। कुछ कितने ही ग्रुपों के बीच घूमती हैं।
उनमें से एक का नाम मौनिका है। बीस के आस-पास की युवा बहन। पति की चलाई मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर सफ़र करते हुए, उसी रास्ते में उसने उसे डिस्कवरी ग्रुपों से परिचित कराया। उस इलाक़े में यह काम उसे ख़ुद करना है तो एक नई भाषा भी सीखनी होगी, यह भी बताया — ऐसी भाषा जो उसे आती नहीं थी। उसने सीख ली। अब अपने गाँव से बहुत दूर, वह एक पूरे इलाक़े में कितने ही ग्रुप चला रही है। वे ग्रुप सचमुच काम कर रहे हैं। वे शिष्य आगे बढ़ रहे हैं।
एक और युवा बहन है। उसकी उम्र बस इक्कीस साल है। अगली पीढ़ी का मतलब उसी जैसे लोग हैं। उसने कितने ही डिस्कवरी ग्रुप शुरू करने में मदद की। अब उन ग्रुपों को चलाने वाले सामान्य शिष्यों को कोचिंग दे रही है। उसके साथ चलने वाले शिष्य पवित्रशास्त्र को ख़ुद समझते हैं। वह पाठ नहीं पढ़ाती। सवाल पूछती है। उसके बारे में अगले अध्याय में और सुनेंगे।
बहन वीणा की बात। वे अपने हिस्से का काम करती ही रहती हैं — वह भी गोद में छोटे बच्चे के साथ। इस साल की शुरुआत में, पहाड़ी इलाक़े के एक ग्रुप तक जाते हुए वीणा मोटरसाइकिल दुर्घटना का शिकार हो गईं। उन्हें और बच्चे को बड़ी चोट नहीं आई। वे फिर बाइक पर बैठ गईं। जिन रास्तों पर वे सेवा करती हैं, उन पर मेरी अपनी बेटियाँ बाइक चलाएँ, यह मुझे पसंद नहीं। इतने ख़तरनाक रास्ते हैं वे। फिर भी वे पूरे परिवार के साथ मिलकर सेवा करती ही रहती हैं। क्योंकि वह काम उनका अपना है।
पेट्रोल पंप वाला आदमी
पुरुष भी यही काम उतनी ही सहजता से कर रहे हैं। अनिल नाम का एक आदमी पेट्रोल पंप पर काम करता है। उसके परिवार में कभी किसी ने यीशु का अनुसरण नहीं किया था। उसने जीवन में एक बार भी बाइबल नहीं खोली थी। साथ बैठकर पवित्रशास्त्र पढ़ने वाले एक छोटे ग्रुप में किसी ने उसे बुला लिया। वे क्या कर रहे हैं, यह उसकी समझ में नहीं आया। आकर बैठ जाता और देखता रहता, बस इतना। वे थोड़े-से लोग एक बात पढ़ते, उसे अपने शब्दों में दोहराते, पूछते कि परमेश्वर क्या कह रहा है, एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करते, और पिछले हफ़्ते की बात पर क्या किया — यह पूछकर आपस में बात करते। अनिल आता रहा। कुछ समय बाद, जिस आदमी ने वह ग्रुप शुरू किया था, उसने अनिल में कुछ देखा और पूछा कि क्या वह भी एक ग्रुप शुरू करेगा। अनिल ने शुरू कर दिया। घर जाकर, अब तक विश्वास न करने वाले एक पड़ोसी के साथ सृष्टि की बात पढ़ी। फिर उसी गली के एक और परिवार के साथ पढ़ी। उन्हें खींचा किसी शिक्षा ने नहीं, आँखों के सामने दिखे बदलाव ने। जो लोग लड़ते-झगड़ते और पीते हुए जीते थे, वे धीरे-धीरे बदलकर क्षमा करने लगे। यह देखकर पड़ोसी पूछने लगे — "ये ऐसे क्यों बदल गए?" अनिल की पत्नी ने यह सब देखकर ख़ुद अपना एक ग्रुप शुरू कर दिया। अब उन दोनों के बीच चार ग्रुप चल रहे हैं। उनमें रहने वालों में क़रीब-क़रीब हर एक अपने परिवार में यीशु का अनुसरण करने वाला पहला व्यक्ति है।
वह ग्रुप पढ़ने पर ही नहीं रुका। कोई मुश्किल में होता तो बाक़ी प्रेम दिखाते। अनिल की पत्नी को गंभीर बीमारी हुई और आस-पास के डॉक्टरों ने हाथ खड़े करके कह दिया कि वह बचेगी नहीं। ग्रुप ने प्रार्थना की। वह ठीक हो गई। बरसों पहले, जब अनिल और उसकी पत्नी के बच्चे नहीं थे, तब भी उन्होंने ऐसे ही प्रार्थना की थी। एक बेटा हुआ। इनमें से किसी एक को भी इन बातों का कोई प्रशिक्षण नहीं था। उन्होंने साथ मिलकर पवित्रशास्त्र पढ़ा। उसने जो कहा, वह किया। जो सिर्फ़ परमेश्वर कर सकता है, वह परमेश्वर पर ही छोड़ दिया।
अनिल ने आज तक अपनी नौकरी नहीं छोड़ी। उतने ही घंटे पेट्रोल पंप पर काम करते हुए, उसी काम के साथ-साथ वह एक मूवमेंट भी चला रहा है। इस पुस्तक के ख़त्म होने से पहले आप उससे फिर मिलेंगे। तब वह अलग-अलग देशों के लोगों से भरे एक कमरे को आशीष देता हुआ दिखेगा।
भारत से बहुत दूर, वही पहली आदत
यही ढंग भारत से बहुत दूर की जगहों में भी दिख रहा है। उसे समुद्र पार करते हुए मैं बरसों से देखता आ रहा हूँ।
सच तो यह है कि वह सदियों से समुद्र पार करता आ रहा है। और पार उसने क़रीब-क़रीब कभी उन बड़े लोगों के ज़रिए नहीं किया जिनके नाम इतिहास में टिके।
तीन सौ साल पहले, जर्मनी के हेर्नहूट नाम के एक छोटे क़स्बे में, अपने विश्वास के कारण देश छोड़कर आए कुछ शरणार्थियों ने एक काम शुरू किया: बारी-बारी से, दिन-रात बिना रुके प्रार्थना। वे दस्तकार थे, मज़दूर थे। पूर्णकालिक सेवक नहीं। वह प्रार्थना की घड़ी बिना रुके सौ साल चली। उसी छोटे क़स्बे से, उस सदी के ख़त्म होने से पहले, क़रीब तीन सौ मिशनरी पृथ्वी के छोर तक निकल पड़े। इसे कोई मिशन मूवमेंट कहे, उससे पीढ़ियों पहले यह हो चुका था।
कुछ समय बाद, इंग्लैंड में, मेथोडिस्ट हर हफ़्ते बारह-बारह के छोटे ग्रुपों में मिलते थे। हर ग्रुप को चलाने वाला एक सामान्य आदमी ही होता — कोई दुकानदार, कोई मज़दूर। पास्टर नहीं। वे एक-दूसरे से जो सवाल पूछते थे, वह यह: "तेरी आत्मा कैसी है?" अपना जीवन कैसे चल रहा है, यह वे एक-दूसरे को ईमानदारी से बताते। सामान्य विश्वासियों के एक-दूसरे को इस तरह हिसाब देने की वही आदत, आज हम जिसे डिस्कवरी ग्रुप कहते हैं उसका बड़ा हिस्सा है।
1904 में, इंग्लैंड के पास वेल्स देश में, इवान रॉबर्ट्स नाम के एक युवक ने अपने पूरे देश में एक जागृति फैलती देखी। वह कोयले की खान में काम कर चुका था। तब तक वह सेवकाई के प्रशिक्षण में ही था। एक ही साल के भीतर उस जागृति ने क़रीब एक लाख लोगों को मसीह के पास पहुँचाया। वह नामी प्रचारकों के ज़रिए नहीं फैली। गाँव के लोगों के ज़रिए ही, गाँव से गाँव फैली। उसका बड़ा हिस्सा गीतों के ज़रिए ही फैला।
इससे पहले, 1857 में, अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में, जेरेमायाह लैनफ़ियर नाम के एक कपड़ा व्यापारी ने अपना कारोबार बंद किया और एक सामान्य सेवक के तौर पर काम सँभाला। "दोपहर के समय एक प्रार्थना सभा रख रहा हूँ" — ऐसा लिखा हुआ एक छोटा-सा पर्चा उसने चिपका दिया। पहले दिन आए सिर्फ़ छह लोग। छह महीने बीतते-बीतते, उस पूरे शहर में हर रोज़ दस हज़ार लोग मिल रहे थे। उसके ख़त्म होने से पहले, उस एक आदमी की बुलाई हुई उस प्रार्थना सभा में से, क़रीब दस लाख अमेरिकी मसीह के पास आए।
आज भी वह समुद्र पार करता ही जा रहा है। आज भी वह सामान्य लोगों पर ही खड़ा है।
ग्रेग को मैं कुछ समय से जानता हूँ। वह एक बार भारत आकर भी गया है। वॉरेन और रूथ के खाने की मेज़ पर बैठने से बहुत पहले मैंने उसकी बात सुनी थी। वह अमेरिका के नेवाडा राज्य के मिंडेन नाम के क़स्बे में रहता है। एक मशीन शॉप चलाता है। दूर-दूर तक मोटरसाइकिल चलाता है। मसीही डर्टबाइक राइडरों का एक छोटा नेटवर्क उसने शुरू किया। उसकी पत्नी जीनी "हल्लेलूयाह टॉफ़ी" नाम से मिठाई बनाकर बेचती है। बाहर से देखने पर इनमें से कुछ भी मूवमेंट जैसा नहीं लगता। पर वह ठीक वही है।
उस राइडर नेटवर्क में डिस्कवरी ग्रुप को बारह से ज़्यादा ग्रुपों तक बढ़ते हुए ग्रेग ने अपनी आँखों से देखा। चमड़े की जैकेटों और न ख़त्म होने वाली सड़कों वाली वही दुनिया यीशु की महान आज्ञा का मैदान बन गई। उन राइडरों में से किसी ने ख़ुद को मिशनरी नहीं समझा। बरसों से साथ बाइक चलाते आ रहे मामूली लोग हैं वे। आज भी बाइक चला ही रहे हैं। उसके साथ-साथ पवित्रशास्त्र पढ़ रहे हैं। पूछ रहे हैं कि प्रभु उनसे क्या करने को कह रहा है।
हाल ही में ग्रेग ने सब राइडरों को एक दिन के लिए इकट्ठा किया। उस दिन का नाम उन्होंने रखा "डर्ट चर्च।" सत्तर लोग आए। वहीं ज़मीन पर सात छोटे ग्रुपों में बँटकर उन्होंने साथ मिलकर बाइबल खोली। ग्रेग जिस सत्रह लोगों के ग्रुप में था, वहाँ एक आदमी ने प्रार्थना के लिए कहा। उसका बेटा, सत्रह साल का लड़का, अभी-अभी डर्टबाइक दुर्घटना में मरा था। जो चाहें वे उस पर हाथ रखकर प्रार्थना करें — ग्रेग ने कहा। हर एक आकर हाथ रखे। आस्तीनें चढ़ाए बाइकर बेटा खो चुके उस पिता के कंधों के गिर्द बाँहें डालकर खड़े रहे। सबने मिलकर इफिसियों की पत्री का दूसरा अध्याय पढ़ा — मरे हुए होते हुए जिलाए जाने वाला भाग। आगे खड़े होकर चलाने वाला कोई नहीं था। प्रवचन भी नहीं था। एक मशीन शॉप के मालिक ने यह विश्वास किया कि उसके बाइक वाले दोस्त एक-दूसरे तक सुसमाचार पहुँचा सकते हैं। वे पहुँचा रहे हैं। काम में तीसरा मार्ग यही है।
यह बात सुनकर ऐलन ने उसे लपक लिया। ऐलन कौन है, यह आप भूमिका से जानते हैं। जैकी का पति। उस शुक्रवार वॉरेन और रूथ के भोज में मैं उससे पहली बार मिला था। उस रात उसने हमें बताया कि उसने ख़ुद से एक सीधा सवाल पूछा था: "ग्रेग अपने मोटरसाइकिल वाले दोस्तों के साथ यह कर सकता है, तो मैं अपने पिकलबॉल वाले दोस्तों के साथ क्यों नहीं?" उसने किया। भूमिका में मैंने कहा था — "यह बात आगे पूरी बताऊँगा।" वह बात यही है।
कुछ बरसों से उसके घर के आस-पास पिकलबॉल खेलने वाले दोस्तों की एक टोली बनती आई थी। उन्हें इकट्ठा करती आई थी कार्ली। भूमिका वाली वही कार्ली। उनकी कलीसिया की वह स्त्री, लोगों को सहज ही जोड़ लेने वाली। हर शुक्रवार वह सबको मैक्सिकन खाने और पिकलबॉल के लिए बुलाती। हमारी टीम के ज़रिए ऐलन के मन में डिस्कवरी ग्रुपों को लेकर जब लगन तेज़ हुई, तब उसने कार्ली से कहा: क्या तुम इन पिकलबॉल वाले दोस्तों के साथ एक ग्रुप शुरू करने के बारे में प्रार्थना करोगी? दोनों ने साथ खाना खाया। साथ प्रार्थना की। अलग-अलग भी प्रार्थना की। फिर कार्ली ने सबसे पूछा। दस दोस्त तैयार हो गए।
पहला डिस्कवरी ग्रुप शाम ढले मिला। खेल के मैदान के पास पार्क की बेंचों पर, कैंप की बत्तियों के नीचे, मच्छरों के काटते हुए वे बैठे। उस दिन का पढ़ा हुआ भाग: यीशु का तूफ़ान को शांत करना। तब से महीने में एक बार, नौ महीनों में नौ ग्रुप सभाएँ हुईं। वह ग्रुप अब पार्क की बेंचों से उठकर उस नए घर में आ गया है जहाँ आग के बाद ऐलन और जैकी रहने आए। जैकी पिकलबॉल नहीं खेलती। वह खाना बनाती है। मेज़ लगाती है। खाना, हँसी। उसके बाद सब हॉल में जाकर बाइबल खोलते हैं। जैकी उन स्त्रियों को एक-एक करके क़रीब से जानती जा रही है। वे उससे बहुत प्रेम करती हैं। महीने की सभा के अलावा, ऐलन और जैकी अब उनमें से हर एक से अलग से भी बात करते हैं, उनके साथ चलते हैं।
ग्रेग अपनी शॉप में है। ऐलन अपने पिकलबॉल कोर्ट के पास ही है। जैकी अपनी रसोई में ही है। कार्ली हमेशा की तरह दरवाज़ा खोलकर बुलाती ही रहती है। इनमें से किसी को तनख़्वाह नहीं मिलती, किसी के पास डिग्री नहीं। फिर भी हर एक, जिस दुनिया में वह पहले से जी रहा है, उसी में सुसमाचार ले जा रहा है।
आइडाहो में एक कॉफ़ी शॉप, एक रेस्टोरेंट के पीछे की रसोई
टॉम अमेरिका के आइडाहो राज्य में रहता है। इस साल की शुरुआत में, एक ही हफ़्ते में उसके आस-पास हुई दो बातें उसने मुझे बताईं।
पहली: पति को हाल ही में खो चुकी एक बहन ने क़स्बे की एक कॉफ़ी शॉप में, तीन और स्त्रियों के साथ एक डिस्कवरी ग्रुप शुरू किया। पहले अध्याय के अंत में मैंने कहा था — "आइडाहो में पति को खो चुकी एक बहन पहले ही शुरू कर चुकी है।" वही यह है। उन तीन में से एक अब हर हफ़्ते अपनी ही बेटी के साथ एक डिस्कवरी ग्रुप चला रही है।
दूसरी: माइकल नाम का अट्ठाईस साल का युवक। टॉम का परिवार जिस वियतनामी रेस्टोरेंट में खाना खाने जाता है, वहाँ वह सर्वर का काम करता है। एक दिन माइकल ने टॉम को एक तरफ़ बुलाकर कहा, "मुझे आपसे बात करनी है।" तब से वे दोनों हर हफ़्ते उसी रेस्टोरेंट के पीछे की रसोई में मिलकर डिस्कवरी ग्रुप करने लगे। पाँचवीं सभा के बाद टॉम ने पूछा कि क्या हम यीशु को जीवन में बुलाने की प्रार्थना करें। माइकल ने की।
चिनूक में एक पिता, एक माँ
मेरी पत्नी सारा के माता-पिता ब्रेंट और नैंसी हैं। मेरे उनसे मिलने से बहुत पहले से वे सामान्य शिष्यों की तरह जीते आ रहे हैं।
वे रहते हैं अमेरिका के मोंटाना राज्य में, चिनूक नाम के एक छोटे क़स्बे में। चारों ओर गेहूँ के खेत, ऊपर बड़ा भूरा आसमान, क़स्बे की आबादी क़रीब बारह सौ। नवंबर 1995 में, सारा के होने वाले पति के रूप में मैं पहली बार चिनूक गया। पहुँचते ही ब्रेंट ने मेरे हाथ में बर्फ़ हटाने वाला फावड़ा थमाया और घर के सामने का रास्ता दिखा दिया। मैं जन्मा और पला दुनिया की दूसरी तरफ़। ज़िंदगी में तब तक बर्फ़ पास से देखी ही नहीं थी। एक भारी हरा कोट पहनकर, उस भूरे आसमान को देखता हुआ, काँपता हुआ मैं उस रास्ते पर खड़ा रहा। साल के छह महीने फ़्रिज के भीतर जीने के लिए लोग क्यों तैयार होते हैं, यह मेरी समझ में नहीं आया। तब मैं चौबीस साल का था। धूप वाले देशों से आया दुबला-पतला लड़का। तब तक न देखा हुआ एक अमेरिकी औज़ार हाथ में पकड़े खड़ा था। वह हरा कोट मेरे बदन से उतरा ही नहीं। घर में भी पहना, बाहर भी पहना। बिजली वाले कंबल के नीचे भी उसे पहने ही सोया। मैं बर्फ़ से कुश्ती लड़ता और ब्रेंट बरामदे से देखकर मज़ा लेता। शायद सोचता होगा कि यह लड़का कितने दिन टिकेगा।
मेरे पिता एक बार मोंटाना आए। जो भी काम वे करते हैं, जैसे करते हैं — वैसे ही आए। हवा की तरह, जिसका अंदाज़ा कोई न लगा सके। अमेरिका में किसी के घर जाना हो तो पहले फ़ोन करके कैलेंडर में लिखना पड़ता है। मेरे पिता ने तो लंबी दूरी की बस का टिकट लिया, पूरा देश पार किया, चिनूक के पास बस अड्डे पर उतरे, और फ़ोन करके कहा — "मैं आ गया हूँ।" सारा के माता-पिता, जिस आदमी से वे कभी मिले तक नहीं थे, उसके लिए बीस मील गाड़ी चलाकर गए। उसके बाद, मोंटाना की उस छोटी रसोई में, मेरे पिता ने उन्हें मछली का सालन बनाकर खिलाया। इस बात का मुझे आज तक यक़ीन नहीं होता। मैं उन्हीं के घर में पला। उन्हें एक बार भी खाना बनाते नहीं देखा। धरती के दो छोरों से आए दो परिवार। एक सब कुछ पहले से तय करने वाला, दूसरा तय ही न करने वाला। वे दोनों सालन के एक भगोने के चारों ओर एक हो गए। आख़िर में वे अच्छे दोस्त बन ही गए।
ब्रेंट को टीवी पर खेल देखना अच्छा लगता है। ज़मीन जमी न हो तो गोल्फ़ खेलते हैं। उन्होंने मुझे ख़ूब सँभाला। पर दामाद को छेड़ना भी उन्हें ख़ूब आता था। मोंटाना के ससुर के प्रेम की भाषा वही है। मेरे बड़े पैरों को लेकर और हमारे रिश्तेदारों के न बोले जा सकने वाले नामों को लेकर वे मुझे छेड़ते। मैंने भी उतनी ही मज़बूती से पलटकर छेड़ना सीख लिया। उनके स्तर तक पहुँचने में कुछ समय ज़रूर लगा। नैंसी ने बेटियों को पालते हुए पूरे समय की नौकरी की। उन दोनों में से कोई कभी तनख़्वाह पाने वाला मिशनरी नहीं रहा। उनका अपना काम था। अपना घर था। अपना क़स्बा था।
पड़ोसी क़स्बे हैव्रे के मसीही रेडियो स्टेशन के बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में ब्रेंट ने कितने ही साल सेवा की। 1983 में एक ही छोटे प्रसारण से शुरू हुआ वह स्टेशन, उनके हाथों बढ़कर, पूरे मोंटाना में, कनाडा तक और साल्ट लेक सिटी तक सुनाई देने वाला स्तुति गीतों का रेडियो नेटवर्क बन गया। अब वह ज़िम्मेदारी उन्होंने किसी और के हाथ में सौंप दी है।
रोज़ के जीवन में उन्होंने जो किया, वह सरल काम ही थे। अपने क़स्बे के लिए प्रार्थना की। उनके घर का दरवाज़ा हमेशा खुला रहा। बाइबल स्टडी चलाईं, बच्चों के गर्मियों के बाइबल स्कूल चलाए। मुश्किल में पड़े लोगों के साथ प्रार्थना की, साथ खड़े रहे। पकाकर खिलाया, सँभालकर रखा, अपने क़स्बे के लिए रोशनी बने रहे। प्रभु जहाँ भेजने को कहे, वहाँ पैसा भेजा। परमेश्वर उनके आस-पास क्या कर रहा है, यह सुनते हुए चले। बेटियों को सेवा के दिल के साथ दुनिया में भेजा। सारा किशोरावस्था में ही दो बार भारत आई। क्योंकि बचपन से जो हवा उसने ली, वही यह थी।
आज भी वे वही कर रहे हैं। इस हफ़्ते प्रभु उनसे क्या चाहता है, यह आज भी पूछते हैं। जो वे उससे सुनते हैं, वह आज भी पड़ोसियों के साथ बाँटते हैं।
उन्होंने क्या भेजा, यह देखिए। 1993 में, अपनी सत्रह साल की बेटी को, मेरे पिता के चलाए बच्चों के आश्रम की इमारत पर कंक्रीट की छत डालने जा रही एक वर्क टीम के साथ हवाई जहाज़ में बिठाकर भारत भेजा। अगले साल फिर भेजा। दो साल बाद, 5 जनवरी 1996 को, चिनूक की अपनी कलीसिया में सारा को विवाह की वेदी तक ले गए। कुछ ही महीनों से जाने-पहचाने एक चौबीस साल के भारतीय लड़के को अपनी बेटी सौंप दी। उन्होंने तब तक मेरा देश देखा नहीं था। मेरे पिता को छोड़कर मेरे परिवार में किसी से मिले नहीं थे। फिर भी परमेश्वर पर भरोसा रखकर उन्होंने उस विवाह को आशीष दी।
2000 में जब हम सेमिनरी पूरी करके मिशनरी जीवन में उतरे, ब्रेंट और नैंसी हमारे पीछे खड़े रहे। हमारे पारिवारिक जीवन के हर दौर में अपनी बेटी के साथ खड़े रहे। काम छोटा था तब भी प्रार्थना की। काम बढ़ा और उसके साथ बोझ भी बढ़ा, तब भी प्रार्थना की। आज भी करते ही रहते हैं। हम सफ़र में कहाँ हैं, यह देखते ही रहते हैं।
रविवार दोपहर टीवी पर खेल देखने वाले, ज़मीन पिघले तो गोल्फ़ खेलने वाले, नवंबर में अपने घर के सामने की बर्फ़ ख़ुद हटाने वाले मामूली अमेरिकी हैं वे। उनके पास कभी बड़ा मंच नहीं रहा। पर हमारे लिए, अपने पूरे बड़े परिवार के लिए उन्होंने प्रार्थना की, प्रेम किया, और विश्वासयोग्य नमूने की तरह खड़े रहे।
हो सकता है वे प्रेरित न हों। पर प्रेरितों का काम ही ऐसे लोगों को जगाना है। और ये तो कब के जागकर काम में उतर चुके हैं।
आप अभी जो हैं
पहली आदत के लिए बड़प्पन नहीं चाहिए, प्रशिक्षण नहीं चाहिए, डिग्री नहीं चाहिए। आप जहाँ पहले से हैं वहीं, जैसे हैं वैसे ही, परमेश्वर के हाथ में काम के लिए तैयार हो जाना — यही पहली आदत है।
दूसरी आदत है परमेश्वर की आवाज़ सुनना। उसकी बात अगले अध्याय में करेंगे।
मनन के लिए
सुनकर, आज्ञा मानकर, और एक आदमी की मदद करके — उसी पल में आप सामान्य शिष्य बन जाते हैं। बरसों के प्रशिक्षण के बाद नहीं। तो अब तक आपको रोका किस बात ने?
प्रभु ने आपको जिस मामूली जगह पर पहले से रखा है, वह कौन-सी है? वे लोग कौन हैं जिन तक सिर्फ़ आप पहुँच सकते हैं?
आप जहाँ पहले से रह रहे हैं वहीं, किसके साथ मिलकर बाइबल खोल सकते हैं? ऐसे दो-तीन लोग कौन हैं?
चौथा अध्याय32 मिनट
परमेश्वर की आवाज़ सुनना
यह दूसरी आदत है। और हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए, चारों में सबसे कठिन भी यही है।
दो सौ साल से हमें एक ही बात सिखाई गई है — शिष्य उपदेश से बनते हैं। पास्टर कलीसिया को उपदेश देता है। सेमिनरी पास्टर को सिखाती है। बाक़ी हम सबको किताबें और पॉडकास्ट सिखाते हैं। इन सबमें भला है। मेरा अपना जीवन भी इन्हीं से बहुत कुछ गढ़ा गया है।
उपदेश देना पवित्रशास्त्र के अनुसार ही है। पर उससे भी गहरी एक नींव है। परमेश्वर अपने लोगों में से हर एक से सीधे बात करता है। हर एक व्यक्ति प्रभु की आवाज़ सुन सकता है।
डिस्कवरी क्या है? एक पुराने विश्वास को फिर से पा लेना। वह विश्वास यह है — पवित्र आत्मा पवित्रशास्त्र में से सामान्य शिष्यों से सीधे बात करता है। जिस दिन यह विश्वास हमारे भीतर उतर जाता है, उस दिन हमारा काम ही बदल जाता है। अब बाइबल को खोल-खोलकर उन्हें समझाने की ज़रूरत नहीं रहती। हम ऐसे सवाल पूछते हैं जो उन्हें उसके सामने खड़ा कर दें। बाक़ी उसी पर छोड़ देते हैं।
यह मत सोचिए कि यह नए लोगों के लिए बनाया गया कोई तरीक़ा है। यह सबसे पुराना तरीक़ा है। स्वयं यीशु इसी तरह जीए। उसी ने कहा कि पुत्र अपने आप से कुछ नहीं कर सकता, वही करता है जो पिता को करते हुए देखता है। यह भी कहा कि वह अपनी ओर से नहीं बोलता। क्या कहना है और कैसे कहना है, यह भेजनेवाले पिता ने ही उसे दिया।
एक बार सोचिए। परमेश्वर का पुत्र गलील की सड़कों पर चल रहा है। हर दिन पिता की सुनते हुए ही जी रहा है। पिता को चंगा करते जो देखा, उसी को चंगा किया। पिता को कहते हुए जो सुना, वही कहा। परमेश्वर का पुत्र ही ऐसे जीया। इसका अर्थ है कि परमेश्वर के साथ जीवन का केंद्र हमेशा उसकी आवाज़ सुनना ही रहा है। सिखानेवाले के लिए भी, और सीखनेवाले के लिए भी।
अब सामान्य विश्वासी के लिए सबसे बड़ी बात यह है। मरने से पहले वाली रात यीशु ने अपने मित्रों से कहा — मेरा जाना ही तुम्हारे लिए अच्छा है, क्योंकि मैं आत्मा को भेजूँगा। वही तुम्हें सारे सत्य में ले चलेगा। देखिए क्या हुआ। परमेश्वर की आवाज़ सुनने का जो जीवन वह स्वयं जीया, वही उसने हमारे हाथ में सौंप दिया। जो आत्मा पुत्र से बात करता था, वही आत्मा अब दुकानदार से बात करता है। माँ से बात करता है। किशोर बच्चों से बात करता है। परमेश्वर ने अपनी आवाज़ पुलपिट पर खड़े होनेवालों के लिए बचाकर नहीं रखी। उसने वह पुत्र को दी, और पुत्र के द्वारा हम सबको दे दी। उसकी चाह यही है कि हममें से हर एक उसकी आवाज़ स्वयं सुने।
इस सुनने के दो पहलू हैं।
एक पहलू है, अपने जीवन के लिए सुनना। तब आप बढ़ते हैं। जिस बात में अगला क़दम आज्ञा मानना है, वह वही दिखाता है। धीरे-धीरे, वह जिस नए मनुष्य को गढ़ रहा है, आप वही बनते चले जाते हैं।
दूसरा पहलू है, किसी और के लिए सुनना। तब आप उसी काम में क़दम रख देते हैं जो यीशु हर दिन करता रहा। वह पास बैठे मित्र के लिए एक शब्द हो सकता है। जिस व्यक्ति के लिए आप प्रार्थना कर रहे हैं, उसमें प्रभु क्या कर रहा है — इसका एक बोध हो सकता है। यीशु ने भी अपने सामने खड़े व्यक्ति के लिए पिता की सुनी, और जो सुना वही किया।
अपने लिए सुनना आपकी बढ़ोतरी का रास्ता है। दूसरों के लिए सुनना, यीशु की सेवकाई में आपका पहला क़दम है। तीसरा मार्ग परमेश्वर के बारे में सोचने का कोई तरीक़ा भर नहीं है। यह किसी दूसरे व्यक्ति के साथ मिलकर प्रभु के सामने खड़े होने का जीवन है।
वह सूबेदार जिसने किसी प्रेरित के पहुँचने से पहले सुन लिया
आगे बढ़ने से पहले एक और सामान्य शिष्य से आपको मिलवाना है। उसका नाम कुरनेलियुस है। प्रेरितों के काम, दसवाँ अध्याय।
कुरनेलियुस कैसरिया नगर में एक रोमी सूबेदार था। सौ सिपाहियों का अधिकारी। वह यहूदी नहीं था। फ़िलिस्तीन पर राज करती रोमी सेना में काम करता था। रुतबेवाला, काबिल आदमी। पर उस इलाक़े के यहूदियों की नज़र में वह बाहर का आदमी था, वाचा के लोगों में गिना न जानेवाला। उन दिनों कोई भी धर्मगुरु उसे देखकर रास्ता बदल लेता।
ऐसे आदमी के बारे में लूका ने क्या लिखा, यह देखिए — वह भक्त था। प्रार्थना करता था, और ज़रूरतमंदों को खुले हाथ से देता था। उसके पास अपनी कोई बाइबल नहीं थी। न कोई गुरु था, न अर्थ समझानेवाला कोई प्रेरित। इस्राएल के परमेश्वर के बारे में जितना उस तक पहुँचा था, उतना जानते हुए चलनेवाला एक आदमी। बस इतना ही।
एक दिन दोपहर क़रीब तीन बजे, एक दर्शन में उसे स्वर्गदूत दिखाई दिया। उसने कहा कि तेरी प्रार्थनाएँ और तेरे दान परमेश्वर के सामने पहुँच गए हैं। तीस मील दूर, याफ़ा नगर में रहनेवाले पतरस नाम के एक आदमी को बुलवा ले। पता भी स्वर्गदूत ने ही बताया — "समुद्र के किनारे शमौन नाम एक चमड़े के धन्धा करनेवाले के यहाँ।" स्वर्गदूत का निर्देश बस इतना था। न कोई धर्मविज्ञान, न कोई व्याख्या। उस आदमी को बुलवा ले, और वह जो कहे उसे सुन।
कुरनेलियुस ने वैसा ही किया। दो नौकरों को और एक भक्त सिपाही को बुलाकर उसी घड़ी याफ़ा के रास्ते पर लगा दिया।
पतरस आया। हफ़्ता भर पहले तक जो पतरस किसी ग़ैर-यहूदी के घर में पैर तक नहीं रखता था, वही कुरनेलियुस के घर में आकर देखता है तो कमरा लोगों से भरा हुआ है। कुरनेलियुस ने उन्हें पहले ही इकट्ठा कर रखा था — अपने रिश्तेदारों को, अपने जिगरी दोस्तों को, अपने घरवालों को। उस सूबेदार ने परमेश्वर की आवाज़ सुनी। और पतरस के आने से पहले ही, परमेश्वर ने जो लोग उसे दिए थे, उन्हें अपने साथ सुनने के लिए बटोर लिया।
पतरस ने बोलना शुरू किया। शुरू करते ही पवित्र आत्मा उस पूरे कमरे पर उतर आया। ग़ैर-यहूदियों को भी आत्मा मिलते देखकर पतरस के साथ आए यहूदी विश्वासी चकित रह गए। तब पतरस ने कहा — "क्या कोई जल की रोक कर सकता है कि ये बपतिस्मा न पाएँ, जिन्होंने हमारे समान पवित्र आत्मा पाया है?" उसी दिन उन्होंने बपतिस्मा लिया। कुरनेलियुस और उसके घर के सब लोग।
इस घटना में चारों आदतें देखिए।
पहली आदत — सामान्य शिष्य। पेशे से सिपाही, धार्मिक व्यवस्था में जिसकी कोई जगह नहीं थी।
दूसरी आदत — परमेश्वर की आवाज़ सुनना। किसी प्रचारक के पहुँचने से पहले ही, दर्शन में स्वर्गदूत उसके पास आया।
तीसरी आदत — आज्ञा मानना। सुनते ही उठ खड़ा हुआ, और उसी घड़ी आदमी भेज दिए।
चौथी आदत — दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। अपने परिवार को और दोस्तों को अपने साथ भीतर ले आया।
इस घटना में प्रेरित पतरस की भूमिका सच्ची है, पर वह दूसरे नंबर पर आती है। चाहता तो प्रभु पहले पतरस से कहकर उसे कुछ न जाननेवाले कुरनेलियुस के पास भेज सकता था। पर उसने ठीक इसका उलटा किया। पहले बात कुरनेलियुस से ही की। परमेश्वर जो काम पहले ही शुरू कर चुका था, उसकी पुष्टि करना और उसे समझाना — बस यही पतरस का काम बना।
प्रेरित इसलिए हैं कि सामान्य शिष्यों को काम में खड़ा करें, उनकी जगह लेने के लिए नहीं।
जिस तरह कुरनेलियुस से बात की, उस तरह बोलना परमेश्वर ने कभी नहीं छोड़ा। सारी दुनिया में, और ख़ासकर उन जगहों में जहाँ सुसमाचार पहुँचना सबसे कठिन है, यीशु लोगों से सपनों और दर्शनों के ज़रिए मिलना पसंद करता है। वहाँ गली के नुक्कड़ पर कोई कलीसिया नहीं है, सौ मील के भीतर कोई प्रचारक नहीं है। फिर भी वह आता है। जिस तरह बिना बाइबल के, बिना किसी प्रेरित के पहुँचे, एक रोमी सिपाही के पास आया — ठीक वैसे ही।
सारी दुनिया में अनगिनत स्त्री-पुरुष आपको बताएँगे कि किसी मसीही से मिलने से पहले ही, उन्होंने सपने में उजले वस्त्र पहने एक व्यक्ति को देखा। बिना किसी नाटक के, बहुत साधारण ढंग से बताएँगे। बताकर, उसी को ढूँढ़ने निकल पड़ेंगे। यह कोई अविश्वसनीय अजूबा नहीं है। जिन लोगों तक कोई मिशनरी नहीं पहुँच सकता, उन तक परमेश्वर के पहुँचने के आम रास्तों में से यह एक है।
जहाँ अँधेरा गाढ़ा है, वहाँ भी वह आज तक लोगों को छुड़ाता आ रहा है। एक गाँव में, अँधेरा होने के बाद लोग घर की देहरी नहीं लाँघते थे। सब जानते थे कि उस गाँव पर कुछ है। कुछ सामान्य विश्वासी उस गाँव में गए और हफ़्ते दर हफ़्ते प्रार्थना करते रहे। आख़िर वह डर भाग गया। गाँव के लोग फिर से शामों में बाहर निकलने लगे।
वहाँ न कोई मंच था, न कोई नामी बड़ा आदमी। बस कुछ ही शिष्य थे जिन्होंने विश्वास किया कि जिसने उन्हें डर के बंधन में रखा है, प्रभु उससे बलवान है। और प्रभु सचमुच बलवान निकला।
क़ब्रों के बीच रहनेवाला वह आदमी याद है? इस पुस्तक में आगे चलकर आप उससे मिलेंगे। इस लंबी कतार में पहला वही है। कोई ज़ंजीर उसे बाँध नहीं सकी, पर यीशु के मुँह के एक शब्द ने उसे छुड़ा दिया। बाद में वही दस नगरों में सुसमाचार की आवाज़ बन गया।
वह रात, जब अँधेरे रेल डिब्बे में बाइबल जगमगा उठी
यह फ़र्क़ मुझे पहली बार तब समझ आया जब मेरी उम्र बीस साल थी।
भारत के एक बड़े शहर में मैंने अपनी धर्मविज्ञान की पढ़ाई अभी-अभी पूरी की थी। जिस विश्वविद्यालय की स्थापना में विलियम कैरी ने मदद की थी, उसी से जुड़े कॉलेज में पढ़ा। कक्षा में पहला। सिर में यूनानी भाषा, कंठस्थ किए हुए सिद्धांत, एक प्रशिक्षित मसीही के पास जो-जो सामान होना चाहिए, सब मेरे पास था। पर अमेरिका के आर्कन्सा राज्य से, लिटिल रॉक शहर से आए एक प्रचारक के सामने वह सब मुझे तैयार नहीं कर पाया। उन्होंने मेरी अंकतालिका माँगी तक नहीं।
नवंबर 1991 में पास्टर रॉबर्ट हमारे शहर में मेरे पिताजी की सेवकाई में आए। उनके साथ भाई डेविड और भाई जोसफ़ थे। नए नियम जिस अर्थ में कहता है, उस अर्थ में पास्टर रॉबर्ट एक प्रेरित थे। पास ही वे एक सम्मेलन चला रहे थे। उनके संदेशों का अंग्रेज़ी से हमारे लोगों की भाषा में अनुवाद मैं कर रहा था।
सम्मेलन ख़त्म होने के बाद पास्टर रॉबर्ट की टीम को रेल से एक बड़े शहर जाना था, और वहाँ से उत्तर की ओर हवाई जहाज़ पकड़ना था। मुझे उन्हें रेलवे स्टेशन पर छोड़कर घर लौटना था। योजना यही थी। पर प्लेटफ़ॉर्म पर भी पास्टर रॉबर्ट मुझसे बात करते ही रहे। मसीह में हमारी पहचान के बारे में, नई सृष्टि बन जाने के बारे में, स्वर्गीय स्थानों में बिठाए जाने के बारे में कहते चले गए। धर्मविज्ञान के कॉलेज में जिन बातों को मैंने सिद्धांत के वाक्यों की तरह रटा था, वही अब ऐसे सत्यों की तरह मेरे भीतर उतर रही थीं जिनकी ज़रूरत का मुझे पता तक नहीं था।
उन्होंने कहा, "हमारे साथ चल।"
मैंने टिकट लिया और रेल में चढ़ गया।
पूरी रात का सफ़र। वे बाइबल खोलते ही रहे। उस रेल में मैंने जो देखा, उसे शब्दों में नहीं रख सकता। सबसे पास की बात इतनी ही है — अँधेरे डिब्बे में वे शब्द जगमगा रहे थे। धर्मविज्ञान के कॉलेज में नोट्स लेते हुए जो पन्ने पढ़े थे, वही पन्ने भीतर से जल उठे थे। वही शब्द मैं किसी और ही तरह पढ़ रहा था। तोड़-तोड़कर समझ नहीं रहा था। सुन रहा था।
डिस्कवरी यही है। तब मेरी उम्र बीस साल थी। भारत की एक रेल में, उस आर्कन्सा के प्रचारक के पास बैठा था जो हर सुबह घुटने टेककर कहता था, "पवित्र आत्मा, आज पवित्रशास्त्र में से मुझे सिखा।"
एक बात — ज़्यादातर डिस्कवरी चलती रेल में जगमगाते पन्ने नहीं होतीं। वे एक मेज़ के पास होती हैं, आधे घंटे में। एक पाठ, एक मित्र, "प्रभु क्या कह रहा है?" यह सवाल, और जवाब की बाट जोहती एक चुप्पी। जगह बदल सकती है, पर ढंग वही रहता है।
ऐसा करते हुए मैंने इससे पहले किसी को नहीं देखा था। बरसों से मेरे पिताजी की सेवकाई में विदेशी प्रचारक आते रहे। उन्होंने उपदेश भी अच्छा दिया। पर यह अलग था। पास्टर रॉबर्ट और वे भाई बाइबल खोलकर, पहली बार पढ़नेवालों की तरह, उससे कहते कि वह उनसे बात करे। उस पूरे सफ़र में, हर दिन, मैंने उन्हें ऐसा करते देखा।
उस शहर से पास्टर रॉबर्ट की टीम उत्तर में अपने अगले सम्मेलन के लिए हवाई जहाज़ से जा रही थी। मुझे भी साथ ले गए। वही मेरी ज़िंदगी की पहली हवाई यात्रा थी। 4 दिसंबर 1991 को उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर प्रार्थना की। मेरे भीतर कुछ हुआ। आज तक उसे शब्दों में नहीं रख पाया।
उसके बाद हफ़्तों तक मुझमें इतनी शक्ति भरी रही कि लगता था दुनिया जीत लूँगा। भारत के लिए विश्वास प्रभु ने उसी रेल में मेरे भीतर उँडेला, और उस सम्मेलन केंद्र में उसे पक्का कर दिया। उस रात से प्रभु ने इस काम के लिए अपने दर्शन के बारे में, अपनी चाहतों के बारे में मुझसे सीधे बात करना शुरू किया। मैं सुनता गया और वे मेरी अपनी हो गईं। तब से मेरा पूरा जीवन उसी बातचीत के भीतर चल रहा है।
मैं घर कोई नई जानकारी लेकर नहीं लौटा, एक नया रुख़ लेकर लौटा।
तीन सवाल, और उनके पीछे तीन और
इन दो रुख़ों का फ़र्क़ मुझे सबसे सीधे किसने समझाया, पता है? भारत में, बीस-इक्कीस की उम्र में ही डिस्कवरी ग्रुप चलाना शुरू करनेवाली एक युवा बहन ने। पिछले अध्याय में जिसका ज़िक्र किया, वही इक्कीस साल की लड़की। उसने मुझसे यह कहा — "कोई किसी पास्टर के पास या बड़े के पास जाता है, तो वे सब कुछ सिखाने लगते हैं। सुननेवाले को कुछ समझ नहीं आता। पर जब हम यह साथ मिलकर करते हैं, हम कुछ सिखाते ही नहीं। वे ख़ुद समझ जाते हैं।"
पहले दो मार्गों और तीसरे मार्ग का फ़र्क़ उसी एक बात में है। पहले दो मार्गों में पास्टर सिखानेवाला है और विश्वासी विद्यार्थी। बात हमेशा एक ही तरफ़ से आती है। तीसरे मार्ग में अगुवाई करनेवाला व्यक्ति घर के मेज़बान जैसा है। विश्वासी उसके साथ बैठकर सुननेवाला साथी है। बात दोनों तरफ़ चलती है।
यह रुख़ हमारी पीढ़ी में जड़ पकड़े, इसके लिए परमेश्वर एक छोटा-सा साधन इस्तेमाल कर रहा है। वही है डिस्कवरी ग्रुप। इतना सरल कि कोई भी इस्तेमाल कर सके। यह एक साधन है, इकलौता साधन नहीं। पर इस रुख़ को सामान्य शिष्यों के बीच तक पहुँचाने में सबसे ज़्यादा काम इसी ने किया है। पिछले चालीस वर्षों में डेविड वॉटसन, उनके बेटे पॉल वॉटसन और जेरी ट्राउसडेल जैसों के काम से यह गढ़ा गया। अब उस धारा की अगुवाई न्यू जनरेशन्स और फ़ाइनल कमांड संस्थाओं में हैरी ब्राउन कर रहे हैं।
डिस्कवरी ग्रुप कैसे होता है, बताता हूँ। कुछ लोग मिलते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि वे मसीही ही हों। पहले एक-दूसरे का हाल-चाल पूछते हैं — हर एक एक बात बताता है जिसके लिए वह धन्यवादी है, और एक बात जो उस पर बोझ है। पिछली बार जो करने को कहा था, वह कैसा रहा, यह बताते हैं। फिर एक पाठ खोलते हैं। अक्सर वह एक कहानी ही होती है। ज़ोर से पढ़ते हैं, और ठीक-ठीक समझ आया या नहीं यह देखने के लिए अपने ही शब्दों में दोहराते हैं। फिर, इन सवालों के सहारे साथ मिलकर खोजते हैं —
यह पाठ परमेश्वर के बारे में क्या दिखाता है? मनुष्यों के बारे में क्या दिखाता है?
सुनते हुए प्रभु आपसे क्या कह रहा है? क्या दिखा रहा है? कोई शब्द, कोई दृश्य, कोई बोध?
इस हफ़्ते आप क्या बदलाव करेंगे?
हर एक आज्ञा माननेवाला एक काम तय करता है। फिर एक-दूसरे को आगे भेजते हैं —
इस हफ़्ते हम एक-दूसरे की क्या मदद कर सकते हैं?
इस कमरे के बाहर हम किसकी सेवा कर सकते हैं?
यह बात किससे कहने के लिए प्रभु आपके मन में डाल रहा है?
ध्यान दिया? यह असल में कोई सिखाने का तरीक़ा है ही नहीं। न कोई उपदेश, न कोई विशेषज्ञ, न कोई व्याख्या। बस इतना है — पाठ, कमरे में बैठे लोग, और पवित्र आत्मा।
प्रशिक्षित मसीही अगुवों को यह असहज लगता है। मैंने कितने ही पास्टरों को डिस्कवरी ग्रुप चलाने की कोशिश करते और दूसरी ही बैठक में फिर से उपदेश में फिसल जाते देखा है। यह उनका दोष नहीं। वे रुक नहीं पाते, बस इतना। वे सिखाने के लिए ही गढ़े गए हैं। उस वरदान को थोड़ी देर के लिए एक तरफ़ रख देना आसान नहीं।
सिर्फ़ पास्टर ही नहीं। हममें से क़रीब-क़रीब सब ऐसे ही बने हैं। हम तुरंत कुछ कर डालनेवाले लोग हैं। किसी से प्रेम जागते ही, उसके हाथ में कुछ न कुछ थमा देने का मन करता है — एक पाठ, एक साधन, एक वचन जिसने हमें सँभाला था। यानी तुरंत जानकारी ही पकड़ा देते हैं। क्योंकि भीतर-भीतर हम यही मानते हैं कि काम जानकारी ही करती है। अच्छे से समझा दिया तो आदमी बदल जाएगा।
पर जानकारी किसी को नहीं बदलती। बदलती होती तो जिसे बाइबल ज़्यादा मालूम है, वही यीशु जैसा ज़्यादा होता। लोगों को बदलती है यह बात, कि उन्होंने किसी को उसे जीते हुए देखा। आप एक ग्रुप शुरू करते हैं, तो वह "कोई" आप ही हैं। आपमें लोगों को जो हिम्मत और अधिकार दिखता है, वह आपकी पढ़ी हुई किताबों से नहीं आया। वह परमेश्वर के प्रति आपकी नम्र आज्ञाकारिता से ही आया है। डिस्कवरी ग्रुप चलाते समय छिपाइए मत। लोगों को देखने दीजिए कि आप परमेश्वर की आवाज़ सुनते हैं। कठिन काम में आज्ञा मानते हुए देखने दीजिए। दूसरों की मदद करते हुए देखने दीजिए। देखते-देखते उनके भीतर एक बात जागती है — शायद यह मैं भी कर सकता हूँ। जो कोई उपदेश नहीं कर सकता, वह आपका जीवन कर देता है।
इसलिए तरीक़े में मत उलझिए। कुछ लोग इसे डिस्कवरी ग्रुप कहते हैं। कुछ डिस्कवरी बाइबल स्टडी कहते हैं। कुछ बस इतना कहते हैं कि दोस्तों के साथ बाइबल पढ़ना। पहले जिनका ज़िक्र किया, वेल्स के उन प्रार्थना-घरों के ग्रुपों का अपना नाम था। आपके लोगों को जो नाम सहज लगे, वही रखिए। आपके लोगों पर कोई दूसरे सवाल ज़्यादा ठीक बैठते हों, तो बदल लीजिए। न बदलने योग्य सिर्फ़ चार हैं — सामान्य शिष्य, परमेश्वर की आवाज़ सुनना, परमेश्वर की आज्ञा मानना, और दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। शुरुआत अपने ही लोगों से कीजिए। और सबसे बढ़कर, जीकर दिखाइए। क्योंकि आप जो कहते हैं उसके पीछे चलने से बहुत पहले, लोग वह देखकर चलते हैं जो आप जीते हैं।
बहुत-से विश्वासी सोचते हैं कि डिस्कवरी ग्रुप उन्हीं के लिए हैं जिन्होंने सुसमाचार नहीं सुना, और वह भी हमारे रहने की जगह पर नहीं, कहीं और। यही सोचकर वे शुरू ही नहीं करते। वे किसी अविश्वासी को नहीं जानते, या जानते भी हैं तो उन्हें इकट्ठा नहीं कर पाते — तो बात वहीं रुक जाती है।
पर सुनिए — डिस्कवरी ग्रुप विश्वासियों के लिए भी बहुत बड़े प्रशिक्षण के साधन हैं। पढ़ना, सुनना, आज्ञा मानने का एक छोटा काम, और हफ़्ते दर हफ़्ते लौटकर बताना। असली प्रशिक्षण यही है। जो सवाल अविश्वासियों के लिए दरवाज़े खोलते हैं, वही सवाल सोए हुए विश्वासियों को भी जगा देते हैं। उन्हें परमेश्वर की आवाज़ ख़ुद सुनना सिखाते हैं, और दूसरों की मदद करने भेज देते हैं। डिस्कवरी ग्रुप एक ही समय में दो काम करता है — दूर हो चुके लोगों को पास लाता है, और काम करनेवाले तैयार करता है।
प्रशिक्षण की दुनिया यह बात बिलकुल उलटी सिखाती है। यह ग़लती मैंने भी की है। हम लोगों से कहते हैं — शुरू करने से पहले काबिलियत आनी चाहिए। प्रार्थना करना सीखो, परमेश्वर की आवाज़ सुनना सीखो, गवाही देना सीखो, कोर्स पूरा करो, वीडियो देखो। फिर, तैयार हो जाने के बाद, जाकर कुछ शुरू करो। नतीजा? लोग इंतज़ार करते रह जाते हैं। आज तक इंतज़ार ही कर रहे हैं।
पर इनमें से कोई भी पहले से पूरी की जानेवाली शर्त नहीं है। ये सब कक्षा में नहीं, ग्रुप के भीतर ही बढ़ते हैं। प्रार्थना करना कैसे सीखते हैं? प्रार्थना पर क्लास सुनकर नहीं। सामने बैठी सहेली की माँ बीमार पड़ जाए, तब उसके लिए प्रार्थना करके ही। परमेश्वर की आवाज़ सुनना कैसे सीखते हैं? हफ़्ते दर हफ़्ते उसी खुले पाठ के सामने बैठकर, "प्रभु, तू क्या कह रहा है?" पूछकर ही। अपनी गवाही देना कैसे सीखते हैं? एक ही दोस्त को बताकर। पहली बार लड़खड़ाएँगे, दूसरी बार बेहतर कहेंगे। एक पाठ, कुछ दोस्त, और चलता हुआ एक हफ़्ता। पूरी पाठशाला बस इतनी है। पहले शुरू करते हैं। बढ़ोतरी बाद में आती है। और वह कभी रुकती नहीं।
एक-दूसरे के प्रति जवाबदेही की आदत भी वहीं बढ़ती है। उसके लिए अलग से कोई व्यवस्था खड़ी नहीं करनी पड़ती। हर बैठक के अंत में ग्रुप में पूछे जानेवाले वही मामूली सवाल हैं। प्रभु ने तुमसे क्या कहा? उसके बारे में क्या करोगे? पिछला हफ़्ता कैसा बीता? किससे कहा? हफ़्ते दर हफ़्ते ये सवाल पूछते रहनेवाले दो दोस्त। मूवमेंट की दुनिया जिसे जवाबदेही कहती है, वह पूरी की पूरी यही है। एक क़दम आगे चलनेवाला एक दोस्त, जो पूछता रहता है। जिसे कोचिंग कहते हैं, वह पूरी की पूरी यही है। आपमें से दो लोग बैठकर एक-दूसरे को फिसलने से बचाने लगें, उसी घड़ी दोनों चीज़ें आपके पास आ गईं।
इसलिए तैयार होने का इंतज़ार मत कीजिए। क्योंकि तैयार हो गया हूँ, यह एहसास कभी नहीं आता। तैयार होना कभी शर्त थी ही नहीं। इसी हफ़्ते, प्रभु ने जो एक-दो लोग आपको दिए हैं, उनके साथ पवित्रशास्त्र खोलिए। बाक़ी रास्ते में ही सीख जाएँगे।
डिस्कवरी ग्रुप बाइबल पढ़ने का कोई तरीक़ा भर नहीं है। लोग उस ग्रुप में अपना असली जीवन लेकर आते हैं। एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करते हैं। और परमेश्वर उनके बीच चलता है।
भारत के एक गाँव में एक लड़का है। जन्म से चल नहीं सकता। बिना किसी प्रशिक्षण के, बिना किसी रुतबे के कुछ सामान्य विश्वासियों ने हफ़्ते दर हफ़्ते उसके लिए प्रार्थना की। एक दिन वह लड़का उठकर चल पड़ा। पूरा गाँव पूछता आया कि ऐसा करनेवाला यह परमेश्वर कौन है।
अमेरिका के एक घर के कमरे में एक स्त्री पाठ ज़ोर से पढ़ रही थी। पढ़ते-पढ़ते बीच में रुक गई। पास बैठी अपनी सहेली की ओर मुड़ी। प्रभु ने उसे जो एक बात दी थी, वह कह दी — एक ऐसी बात जिसका उसे पता चलने का कोई रास्ता ही नहीं था। उस बात ने सहेली के उस घाव को छुआ जो उसने किसी को नहीं बताया था। सामने कोई खड़ा नहीं था, कराने के लिए प्रशिक्षित कोई नहीं था, और यह होते हुए मैंने अपनी आँखों से देखा।
यह न दुर्लभ है, न कुछ वरदान पाए लोगों के लिए बचाकर रखा गया है। जिस दिन आत्मा उतरा, उस दिन पतरस ने खड़े होकर वही पुराना वादा दोहराया — "मैं अपना आत्मा सब मनुष्यों पर उंडेलूँगा, और तुम्हारे बेटे और तुम्हारी बेटियाँ भविष्यद्वाणी करेंगी।"
सब मनुष्यों पर। चंगाई, ज्ञान, अचानक जान जाना। जिन बातों को हम बरसों से सोचते आए कि उन्हें सिर्फ़ पास्टर ही उठा सकता है, वे सब परमेश्वर एक साधारण कमरे के साधारण लोगों के हाथ में देता है। क्योंकि वह काम करनेवाला आत्मा सबको दिया गया है, सिर्फ़ पूरे समय के सेवक को नहीं।
आपको इनमें से किसी के पीछे भागने की ज़रूरत नहीं है। आप दोस्तों के साथ पवित्रशास्त्र खोलते हैं। एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करते हैं। अपने बीच परमेश्वर को परमेश्वर होने की जगह छोड़ देते हैं। बाक़ी वही करता है। जैसे हमेशा से करता आया है, वैसे ही।
डिस्कवरी ग्रुप सिर्फ़ प्रार्थना करने की जगह नहीं, मदद करने की जगह भी है।
यीशु ने उन दोनों को हमारी तरह अलग नहीं किया। उसने भीड़ों को सिखाया। सिखाकर, उनकी भूख देखी, और पाँच हज़ार को खाना खिलाया। रोटी को आशीष देकर, तोड़कर, पंक्तियों में भेजा — जब तक सब खा न चुके। मरकर जी उठने के बाद भी देखिए — स्वर्ग का प्रभु, रात भर जाल डालकर कुछ न पानेवाले थके हुए कुछ लोगों के पास, समुद्र के किनारे चलकर गया। आग पहले से जला रखी थी और उस पर मछली रख छोड़ी थी। "आओ, भोजन करो," उसने बुलाया। जी उठे मसीह ने अपने दोस्तों के लिए खाना बनाया। हम जिस परमेश्वर के पीछे चलते हैं, वह ऐसा है। जहाँ लोग हैं वहाँ वह ख़ुद जाता है। उन्हें खिलाता है। अपने ही हाथों से खिलाता है।
हमने तो दूर से खिलाना सीख लिया है। अस्पताल बनाते हैं, स्कूल को चंदा देते हैं, राहत का ट्रक भेजते हैं। ये सब अच्छे हैं, ज़रूरी हैं। कलीसिया को यह करते ही रहना चाहिए। पर चेक लिखने के लिए उस आदमी का नाम जानना ज़रूरी नहीं जिसके काम वह आएगा। पैसे से बढ़कर देने की एक मदद भी है। यीशु ने ज़्यादातर वही की। चावल आप अपने हाथों से उठाकर ले जाते हैं। जिसका पति चला गया, उसके पास जाकर बैठते हैं। नन्हा बच्चा बीमार पड़े तो जाकर खड़े होते हैं।
इसीलिए ग्रुप में सवाल अकेला "प्रभु क्या कह रहा है?" नहीं है। यह भी है — "हमारे आस-पास कौन मुश्किल में है? इस हफ़्ते हम उसके बारे में क्या करेंगे?" एक ग्रुप एक पाठ पढ़ता है। तभी किसी को याद आता है — गली के आख़िर वाला वह परिवार, पिता की नौकरी जाने के बाद से ठीक से खा नहीं रहा। अगले हफ़्ते तक ग्रुप उसके बारे में कुछ न कुछ कर चुका होता है। किसी प्रोजेक्ट की तरह नहीं, पड़ोसियों की तरह करता है। पढ़ी हुई बात उन्हें सिर्फ़ शब्दों के साथ नहीं, हाथों के साथ भी बाहर भेज देती है।
कठिनाई भी यहीं है। आनंद भी यहीं है। चेक पर दस्तख़त करते समय शायद आपको ज़्यादा कुछ महसूस न हो। पर किसी सहेली के साथ उसके मुश्किल में पड़े रिश्तेदार के लिए प्रार्थना करने उसके घर जाते हैं, तब बहुत कुछ महसूस होता है। अब उस व्यक्ति का नाम, चेहरा और दुख आपके अपने हो गए। यीशु की सेवकाई यही थी। और उसने वह सामान्य लोगों के हाथ में दे दी। वह डिस्कवरी ग्रुप में पढ़ने जितनी ही सहजता से बैठ जाती है।
एक बात सीधे कहनी है, क्योंकि मेरी बात का आधा ही सुन लिए जाने का ख़तरा है। हममें से कुछ को बाइबल थमाकर सिखाया गया कि जो समझाया न जा सके, उस हर बात से सावधान रहो। कुछ और लोग अनुभवों के पीछे चले गए और किताब हाथ से छूट गई। डिस्कवरी ग्रुप जिस कमरे में होता है, वहाँ ये दोनों साथ रहते हैं।
पवित्रशास्त्र खोलकर, जो लिखा है उसे वैसा ही लेते हैं। और उसी समय, पढ़ते हुए जिस आत्मा ने वह लिखवाया, उसके चलने के लिए दरवाज़ा खुला भी रखते हैं। किताब हमें बचाती है — आत्मा को अपने मन का बना लेने से। आत्मा किताब को बचाता है — हमारे हाथों में ठंडी पड़ जाने से।
सामान्य विश्वासी को इन दोनों में से एक चुनने की ज़रूरत नहीं है। वह पढ़ती है, सुनती है, आज्ञा मानती है। जिस परमेश्वर ने वह पन्ना लिखवाया, वही उस पन्ने में से बोलता है। कभी-कभी उसी के साथ चंगा भी करता है। पूरी विरासत यही है। पुलपिट के पीछे खड़े किसी भी व्यक्ति की जितनी यह अपनी है, उतनी ही उसकी भी अपनी है।
तीन बार बोली वह आवाज़
अपने जीवन में तीन बार, ऐसे ढंग से जिसे और किसी तरह समझाया नहीं जा सकता, मुझे यह डिस्कवरी मिली। तीन पल। हर बार मैं अकेला था। पूछ रहा था। और वही आवाज़ बोली।
पहली बार 1996 में, अमेरिका के चिनूक में। मुझे अमेरिका आए कुछ ही महीने हुए थे। हमारी शादी को भी कुछ ही दिन हुए थे। हनीमून के लिए बचाकर रखे पैसों से हम दोनों ने मिलकर, सेमिनरी कहाँ पढ़नी है यह ढूँढ़ते हुए, पूरे देश में छह बाइबल स्कूल घूमे। लौटकर चिनूक पहुँचे तो पैसे भी ख़त्म, और देखने को रास्ते भी ख़त्म। अब क्या करें, यह न सूझने की हालत आ गई।
उस छोटे-से घर में मैंने घुटने टेके। प्रभु, हम कहाँ जाएँ — यही पूछा।
"ओरल रॉबर्ट्स यूनिवर्सिटी।"
हमने जितने स्कूल देखे थे, उनमें सबसे महँगा वही था। उसकी फ़ीस भरने की हैसियत मेरी नहीं थी। फिर भी हमने आवेदन कर दिया। प्रभु का हास्य ऐसा ही होता है। रास्ता पूछो, तो वह ऐसा स्कूल हाथ में थमा देता है जिसकी फ़ीस आप भर नहीं सकते। परमेश्वर की कृपा — मेरी पत्नी को चार साल की पूरी ट्यूशन छात्रवृत्ति मिल गई। उसके पिता की दी हुई नीली लिंकन गाड़ी में जो कुछ था सब भरकर, हम तुलसा शहर के लिए निकल पड़े।
दूसरी बार तुलसा में। हम अपने छोटे-से घर में थे। पत्नी कॉलेज में थी। मैं बिस्तर ठीक कर रहा था। भीतर बेचैनी चल रही थी। अपने ही ज़िले के हर गाँव में कलीसिया स्थापित करने की योजना हमने अभी-अभी घोषित की थी। यानी लाखों लोग, सैकड़ों गाँव, और लाखों डॉलर जो हमारे पास थे ही नहीं। न कोई संस्था, न कोई मदद करनेवाला। बाइबल स्कूल का लड़का यही करता है — बिस्तर ठीक करते हुए, बिना किसी के सुने, इतनी बड़ी योजना घोषित कर देता है। फिर जवाब के लिए प्रभु की ओर ही देखना पड़ता है। क्योंकि कमरे में जवाब देनेवाला दूसरा कोई है ही नहीं। बिस्तर ठीक करते-करते वही आवाज़ फिर आई।
"मैं पालूँगा। मैं सँभालूँगा।"
कुछ ही हफ़्तों में, यूनिवर्सिटी के प्रेयर टावर में बैठे हुए, यूनिवर्सिटी की एक पत्रिका मेरे हाथ आई। उसके मुखपृष्ठ पर माइकल नाम का एक आदमी था। वह ओरल रॉबर्ट्स का पुराना विद्यार्थी था, और मिशन क्षेत्रों के लिए काम करनेवाली एक इंजीनियरिंग सेवकाई का संस्थापक। मैंने फ़ोन किया। पता चला कि उसका बेटा उसी कॉलेज में आ रहा है। वह ख़ुद भी जल्द ही तुलसा आनेवाला है।
पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपे आदमी को मैंने एक इंडियन बुफ़े के भोजन पर बुलाया। वह आ गया। तब से मुझे यह समझ आया — परमेश्वर बुफ़े का भी इस्तेमाल कर लेता है।
हम इंडिया पैलेस नाम के एक रेस्तराँ में मिले। साथ में मैं अपने दोस्त अबी को ले गया। माइकल ने अबी से मिलते ही उसका नाम पहचान लिया। बताया कि कभी भारत में वह अबी के ही घर ठहरा था। मिशन क्षेत्र के लिए ईंटों का कलीसिया भवन डिज़ाइन करने का दर्शन परमेश्वर ने उसे जहाँ दिया था, वह अबी के घर का वही कमरा था।
सोचिए — माइकल को और मुझे मिलाने से बरसों पहले ही, परमेश्वर ने वही दर्शन अबी के घर में माइकल को दे दिया था। वह इंजीनियरिंग सेवकाई हमारी सहभागी बन गई।
बाद में एक फ़ाउंडेशन के ज़रिए माइकल की मुलाक़ात डॉयस से हुई। पूरी दुनिया में कलीसिया भवन बनवानेवाली एक सेवकाई चलानेवाले बुज़ुर्ग। डॉयस हमारी टीम को देखने आए और हमारे ही घर ठहरे। वह सेवकाई भी सहभागी बन गई। उसने कितने ही सहभागियों के साथ मिलकर सारी दुनिया में हज़ारों कलीसिया भवन बनाए। तब से आज तक हम भी उन सहभागियों में हैं।
यह पुस्तक छपने जाने से पहले मैंने माइकल से यह हिस्सा पढ़कर मंज़ूरी देने को कहा। जवाब में उसने वह बाक़ी बात लिखी जो इंडिया पैलेस में कहने का समय नहीं मिला था। उसी के शब्दों में — "अबी के घर के उस कमरे में मिला दर्शन हमारे मिलने से बरसों पहले का है। पर जो डिज़ाइन हमने इस्तेमाल किया, वह पूरा हुआ हमारे मिलने से ठीक एक हफ़्ता पहले। इतने बरस वह मेरे दिल में, मेरे विचारों में रहा। ठीक जिस घड़ी उसकी ज़रूरत थी, उसी घड़ी परमेश्वर ने वह डिज़ाइन मुझे दिया। उस कलीसिया भवन का चित्र तुम दोनों को दिखाया था, यह तुम्हें याद ही होगा। मुझे बिलकुल पता नहीं था कि यह डिज़ाइन मैं किसके लिए बना रहा हूँ। परमेश्वर ही मेरा क्लाइंट था। उसे मालूम था कि यह तुम्हें चाहिए। पर उसके मन में कौन है, यह मुझे मालूम नहीं था।"
दूसरा वचन ऐसे पूरा होता चला गया।
तीसरी बार 2000 के दशक के शुरू में, एक रेल में। सितंबर 2003 में पता चला कि मुझे हेपेटाइटिस सी है। उसके बारे में आगे, क़ीमत वाले अध्याय में लिखूँगा। रेल के डिब्बे के कोने में बैठी एक बूढ़ी माँ की ओर प्रभु ने मेरी नज़र घुमाई। तब बोला — "जेम्स, मत डर। उस बूढ़ी माँ को देख। तेरी उम्र भी उतनी ही लंबी होगी। मर जाऊँगा, यह सोचकर उदास मत हो। इस बीमारी से मैं तुझे चंगा करूँगा।"
उस वचन को दिल में रखकर मैं बरसों चला। इंटरफ़ेरॉन के इलाज में से, बीमारी के लौट आने के दिनों में से, और उसके बाद दी गई मिली-जुली दवाओं के इलाज में से — वही वचन मुझे उठाए रहा। प्रभु ने अपना वचन निभाया। मुझे चंगा किया। वह ख़ुशख़बरी आख़िरकार जिस दिन मुझ तक पहुँची, उसके बारे में परमेश्वर के पालने वाले अध्याय में बताऊँगा।
वही आवाज़। तीन बार। चिनूक के घर में अकेले घुटने टेके, तब एक बार। तुलसा के घर में बिस्तर ठीक करते हुए, तब दूसरी बार। रेल में अकेले बैठे हुए, तब तीसरी बार। हर बार वह आवाज़ एक मामूली आदमी से ही बोली।
पर वे तीन ही सब कुछ नहीं हैं। जिस परमेश्वर ने वे तीन वचन कहे, वह उनसे बहुत पहले से मुझसे बात करता आ रहा था। और तब से आज तक बात करता ही रहा है। छोटी बातों में, बड़ी बातों में, वह हमेशा बोलता ही रहता है। वह बोलनेवाला परमेश्वर है। जो भी माँगे, उसके लिए पवित्रशास्त्र खोल देनेवाला परमेश्वर। जो भी टिककर बैठकर सुने, उसे अपना दिल दिखा देनेवाला परमेश्वर।
असली बात यही है। इन घटनाओं को एक-एक करके नाम लेकर इसलिए बताया, कि आप जान लें — ये सच हैं। और ये सामान्य लोगों के लिए ही हैं। आप उसकी आवाज़ सुनेंगे, आज्ञा मानेंगे, और किसी और की भी ऐसा करने में मदद करेंगे। जो सिर्फ़ वही कर सकता है, वह उसी पर छोड़ देंगे।
जिस तरह मैं जीया, और वह दरवाज़ा जो सबके लिए खुल गया
1991 की उस रेल यात्रा के बाद के बीस साल, मैं प्रभु की आवाज़ सुनने के उसी अनुभव के भीतर जीया। सुसमाचार के सेवक के रूप में, मिशनरियों के बेटे के रूप में, अपना जीवन सौंप चुके आदमी के रूप में — उसी के भीतर जीया। सोचता था कि हर अगुवा शायद ऐसे ही जीता होगा।
चाहता था कि सामान्य विश्वासी भी परमेश्वर की आवाज़ ख़ुद सुनें। उस पर उपदेश दिया, उस पर लिखा। हमारी कलीसियाओं के लोगों से कहा कि जैसे मुझसे बोला, वैसे ही पवित्र आत्मा आपसे भी पवित्रशास्त्र में से बोलेगा।
पर हममें से ज़्यादातर को जो व्यवस्था मिली है, वह सामान्य विश्वासी को परमेश्वर के जन पर निर्भर बना देती है। कलीसिया की ओर से पास्टर सुनता है। मिशन क्षेत्र की ओर से मिशनरी सुनता है। लोगों की ओर से प्रशिक्षित अगुवा सुनता है। जिस जीवन पर मैं उपदेश दे रहा था, उसे सामान्य विश्वासी सचमुच जी सके — इसकी जगह ही नहीं थी। मैंने जो सुना, उसे पा लेना ही उनके हिस्से आया। ख़ुद सुनना नहीं आया।
2011 में यह बदला।
उसी साल मैं पहली बार उस काम से मिला जिसे मिशन की दुनिया डिसाइपल मेकिंग मूवमेंट्स कहती है। मेरे भीतर जो बैठा, वह उसकी रणनीति या उसका आकार नहीं था। डिस्कवरी ग्रुप जो तीन सरल सवाल पूछता है, वही मेरे भीतर बैठ गए।
पहली बार मुझे एक ऐसी जगह मिली जहाँ किसी भी मामूली आदमी को बिठाया जा सकता है। वहाँ पवित्र आत्मा उससे मिलता है। एक सामान्य विश्वासी एक-दो दोस्तों के साथ पाठ खोलकर ज़ोर से पढ़ता है। पूछता है कि यह परमेश्वर के बारे में क्या कह रहा है, मनुष्यों के बारे में क्या कह रहा है, और इस हफ़्ते प्रभु उससे क्या करने को कह रहा है। सीधे उसी से सुनता है। अपना दिल खोलता है। आज्ञा मानता है। अगले हफ़्ते आकर बताता है कि क्या हुआ।
सेवक के रूप में जिस रुख़ को मैंने बीस साल जीया, वह अब उसका अपना हो गया। बीच में कोई परमेश्वर का जन नहीं।
अब आपको समझ आया कि पहली बार यह काम करते देखकर मैं क्यों रोया था?
केसबो नाम का एक दिहाड़ी मज़दूर
आगे बढ़ने से पहले एक आख़िरी उदाहरण दिखाना है।
हमारे इलाक़ों में से एक में केसबो नाम का आदमी है। उसकी उम्र बयालीस साल। दिहाड़ी पर मज़दूरी करता है। धर्मविज्ञान का कोई प्रशिक्षण नहीं। ख़ुद को अगुवा वह कभी नहीं समझता।
कुछ साल पहले, हमारी टीम में कोचिंग देनेवाले मेरे दोस्त किशोर की मुलाक़ात एक गाँव के थके हुए पास्टर से हुई। उसका नाम पूर्णा। दोनों एक बाइबल के सामने बैठ गए। न उपदेश, न स्लाइड। बस तीन सवाल। बाद में पूर्णा ने अपने गाँव के तीन मामूली लोगों को इकट्ठा करके वही किया।
उन तीन में से एक केसबो था।
कुछ हफ़्ते साथ मिलकर पवित्रशास्त्र खोलने के बाद, केसबो को पास के एक गाँव का सपना आया। वह ख़तरनाक गाँव है। वहाँ मसीहियों को सताया जाता है। परमेश्वर न बोला होता, तो उस गाँव की ओर वह आँख उठाकर भी न देखता।
पर उसने परमेश्वर की आवाज़ सुनी। इसीलिए गया।
वहाँ उसने दोस्तियाँ बनाईं। उनमें से दो के साथ एक छोटा ग्रुप शुरू किया। वे दो छह हो गए। उन छह में शांति लता नाम की एक स्त्री थी। जो वह सीख रही थी, उसे लेकर वह अपने गाँव गई और अपना ग्रुप शुरू कर दिया।
केसबो के पास प्रशिक्षण नहीं था। शांति लता के पास मंच नहीं था। पूर्णा के पास रणनीति नहीं थी। तो फिर इन सबके पास था क्या? सामरिया में एक तपती दोपहर, कुएँ पर यीशु से मिलनेवाली उस स्त्री के पास जो था, वही इनके पास भी था। कोई आया और इनसे एक सवाल पूछ गया। इन्होंने प्रभु की आवाज़ सुनी। जो सुना उसे लेकर घर गए, और जो अगला आदमी सामने पड़ा उससे वही सवाल पूछ लिया।
दूसरी आदत एक सामान्य शिष्य के जीवन में पूरी तरह काम करे तो कैसी दिखती है — बस ऐसी।
पवित्र आत्मा पवित्रशास्त्र में से सामान्य शिष्यों से बात करता है। हमारा काम इतना ही है कि ऐसा सवाल पूछें जो उन्हें उसके सामने खड़ा कर दे, और फिर हट जाएँ।
यही दूसरी आदत है।
अब तीसरी — परमेश्वर की आज्ञा मानना।
मनन के लिए
क्या आप सचमुच विश्वास करते हैं कि जितनी तत्परता से परमेश्वर पास्टर से बोलता है, उतनी ही तत्परता से पवित्रशास्त्र में से आपसे भी बोलेगा?
बाइबल पढ़ते हुए आख़िरी बार कब लगा था कि प्रभु सीधे आपसे बात कर रहा है?
इस हफ़्ते किसी एक दोस्त के साथ एक पाठ खोलिए और पूछिए, "प्रभु तुमसे क्या कह रहा है? उसके बारे में तुम क्या करोगे?" किससे पूछ सकते हैं?
पाँचवाँ अध्याय18 मिनट
परमेश्वर की आज्ञा मानना
बाइबल कहती है कि वचन के सुननेवाले ही मत बने रहो, वचन पर चलनेवाले बनो। तीसरी आदत क्या है, यह एक वाक्य में कहना हो तो यही है।
पहली दो आदतें हम आसानी से मान लेते हैं। सामान्य शिष्य ज़रूरी हैं, परमेश्वर की आवाज़ सुनना भी ज़रूरी है। पर एक स्टडी ग्रुप बरसों तक चलता रह सकता है। सब लोग समझदार होते चले जाते हैं। फिर भी कोई परमेश्वर के पास नहीं आ रहा। किसी के जीवन में फल भी नहीं दिख रहा। मूवमेंट बनता है उन्हीं लोगों से जो सुनी हुई बात पर चलते हैं। फल लाता है करना ही। वह फल हमारे अपने दिलों में भी आता है, और हमारे आस-पास के लोगों के जीवन में भी। सारा फ़र्क़ वहीं है।
तीसरी आदत हमें बड़ा करती है
मैं दो तरह की शिष्यत्व की बैठकों में बैठा हूँ।
पहली तरह की बैठक नोट्स पर ख़त्म होती है। आनेवाले कुछ नया सीखते हैं। सुनते हुए हौसला मिलता है। वैसे ही घर लौट जाते हैं। अगले हफ़्ते फिर आते हैं और अगले पाठ पर चर्चा करते हैं। और सीखते हैं।
दस साल उस बैठक में बिताने के बाद वे कैसे होंगे? ख़ूब सीखे हुए। पर एक भी नया शिष्य उन्होंने नहीं बनाया होगा।
दूसरी तरह की बैठक एक संकल्प पर ख़त्म होती है। "इस हफ़्ते प्रभु तुझसे क्या करने को कह रहा है? पास बैठे लोगों को बता।" अगले हफ़्ते की बैठक एक सवाल से शुरू होती है — "क्या किया? क्या हुआ?"
दस साल उस बैठक में बिताने के बाद वह कमरा कैसा होगा? नए लोगों से भरा हुआ। क्योंकि उस कमरे के लोगों ने जो कहा था, वह करते आए। यह देखकर नए लोग आ गए।
फ़र्क़ सिखानेवाले में नहीं है, न पाठ में। फ़र्क़ बैठक के आख़िर में पूछे जानेवाले उस आज्ञा-पालन के सवाल में है, और अगली बैठक की शुरुआत में पूछे जानेवाले "क्या हुआ?" में है।
मैंने ऐसे अगुवे देखे हैं जो डिस्कवरी ग्रुप का तरीक़ा तो ले लेते हैं, पर आज्ञा-पालन का सवाल टाल जाते हैं। मैं उन्हें दोष नहीं देता। वह सवाल सचमुच असहज करता है। सिर्फ़ जवाब देनेवाले को नहीं, पूछनेवाले को भी कठघरे में खड़ा कर देता है। उसका मतलब यह है — "जो करने को कहा था, उसका हिसाब तुझे और मुझे, दोनों को एक-दूसरे को देना है।"
कृपा के बारे में हमने जो सीखा है, उसमें एक चूक घुस आई है। दंड नहीं है, इसलिए हिसाब भी नहीं चाहिए — ऐसा मान बैठे हैं। पर वे दोनों एक बात नहीं हैं। नए नियम की कलीसियाओं में एक आदत थी। सुनी हुई बात पर "अब क्या करोगे?" पूछकर वे आपस में बात करते थे। उसी आदत को कोमलता से वापस ले आना ही तीसरी आदत है।
मैं यहाँ कलीसिया पर हमला नहीं कर रहा। जिसे हम पारंपरिक कलीसिया कहते हैं, उसका बहुत कुछ सच्चा है। उस कमरे में परमेश्वर की उपस्थिति सच्ची है। उपदेश सच्चा है। वे लोग नाटक नहीं कर रहे। इतवार की सुबह प्रभु से मिलनेवाले सामान्य विश्वासी हैं। मन का पिघलना कोई ग़लत बात नहीं। परमेश्वर के लोगों के बीच बैठकर उनके साथ पिघलना अच्छा ही है। सबसे बड़ा भक्त मैं ही हूँ, यह सोचकर घर में अकेले बैठे रहने से तो कहीं बेहतर है। हममें से बहुतों की शुरुआत कलीसिया में ही हुई। हम जो कुछ बनाते हैं, उसी की नींव पर बनाते हैं।
पर एक आदमी हर हफ़्ते पिघलता रह सकता है, और फिर भी एक बार भी "आज्ञा मान" यह शब्द सुने बिना रह सकता है। एक आराधना आपको हिला सकती है और बिना किसी बदलाव के घर भेज सकती है। घर में होनेवाला छोटा ग्रुप भी वही कर सकता है। कलीसिया भवन के बाहर होनेवाली बड़ी सभा भी वही कर सकती है।
लोग आते हैं, आराधना करते हैं, चले जाते हैं। पूछनेवाला कोई नहीं होता कि क्या सुना, उसके बारे में क्या करोगे, किससे कहोगे। बैठक को भवन के बाहर कर देने भर से कुछ नहीं सुधरता। असल बात जगह कभी थी ही नहीं। असल बात हफ़्ते दर हफ़्ते पूछा जानेवाला वही सवाल है — "क्या किया? क्या हुआ?" वह सवाल न हो, तो घर का ग्रुप हो या बड़ा चर्च भवन, दोनों एक ही तरह से नाकाम होते हैं।
आज्ञा मानना प्रेम के दिखने का ढंग है
"आज्ञा मानना" शब्द सुनते ही हममें से बहुत-से पीछे हट जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे अधिकारवाला कोई ऊपर से नियम थोप रहा हो। मान ले, वरना देख लेना। यह अध्याय वह नहीं कह रहा।
हमारा नमूना यीशु ही है। यीशु ने पिता की आज्ञा प्रेम से मानी। उसी ने कहा कि पुत्र अपने आप से कुछ नहीं कर सकता, वही करता है जो पिता को करते हुए देखता है। गतसमनी की बारी में उसने प्रार्थना की — "तौभी मेरी नहीं, परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो।" मालिक के सामने काँपते नौकर की तरह नहीं, पिता पर भरोसा करनेवाले पुत्र की तरह। उसने कहा कि हमारा आज्ञा मानना भी वैसे ही बढ़ेगा — "यदि तुम मुझसे प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।" पहले प्रेम। आज्ञा मानना उसके पीछे आता है, प्रेम के दिखने के ढंग की तरह।
यह हम अपने बल से नहीं करते। पवित्र आत्मा मदद करता है। लड़खड़ाए हफ़्तों को कृपा ढाँप लेती है। हम लड़खड़ाएँगे भी। आज्ञा मानने का अर्थ बेदाग़ रिकॉर्ड नहीं, जीवन भर चलनेवाली एक चाल है। प्रेम करनेवाले परिवार में बच्चा भी कभी-कभी रास्ता भटक जाता है, वैसे ही हम भी फिसलते हैं। और लौट आते हैं। प्रभु हमें फिर खड़ा करता है और फिर चलाता है।
फिलिप्पुस, जिसने भरोसा करके आज्ञा मानी
यीशु की तरह फिलिप्पुस भी, परमेश्वर ने जहाँ भेजा वहाँ गया और जो कहा वह किया।
आज्ञा मानना अक्सर एक छोटे-से स्पर्श से शुरू होता है, जिसका मतलब उस समय समझ में नहीं आता। प्रेरितों के काम में फिलिप्पुस नाम के आदमी से स्वर्गदूत ने कहा — उठकर दक्खिन की ओर, ग़ज़ा को जानेवाले सुनसान रास्ते पर जा। कारण नहीं बताया। वह उठा और चला गया।
उस रास्ते पर एक रथ जा रहा था। उसमें कूश देश का एक अधिकारी बैठा था। अपने देश लौट रहा था। सारे रास्ते यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक ज़ोर से पढ़ता जा रहा था। पर जो पढ़ रहा था, वह समझ में नहीं आ रहा था।
आत्मा ने कहा — "निकट जाकर इस रथ के साथ हो ले।" फिलिप्पुस दौड़ा। कोई उपदेश तैयार नहीं किया था। बस एक ही सवाल पूछा — "तू जो पढ़ रहा है क्या उसे समझता भी है?" अधिकारी ने कहा कि जब तक कोई समझाए नहीं, समझ में आए भी कैसे। और फिलिप्पुस को अपने पास रथ पर चढ़ा लिया।
उसी पाठ से शुरू करके फिलिप्पुस ने उसे यीशु के बारे में बताया। रास्ते में पानी दिखाई दिया। अधिकारी ने पूछा कि बपतिस्मा लेने में क्या रुकावट है। वहीं फिलिप्पुस ने उसे बपतिस्मा दिया। वह आदमी आनंद करता हुआ अपने रास्ते चला गया। जो उसे मिला था, उसे अपने देश ले गया।
बाक़ी का फल फिलिप्पुस की आँखों ने कभी नहीं देखा। उसने सुना। वह गया। बाक़ी परमेश्वर पर ही छोड़ दिया।
जक्कई, जो मन हिलते ही हिल गया
आज के उदाहरणों पर जाने से पहले, पहली सदी के उस चुंगी लेनेवाले से सीखते हैं जिसने मन हिलते ही तुरंत काम कर दिखाया। लूका, उन्नीसवाँ अध्याय।
जक्कई यरीहो नगर में चुंगी लेनेवालों का सरदार था। यानी धनी आदमी। यानी वह आदमी भी जिससे सब नफ़रत करते थे। रोमी सरकार के लिए कर वसूलते हुए, उस पर अपना हिस्सा जोड़कर खींचते हुए, उसने अपनी संपत्ति अपने ही लोगों की पीठ पर खड़ी की थी। यरीहो के हर यहूदी को उसका चेहरा मालूम था। पर उससे जान-पहचान किसी को नहीं चाहिए थी।
एक बात और — वह नाटा था।
उस दिन यीशु यरीहो से होकर जा रहा था, तो सारे रास्ते भीड़ खड़ी थी। जक्कई को उनके सिरों के ऊपर से कुछ नहीं दिखा। आगे दौड़कर, रास्ते के किनारे खड़े एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया। पैसे और रुतबेवाला एक बड़ा आदमी पेड़ पर चढ़ गया। क्योंकि उसे यीशु को देखना था।
यीशु उस पेड़ के नीचे रुका। ऊपर देखा। कहा — "हे जक्कई, झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।"
सब लोग कुड़कुड़ाने लगे कि यीशु एक पापी के घर मेहमान हो गया। जक्कई पेड़ से उतरा और यीशु को अपने घर बुला लाया। फिर अपने ही घर में खड़े होकर, खुलकर अपना निर्णय सुना दिया — "हे प्रभु, देख, मैं अपनी आधी संपत्ति कंगालों को देता हूँ, और यदि किसी का कुछ भी अन्याय करके ले लिया है तो उसे चौगुना फेर देता हूँ।" यीशु ने उसकी ओर देखकर कहा — "आज इस घर में उद्धार आया है; इसलिए कि यह भी अब्राहम का एक पुत्र है।"
इस घटना में भी चारों आदतें देखिए।
पहली आदत — सामान्य शिष्य। चुंगी लेनेवाला। न याजक, न गुरु, न प्रेरित। पेशे में रुतबा था। पर नगर की नज़र में परमेश्वर के सामने खड़े होने की योग्यता ही नहीं थी। यीशु ने हाथ ठीक ऐसे ही लोगों की ओर बढ़ाया।
दूसरी आदत — परमेश्वर की आवाज़ सुनना। यीशु ने जक्कई को भाषण नहीं दिया। नाम लेकर पुकारा। भोजन पर ख़ुद मेहमान बनकर आया। यहाँ डिस्कवरी उपदेश में नहीं हुई। उस आदमी की अपनी भोजन की मेज़ पर, आमने-सामने की मुलाक़ात में हुई।
तीसरी आदत — आज्ञा मानना। बात यहीं मुड़ती है। जक्कई ने "सोचकर बताता हूँ" नहीं कहा। अपने घर में खड़े होकर उसने घोषित कर दिया कि वह क्या करने जा रहा है। आधी संपत्ति ग़रीबों को। जिस-जिस को ठगा, उसे चौगुना। उस चौगुने पर ध्यान दीजिए। यहूदी व्यवस्था इतना ही माँगती थी — लिया हुआ लौटा देना, और उसमें पाँचवाँ हिस्सा जोड़ देना। जक्कई ने तो अपने ऊपर ख़ुद ही कई गुना बड़ी क़ीमत रख ली। सच्चा आज्ञा-पालन आम तौर पर ऐसा ही होता है। आदमी को कोई न कोई साफ़ क़ीमत चुकानी ही पड़ती है।
चौथी आदत — दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। यीशु की कही बात देखिए — "आज इस घर में उद्धार आया है।" सिर्फ़ जक्कई को नहीं, उसके घर को। उसके घर की छत के नीचे जीनेवाले हर एक को। बस इतना ही? नहीं। चुंगी लेनेवाला जो खींचा था वह लौटा रहा है, यह पूरा नगर देखने वाला है। वह चौगुनी अदायगी सिर्फ़ आज्ञा-पालन नहीं थी। वह परमेश्वर के राज्य का एक कर-दफ़्तर में से होकर गुज़रना था। एक ही दिन में बाक़ी सब चुंगी लेनेवालों तक वह ख़बर पहुँच गई होगी। जिस-जिस परिवार को पैसा वापस मिला, उसने उस रात अपने घर में वही बात की होगी। जक्कई के आज्ञा मानने ने उसके घर को, उसके पेशे को और उसके नगर को उसके साथ ही परमेश्वर के राज्य में खींच लिया।
तीसरे मार्ग की बैठक भी उसी सवाल पर ख़त्म होती है — "इस हफ़्ते प्रभु तुझसे क्या करने को कह रहा है?" और अगली बैठक भी उसी सवाल से शुरू होती है — "क्या किया? क्या हुआ?" जवाब सच्चा हो, तो उस आदमी को कोई न कोई क़ीमत चुकानी ही पड़ती है। वही क़ीमत आज्ञा-पालन को उस एक आदमी पर रुकने नहीं देती, दूसरों के जीवन तक ले जाती है।
परमेश्वर ने जिन लोगों को चुना
अब अपनी ही मिट्टी की बात। 1860 के दशक के आख़िर में, जॉन क्लॉ और उनकी पत्नी हैरियट ओंगोल में तेलुगु मिशन का काम चला रहे थे। उस समय बड़ी संख्या में मसीह के पास कौन आ रहे थे? चमड़े का काम करके जीनेवाले लोगों का एक वर्ग। जाति-व्यवस्था ने उन्हें अछूत गिना था। उन दिनों रणनीति जाननेवाला हर आदमी एक ही बात कहता — ऊँची जातियों पर निर्माण कीजिए।
इज़्ज़तवालों को, असरवालों को जीत लीजिए तो बाक़ी समाज उन्हीं के पीछे आ जाएगा। अछूतों को भीतर ले लिया, तो वह दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
इन परिवारों से भरती जा रही कलीसिया में ऊँची जाति के लोग नहीं आएँगे। जो स्कूल और जो काम वह खड़ा करना चाहती थी, उसके लिए यह कितनी बड़ी क़ीमत होगी — यह हैरियट को अपनी आँखों के सामने दिख रहा था।
फिर भी उन्होंने उन लोगों को अपनाया। क्लॉ एक ही विश्वास पर खड़े रहे — जिस किसी ने सचमुच यीशु पर विश्वास किया, उसे अपनाना ही है, चाहे उसकी कितनी भी क़ीमत चुकानी पड़े। पर विरोध खुलकर आया, और व्यक्तिगत होकर आया।
नदी के किनारे इन नए विश्वासियों को बपतिस्मा देते समय, कुछ सौ ऊँची जाति के लोग तट पर खड़े होकर देखते रहे। क्लॉ के अपने शब्दों में, "धमकाती हुई निगाहों से, अपनी घृणा जताते हुए" देखते रहे।
एक इतवार की शाम आई। क्लॉ अपने कमरे में बैठे थे। उनके प्राण पर ऐसा बोझ था जो उठाया न जाता था। पीछे नहीं लौट सकते थे। आगे बढ़ने का हौसला भी नहीं था। ध्यान बँटाने के लिए, कोने में रखी नई बाइबलों की ढेरी के पास गए, एक उठाई, और जहाँ खुली वहीं खोल दी।
उनकी आँखें पौलुस के उन शब्दों पर पड़ीं जो उसने कुरिन्थ की कलीसिया को लिखे थे — ज्ञानियों को लज्जित करने के लिए परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया। बलवानों को लज्जित करने के लिए निर्बलों को, नीच गिने जानेवालों को, तुच्छ समझे जानेवालों को चुन लिया। "वह स्वर्ग से आई आवाज़ जैसा लगा," क्लॉ ने कहा।
जैसे कभी छत पर पतरस को दर्शन ने छुआ था, वैसे ही उस घड़ी उन्हें छू लिया। वही बोझ हैरियट पूरे साल उठाती आ रही थीं। दोनों ने उसे परमेश्वर की दी हुई एक ही तसल्ली माना — आगे ही बढ़ना है। उन्होंने आज्ञा मानी। उस शाम की बात क्लॉ ने बरसों बाद अपने ही हाथों से अपनी पुस्तक में लिखी।
उसी आज्ञा-पालन ने आधुनिक मिशन इतिहास की सबसे बड़ी कटनियों में से एक के लिए दरवाज़ा खोला। 1876 से 1878 तक आए भयानक अकाल में क्लॉ डटे रहे। भूख से तड़पते हज़ारों लोगों को बकिंघम नहर की खुदाई में काम दिलवाया।
अकाल के दिनों में उन्होंने बपतिस्मा देने से मना कर दिया। जानते हैं क्यों? ताकि कोई यह न कह सके कि ग़रीब मसीह के लिए नहीं, रोटी के लिए आए।
अकाल टलने के बाद आत्मिक फ़सल मिली। 3 जुलाई 1878 को, ओंगोल के पास गुंडलकम्मा नदी में, एक ही दिन में दो हज़ार दो सौ बाईस लोगों ने बपतिस्मा लिया। उस दिन को तब से तेलुगु पिन्तेकुस्त कहा जाता है। उसके बाद के हफ़्तों में और नौ हज़ार से भी ज़्यादा लोगों ने लिया। कुछ ही वर्षों में ओंगोल की कलीसिया दसियों हज़ार तक पहुँच गई। उन दिनों की दुनिया की सबसे बड़ी कलीसियाओं में से एक बन गई। सुसमाचार परिवारों की क़तारों के साथ, रिश्तेदारियों के साथ, एक पीपुल मूवमेंट की तरह चला। उसे आगे ले गए उन्हीं लोगों के अपने शिष्य।
क्लॉ दंपती अगर ज्ञानियों को, बड़ों को चुन लेते, तो एक छोटी-सी इज़्ज़तदार कलीसिया जोड़ लेते। पर वे इस विश्वास तक पहुँचे कि परमेश्वर ने तुच्छ समझे जानेवालों को ही चुना है — और उन्होंने आज्ञा मानी। वे सारे लोग मिलकर परमेश्वर के राज्य में आए। वही लोग, वही मिट्टी। उसी में से हमारे अपने परिवार का विश्वास उगा।
शेरोन, वह बहन जो डटी रही
तीसरे अध्याय में जिनसे मिले, वही शेरोन इस तीसरी आदत का बढ़िया उदाहरण हैं।
उन्हें उदाहरण बनाया किसी तरीक़े ने नहीं, उनके न रुकने ने। बहनें चली गईं। पहले दो, फिर दो और। जो सरल काम वे कर रही थीं, वह नाकाम हो गया-सा लगा। कठिन ज़मीन पर पच्चीस साल दे चुकी एक पास्टर की पत्नी के पास ग्रुप बंद करके पुरानी आदत में लौट जाने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा कारण थे। वे डटी रहीं। बची हुई उस एक बहन के साथ मिलती रहीं। उसी छोटे रास्ते पर हफ़्ते दर हफ़्ते चलती रहीं।
तीसरी आदत की शक्ल यही है। एक बार बड़ी कोशिश कर लेना नहीं, हार न मानना। जहाँ ज़्यादातर लोग हाथ छोड़ देते हैं, उससे आगे भी आज्ञा मानते चले जाना। आज कितने ही गाँवों में वे जो काम चला रही हैं, वह किसी अच्छे तरीक़े से नहीं आया। वह क़रीब-क़रीब सब लोगों के चले जाने पर भी चलती रही एक बहन में से आया।
वे कभी उपदेशक नहीं बनीं। मेज़बान ही बनी रहीं। जब तक वह बढ़ न गया, उसी छोटी आदत के प्रति वफ़ादार रहीं।
एक ही दिशा चुनते हुए
बीस साल की उम्र में एक रेल में प्रभु ने मुझसे कहा — अपना जीवन मिशन के काम को दे दे। मेरी पत्नी को भी वही बुलाहट किसी और ढंग से आई। हम मिले। हमने शादी की। परमेश्वर ने हम दोनों से जो आज्ञा-पालन माँगा, उसी को अपने जीवन दे दिए।
मेरी पत्नी अमेरिका के चिनूक क़स्बे में पली-बढ़ीं। अपनी कक्षा की तेज़ लड़कियों में से एक। 1996 में जब हमने ओरल रॉबर्ट्स यूनिवर्सिटी में आवेदन किया, तो उन्हें चार साल की पूरी ट्यूशन छात्रवृत्ति मिली। समाज-विकास की डिग्री के लिए मिली छात्रवृत्ति थी वह। हॉस्टल और भोजन की सुविधा भी उसमें थी। पर उस कैंपस में विवाहित जोड़ों के लिए कमरे नहीं थे। हमें बाहर रहना पड़ा। वह सुविधा हम इस्तेमाल नहीं कर पाए। फिर भी बिना पैसेवाले एक नए जोड़े के लिए, चार साल की पूरी फ़ीस का इंतज़ाम हो जाना बहुत बड़ी बात थी।
हमारी पहली सालगिरह के अगले ही दिन हमारी बेटी सिमोना पैदा हुई। 1997 की गर्मियों में उसे लेकर हम भारत गए। तुलसा की एक कलीसिया ने उस यात्रा में छह कलीसिया भवन बनाने के लिए क़रीब दस हज़ार डॉलर दिए। पढ़ाई के लिए हम तुलसा लौट आए। मेरी पत्नी अपनी कक्षाओं के बीच सिमोना को गाड़ी में लाकर पार्किंग में मेरे हाथ में दे देतीं। फिर मैं सिमोना को अपनी कक्षाओं में ले जाता।
डिग्रियाँ पूरी करते-करते, अगली दो गर्मियाँ भी हमने भारत में ही बिताईं। सर्दियों की छुट्टियों में भी कुछ बार जाकर आया।
दिसंबर 1997 में ऐसी ही एक यात्रा से लौटते हुए, हवाई अड्डे पर मैंने स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती का एक बैनर देखा। पचासवें वर्ष के बारे में, और फिर से खड़ा करने के बारे में प्रभु ने मेरे दिल से बात की। तभी हमने वह योजना शुरू की — पाँच साल में अपने ही ज़िले के हर गाँव में कलीसिया स्थापित करने की।
सन् 2000 में, जिस साल सारा ने डिग्री पूरी की, हम सिमोना के साथ भारत आ गए। तब मेरी पत्नी की उम्र चौबीस साल थी।
जिस क़स्बे में मैं पला-बढ़ा, उसी के किनारे एक घर में हम रहे। अब उस घर के चारों ओर क़स्बा फैल गया है, पर जब हम गए थे तब उसके आस-पास कोई दूसरा घर ही नहीं था। वह क़स्बे के बाहर था। दूर-दूर तक वही अकेली अमेरिकी थीं। मैं काम से जब भी क़स्बे से बाहर जाता, उन्हें ऐसे छोड़कर जा रहा हूँ — यह बात भीतर खटकती रहती। फिर भी वे डटी रहीं।
अपनी डिग्री उन्होंने किसमें लगाई, यह देखिए — माता-पिता के छोड़े हुए, मस्तिष्क संबंधी और दूसरी अशक्तताओं वाले बच्चों के लिए घरों का एक नेटवर्क शुरू किया। वही आगे चलकर "साराज़ कवनेंट होम्स" बना। कितने ही वर्षों तक उन्होंने उसे खड़ा किया।
कुछ भी आसानी से नहीं मिला। बड़े-बड़े जोखिम उठाने को, न सीखे हुए काम सीखने को, और पैसे के मामले में पूरी तरह उसी पर भरोसा करने को प्रभु ने उन्हें बार-बार बुलाया। हर बार उन्होंने और उनकी टीम ने हाँ कही। अब वे अगुवाई से पीछे हट रही हैं। जिन भरोसेमंद साथियों को उन्होंने खड़ा किया, वे उस काम को आगे ले जा रहे हैं।
यहाँ एक ज़रूरी बात। क्योंकि मेरी पत्नी यह काम कितने ही वर्षों से करती आ रही हैं। चार आदतें एक पूरे जीवनकाल तक टिकनी हों, तो सामान्य शिष्य को अकेले नहीं चलना चाहिए। जो एक आदमी नहीं उठा सकता, उसे मेज़ के चारों ओर बैठे दो-तीन लोगों की छोटी टीम उठा लेती है।
सारा ने अकेले साराज़ कवनेंट होम्स नहीं खड़ा किया। भारत की बहनें, साथ काम करनेवाले, और एक के बाद एक आए विदेशी स्वयंसेवक — हर क़दम उनके साथ चले। उनमें से कोई थक जाता तो दूसरा वह बोझ थाम लेता। जब वे थकीं, तो वे सब उनका सहारा बनकर खड़े रहे।
जितनी दूर हममें से कोई अकेला नहीं जा सकता, उतनी दूर हम साथ मिलकर जा सकते हैं। असल में वह कोई रणनीति है ही नहीं। एक ही दिशा में बहुत लंबे समय तक चली हुई दोस्ती है। आख़िर में उसका नाम टीम पड़ गया।
आज्ञा मानना एक बड़ा फ़ैसला नहीं है। एक ही दिशा चुनते चले गए हज़ार छोटे फ़ैसले हैं।
तीसरी आदत यही है।
आज्ञा मानने की क़ीमत है
एक पीढ़ी से आगे टिकनेवाला फल पैदा कर सकनेवाली चीज़, मैंने जितना देखा है, एक ही है — आज्ञा मानना। पर यह नहीं कहूँगा कि आज्ञा मानना मुफ़्त है। अपने पीछे आने से पहले हिसाब लगा लेने को यीशु ने ख़ुद अपने शिष्यों से कहा था। परमेश्वर की आज्ञा मानने ने हमारे परिवार से बड़ी क़ीमत ली है। उसके बारे में आगे एक अध्याय में बताऊँगा। यहाँ इतना ही कहूँगा — आज्ञा माननी है तो क़ीमत चुकानी पड़ेगी। वह क़ीमत चुननेवाला आदमी अपने आराम से, अपनी सुरक्षा से, अपनी समय-योजना से चुकाता है। उसके साथ चलनेवाले भी अपना हिस्सा चुकाते हैं। फिर भी, चुकाई हुई हर क़ीमत के लायक़ वह है।
मनन के लिए
पिछले दिनों में आपके आज्ञा मानने ने आपसे क्या क़ीमत ली?
जक्कई ने अपने ही घर में खड़े होकर, लिए हुए का चौगुना लौटाया। कोई ऐसा काम है जिसे सुधारने को प्रभु कह रहा है और आप टालते आ रहे हैं?
इस हफ़्ते प्रभु आपसे क्या करने को कह रहा है? करेंगे?
छठा अध्याय39 मिनट
दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना
चारों आदतों में यह चौथी ही गॉस्पेल मूवमेंट का दिल है। एक आदमी के मसीही जीवन को मूवमेंट में बदल देती है यही चौथी आदत।
चौथी आदत है क्या? जो काम आपने अभी-अभी शुरू किया है, वही करने में किसी और की मदद करना। जो आपको मिला है, उसे लेकर अपने जीवन के अगले व्यक्ति तक पहुँचा देना।
यह बाक़ी तीनों में से बहुत सहजता से पैदा होती है। आप परमेश्वर की आवाज़ सुनकर उसकी आज्ञा मानें, तो वह आपकी नज़र ज़्यादा देर आप ही पर टिकी नहीं रहने देता। आख़िर में वह हमेशा एक ही काम करता है — हमारी दृष्टि बाहर घुमाकर, हमारे सामने रखे अगले व्यक्ति की ओर मोड़ देता है।
आज्ञा यही है — आगे पहुँचा दो
यीशु के शब्द मौक़े के हिसाब से बदलते रहे, पर उसकी दी हुई आज्ञा बार-बार एक ही रही — जो तूने देखा, सुना, सीखा, वह दूसरों को बता।
गिरासेनियों के देश के उस आदमी से कहा — अपने घर जा, और अपने लोगों को बता।
सत्तर शिष्यों को दो-दो करके भेजा — जो घर तुम्हें स्वीकार करें, वहीं रहो, और परमेश्वर के राज्य के बारे में जो मैंने तुम्हें सिखाया वह कहो।
सामरी स्त्री को तो उस आज्ञा की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। उससे मिलते ही वह ख़ुद अपने नगर की ओर दौड़ पड़ी।
पहाड़ पर उसने जो महान आज्ञा दी, उसका शब्द ध्यान से देखिए — शिष्य बनाओ। धर्म बदलवाओ नहीं, शिष्य। यानी ऐसे शिष्य जो शिष्य बना सकें। आगे पहुँचाने का ढंग उसी एक शब्द में समाया हुआ है। जिस-जिस के जीवन में यीशु ने बदलाव लाया, क़रीब-क़रीब हर बार उसे यही आज्ञा दी — जो तुझे मिला है उसे लेकर, अपने जीवन के अगले व्यक्ति तक पहुँचा दे। यह काम अभी शुरू कर। प्रशिक्षण मिलने तक या डिग्री मिलने तक मत रुक। उसकी आज्ञा यही है।
पर हमें सिखाया गया क़रीब-क़रीब इसका उलटा ढंग। हमारे भीतर बैठी आदत यह है कि जो हमें मिला है उसे कलीसिया में वापस लाकर, उस पूर्णकालिक सेवक के हाथ में रख दें जिसे मालूम है कि उसका क्या करना है। वह ढंग अच्छे कलीसिया-सदस्य तो बनाता है, पर शिष्य बना सकनेवाले शिष्य नहीं बना पाता।
चौथी आदत का मतलब यही है — यीशु ने सचमुच जो आज्ञा दी थी, उसे वापस ले आना।
उस आज्ञा को पास से देखिए। उसने सबको उपदेश देने को नहीं कहा। उपदेश में कोई बुराई नहीं। नया नियम उपदेशों से भरा है। पतरस ने उपदेश दिया तो एक ही दिन में हज़ारों आ गए। प्रभु ने आपको मंच दिया हो, गली का नुक्कड़ दिया हो, या सुसमाचार सीधे कह देने का वरदान दिया हो — इस्तेमाल कीजिए। पर यीशु ने ज़्यादातर बार जो माँगा, वह उपदेश से भी सरल काम है — "अपने घर जा, और जो तेरे साथ हुआ वह अपने लोगों को बता।"
सोचिए कि उसने लोगों को भाषण के साथ नहीं, गवाही के साथ क्यों भेजा। कोई अनजान आदमी आपके सिद्धांत से बहस कर सकता है, पर आपके जीवन से बहस नहीं कर सकता। जो सहेली आपको पहले से जानती है और जिसने आपको बदलते अपनी आँखों से देखा है, उसके सामने बैठकर आप प्रभु के बारे में कहें, तो वह उसे आसानी से उड़ा नहीं सकती। जहाँ आपकी बात और परमेश्वर की बात कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी होती है, वहीं भरोसा पैदा होता है। वही भरोसा वह मिट्टी है जिसमें सुसमाचार उगता है।
सामरी स्त्री ने अपने नगर को मसीहा का सिद्धांत नहीं समझाया। उसने कहा — "आओ, एक मनुष्य को देखो, जिसने सब कुछ जो मैंने किया मुझे बता दिया।" क़ब्रों के बीच रहनेवाले उस आदमी ने (उसके बारे में दसवें अध्याय में और कहूँगा) दस नगरों में उपदेश नहीं दिया। यीशु ने उसके साथ जो किया, बस वही बताया। जन्म से अंधा रहकर दृष्टि पानेवाले आदमी के पास, उसे घेरकर पूछनेवाले बड़ों को देने के लिए कोई धर्मविज्ञान नहीं था। उसके पास एक ही वाक्य था — "मैं अंधा था, अब देखता हूँ।"
बार-बार देखिए — सुसमाचार को सबसे दूर तक ले जानेवाले अक्सर वही रहे जिनके पास प्रशिक्षण सबसे कम था और गवाही सबसे ताज़ा।
विश्वासी होकर हम अक्सर यहीं चूक जाते हैं। हम ये गवाहियाँ कहते तो रहते हैं, पर एक ही कमरे में कहते हैं। एक विश्वासी कलीसिया में खड़े होकर बताती है कि परमेश्वर ने क्या किया। अच्छी बात है। उसका भी और सुननेवाले सबका भी विश्वास उससे खड़ा होता है। फिर सब घर चले जाते हैं। और वह गवाही उन्हीं चार दीवारों के भीतर रह जाती है।
ऊपर से, वहाँ सुननेवाले सब पहले से विश्वास करनेवाले ही हैं। तो दफ़्तर वाली सहेली? चर्च से ऊब चुका रिश्तेदार? दीवार के उस पार वाला पड़ोसी? असल में सुनने की ज़रूरत इन्हीं को है। पर यही कभी नहीं सुनते। अपना सबसे बड़ा सबूत हमने उसी एक कमरे में ताला लगाकर रख दिया है जहाँ सब पहले ही विश्वास कर चुके हैं।
डिस्कवरी ग्रुप पैदा ही इसलिए हुआ कि उसे फिर से बाहर भेजा जाए। हर हफ़्ते हम जो सवाल पूछते हैं, उनमें से एक बस इतना है — किससे कहा? हम यह नहीं पूछते कि किसे उपदेश दिया। पूछते हैं कि अपनी बात किससे कही। इससे कोमल पहला क़दम कोई नहीं है। यीशु ने भी यही क़दम इस्तेमाल किया।
उपदेश के ख़याल भर से काँप जानेवाला सामान्य विश्वासी भी यह काम हमेशा कर सकता है। क्योंकि यह तो अपने ही जीवन का सच कह देना है। इसके लिए न अनुमति चाहिए, न डिग्री, न रणनीति। चाहिए सिर्फ़ दो बातें — यह जान लेना कि आपके जीवन का अगला व्यक्ति कौन है, और जो सुना है वह उस व्यक्ति को बता देने का वह छोटा-सा आज्ञा-पालन का क़दम उठा लेना।
वह व्यापारी जिसने अपना घर खोल दिया
प्रेरितों के काम, सोलहवाँ अध्याय। पौलुस और उसकी छोटी टीम पहली बार एशिया पार करके यूरोप महाद्वीप में पैर रखते हैं। फिलिप्पी पहुँचकर उन्होंने आराधनालय ढूँढ़ा। पर उस नगर में वही नहीं था।
सब्त के दिन वे नगर के फाटक से बाहर नदी के किनारे गए। वहाँ कुछ स्त्रियाँ इकट्ठी थीं। पौलुस घास पर बैठकर उनसे बात करने लगा। लूका ने लिखा — उनमें से एक का मन प्रभु ने खोल दिया। उसका नाम लुदिया था। थुआतीरा नगर से आई, बैंजनी रंग बेचनेवाली एक व्यापारी।
उसने सुना, विश्वास किया, और उसी दिन उसी नदी में बपतिस्मा लिया। उसके साथ उसके घर के सब लोगों ने लिया।
फिर उसने पौलुस की टीम से कहा — "यदि तुम मुझे प्रभु की विश्वासिनी समझते हो, तो चलकर मेरे घर में रहो।" लूका का लिखा शब्द है — "उसने हमें मनाकर ठहरा ही लिया।"
पौलुस की टीम उसके घर ठहरी। यूरोप महाद्वीप की सबसे पहली कलीसिया उसी के घर में इकट्ठी हुई।
लुदिया में चारों आदतें देखिए।
पहली आदत — सामान्य शिष्या। वह थुआतीरा नाम के दूर के नगर से आई व्यापारी थी। जन्म से यहूदी नहीं, किसी की अगुवा भी नहीं। नगर में आराधनालय न होने के कारण सब्त के दिन नदी किनारे प्रार्थना करनेवाली स्त्रियों की उस छोटी मंडली में शामिल हो गई एक व्यापारी। बस इतना।
दूसरी आदत — परमेश्वर की आवाज़ सुनना। पौलुस ने उपदेश नहीं दिया। घास पर बैठकर कुछ स्त्रियों से बात की। प्रभु ने उसका मन खोल दिया। बिना भवन के, बिना मंच के, उसने सीधे उसकी आवाज़ सुनी।
तीसरी आदत — आज्ञा मानना। तुरंत उसने आज्ञा मानने के दो काम किए। उसी दिन नदी में बपतिस्मा लिया। फिर, अभी-अभी मिले चार यहूदी यात्रियों के लिए अपना घर खोल दिया। उन दिनों एक स्त्री के लिए यह न सुरक्षित काम था, न आम। फिर भी उसने किया।
चौथी आदत — दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। उसके घर के सब लोग उसके साथ ही बपतिस्मा लेकर एक ही दिन परमेश्वर के राज्य में आ गए। और उसके बाद उसका घर ही यूरोप की पहली कलीसिया बना।
उसके पास प्रशिक्षण नहीं था। किसी ने अनुमति नहीं दी थी। उसके पास दो ही चीज़ें थीं — प्रभु का खोला हुआ मन, और बाँटने को तैयार एक घर। हममें से बहुतों के पास भी वही दो चीज़ें हैं।
काम को आगे ले गए लोग ही
सन् 2000 में जब हमारा छोटा परिवार पढ़ाई पूरी करके भारत गया, तब हमारा काम एक ही ज़िले में था। 2001 के आख़िर तक हमने राज्य के पूरे तेईस ज़िलों पर नज़र टिका दी।
हमने तेईस बार घर नहीं बदले। सब ज़िलों में हम ख़ुद गए भी नहीं। उस काम को नए इलाक़ों तक ले गए लोग ही।
मेरे साथ काम में लगे लोगों में तीन मेरी ही मातृभाषा बोलते थे। हर एक ने राज्य के अलग-अलग इलाक़े का रुख़ किया। भाषा उनकी अपनी थी, पर इलाक़े नए थे। जिन क़स्बों में वे पले-बढ़े, उनसे अलग जीवन-शैली वाले क़स्बों में गए। एक इलाक़े के लोगों को दूसरे इलाक़े के लोगों के बीच कभी घर जैसा नहीं लगता। इसलिए यह छोटा-सा क़दम भी सचमुच एक नई दुनिया में रखा हुआ क़दम ही था।
फिर भी वे गए। क्योंकि जिस जीवन-शैली में वे शिष्य बने थे, उसमें परमेश्वर की आवाज़ सुनने के बाद अगला काम एक ही है — किसी और की ऐसा करने में मदद करना। वह "कोई और" आपके घर से एक दिन की यात्रा दूर ही क्यों न हो।
चौथी आदत जब एक पूरे इलाक़े में चलने लगती है, तो ऐसी दिखती है। इन तीनों में से कोई मेरे कर्मचारी के रूप में शुरू नहीं हुआ। पहले उन्होंने आज्ञा मानी। फिर किसी और की मदद की। ऐसे ही वे अगुवे बने।
अब अमेरिका की ओर देखते हैं। हमारी अमेरिकी टीम की मज़बूत मूवमेंट अगुवाओं में से एक हैं एमी। वे टेक्सस राज्य के ऑस्टिन शहर में यह काम चला रही हैं। उनकी जिगरी सहेली गेल भी उसी राज्य में, अशक्तता वाले लोगों के बीच डिस्कवरी ग्रुप चला रही हैं। वही काम करने वे मध्यपूर्व के देशों में भी जाती रहती हैं। ये दोनों सहेलियाँ पहली बार भारत आईं तो एक डायमंड्स डॉटर्स की यात्रा में ही आईं।
एमी इस काम में कोई नई नहीं थीं। वे बरसों से ऑस्टिन में सच्चे शिष्यत्व का काम खड़ा करती आ रही थीं। फिर भी भारत के सामान्य विश्वासियों के बीच बिताए उन दिनों ने उन्हें कोई नया पाठ नहीं, बल्कि पहले से किए जा रहे काम पर एक नई साफ़ नज़र दी।
उन्हीं के शब्दों में — "अपनी सेवकाई को ऑस्टिन में कितने ही तरीक़ों और कितनी ही परतों के साथ बड़ा करके चलाने की कोशिश करती आई। पर इस यात्रा ने मुझे एक नई दृष्टि दी — जो कर रही हूँ उसमें से कुछ जारी रखते हुए भी, पूरे को सरल किया जा सकता है। क्योंकि काम को ज़रूरत से ज़्यादा उलझा देने की आदत मुझमें है।" घर लौटकर उन्होंने ठीक वही किया — अपने काम को तरीक़ों के चारों ओर नहीं, उन चार आदतों के चारों ओर फिर से जमाया।
यही बदलाव एक के बाद एक व्यक्ति में दिखता चला गया। भारत के काम के साथ सचमुच समय बितानेवाला क़रीब-क़रीब हर व्यक्ति घर और ज़्यादा साफ़ नज़र और ज़्यादा फल लेकर लौटा। यह देखकर मार्क और क्रिस ने एक फ़ैसला लिया — उस जनवरी में अमेरिका और पश्चिमी देशों के पचास सेवकों को अपने भारत समिट में लाकर सबको एक ही कमरे में बिठाया। उन पचास में से एक एमी थीं।
फल आने में ज़्यादा समय नहीं लगा। महीना बीतते-बीतते उनकी टीम ने ऑस्टिन में एक शाम पचास लोगों को इकट्ठा किया। वह रणनीति की बैठक नहीं थी, न किसी नए कोर्स की शुरुआत। वह पूरी शाम उन चार आदतों पर ही थी।
डलास की टीम भी उसी कमरे में रहने के लिए गाड़ी चलाकर आई। हफ़्ते के बीच एक रात एमी ने अपना घर खोला और उसका नाम रखा "फ़ायर नाइट"। साठ नौजवानों ने एक साधारण घर के कमरे को ठसाठस भर दिया।
गिदोन की कहानी पढ़कर उन्होंने इस पर बात की कि परमेश्वर उन्हें कौन कहता है। वह भूख देखकर उन्हें वे दोस्त याद आ गए जिन्होंने अपने साथी के लिए घर की छत उधेड़कर उसे यीशु के सामने उतार दिया था — यह उन्होंने मुझसे कहा।
छह महीने बाद, ली ने मुझे उनकी टीम से एक फ़ोटो भेजा। उसमें क्या था, पता है? पूरे दक्षिण टेक्सस में उनतीस बढ़ते हुए मूवमेंट अगुवे। और उनके नीचे, आम हफ़्तों में आम कमरों में मिलनेवाले एक सौ बारह डिस्कवरी ग्रुप।
यह सब सिर्फ़ जोश पर नहीं चला। यह बात सबसे पहले एमी ही कहेंगी। घर लौटकर उन्होंने अकेले नहीं जूझा। हमारे अमेरिकी गॉस्पेल मूवमेंट काम के अगुवे ली ने समिट से लौटने के हफ़्ते में ही अपनी टीम के अगुवों के साथ हर हफ़्ते की कोचिंग शुरू कर दी। उन अगुवों में एक एमी थीं। हर हफ़्ते कोई न कोई उनसे पूछता — प्रभु ने क्या कहा? उसके बारे में क्या कर रही हो? एक अच्छे महीने को टिकनेवाले काम में बदल देती है यही आदत।
और यह वहीं नहीं रुका। चलता ही रहा। जिमी और मेबेल पति-पत्नी हैं। हमें बहुत प्रिय जोड़ा। एमी और गेल ने इन दोनों को प्रशिक्षण दिया। फिर जिमी और मेबेल ने दक्षिण टेक्सस के अबनेर नाम के एक भाई के साथ वही किया। तब से वे दोनों उसके साथ खड़े रहकर उसे कोचिंग देते आ रहे हैं।
अबनेर उस काम को सरहद पार ले गया, मेक्सिको के एक क़स्बे तक। वहाँ एक टैक्सी की सवारी एक बातचीत में बदल गई। उस टैक्सी चलानेवाले नौजवान का नाम रेमुंडो था। उसी दिन उसने अपना जीवन यीशु को दे दिया और उस "मृत्यु देवी" को छोड़ दिया जिसकी वह अब तक पूजा करता आया था।
ली के भेजे उस फ़ोटो की गिनती में अबनेर का अपना काम अभी जुड़ा ही नहीं था। वह उसके ऊपर अलग से है। हाल ही में मैं जिमी और मेबेल के साथ भोजन पर बैठा। उन्होंने बताया कि अकेला अबनेर अब दो सौ से ज़्यादा ग्रुप चला रहा है। यही चौथी आदत है। टेक्सस से होकर दक्षिण की ओर दौड़ी, और सरहद पार कर गई।
यह परिवारों से होकर चलती है
चौथी आदत सब रास्तों से ज़्यादा परिवारों से होकर ही चलती है।
तीसरे अध्याय में आइडाहो के टॉम का ज़िक्र किया था, और कॉफ़ी शॉप में बैठी उस बहन का जिसका पति गुज़र गया था। उनके साथ जुड़ी स्त्रियों में से एक, दूसरी ही बैठक के बाद घर जाकर, अपनी बड़ी बेटी के साथ अपनी रसोई की मेज़ पर ही एक डिस्कवरी ग्रुप शुरू कर बैठी। एक माँ ने, जो अभी-अभी सीखा था, वह अपने जीवन के अगले व्यक्ति तक पहुँचा दिया। बस इतना।
भारत के एक क़स्बे में हमारी टीम के एक साथी ने, रोज़ अपनी दुकान पर आनेवाले दोस्त के साथ डिस्कवरी ग्रुप बाँटा। वह दोस्त विश्वासी बन गया। एक ग्रुप शुरू किया। उसकी माँ ने एक शुरू किया। सास की तबीयत ठीक न रहती, तो उसके घर एक और शुरू कर दिया। एक ही मामूली दुकान की बातचीत में से चार पीढ़ियों के ग्रुप।
हमारे अपने घर में भी वही। हमारे जुड़वाँ जियाना और जेम्स के साथ मिलकर, पूरे परिवार ने "परमेश्वर की दी हुई आशा की कहानियाँ" वाली शृंखला पढ़ी। हम जब भी पढ़ते, परिवार का डिस्कवरी ग्रुप जेम्स ही चलाता। उसकी उम्र चौदह साल है। कुछ रातें मुश्किल भी होती हैं। उसका मन वीडियो गेम खेलने का होता है। फिर भी वह चलाता है।
इनमें से कुछ भी वीरता जैसा नहीं दिखता। आइडाहो में अपनी मेज़ पर बड़ी बेटी के साथ बैठी एक माँ जैसा दिखता है। भारत में एक बेटे की माँ और सास के अपने-अपने ग्रुपों जैसा दिखता है। वीडियो गेम बंद करके माँ और जुड़वाँ बहन से तीन सवाल पूछनेवाले चौदह साल के लड़के जैसा दिखता है।
एक पूरी पीढ़ी तक भीतर उतर चुका गॉस्पेल मूवमेंट कहाँ दिखता है, पता है? खाने की मेज़ पर ही।
मूवमेंट को अंदरवाले ही चलाते हैं
चौथी आदत के फलने में धीरज भी लगता है और समय भी। पर कभी-कभी, जब ज़मीन तैयार हो, वह हमारी कल्पना से भी तेज़ रफ़्तार से अचानक बढ़ जाती है।
सत्रह साल पहले मेरे दोस्त फ़िल ने डॉन नाम के एक आदमी से एक आत्मिक बातचीत की। वही डॉन यीशु के पीछे चलने लगा, और बरसों बीतते-बीतते फ़िल का आत्मिक पुत्र बन गया। दोनों तब से साथ ही हैं।
2026 के फ़ादर्स डे पर फ़िल अमेरिका के इंडियाना राज्य की एक जेल में गया। वहाँ डॉन ने सात घंटे की एक जागृति-आराधना की योजना बनाकर उसे चलाया। वह डॉन का काम था, फ़िल का नहीं। कमरे के बीच में घोड़ों को पानी पिलाने की छह फुट लंबी बड़ी टीन की नाँद रखकर उसे पानी से भरा — उन क़ैदियों के बपतिस्मा के लिए जो यीशु मसीह पर विश्वास घोषित करनेवाले थे।
सत्तर लोग आए। डॉन और चार मेहमान प्रचारकों ने वह दिन चलाया। डॉन ने कमरे में मौजूद सबसे फ़िल का परिचय "मेरे पिताजी" कहकर करवाया।
बाद में फ़िल ने लिखा — "उस कमरे में एक ही आदमी था जो अपराधी नहीं था। वह मैं था। इसे देखकर साफ़ पता चलता है कि मूवमेंट को अंदरवाले ही चलाते हैं।" उस आराधना के अंत में सत्रह लोगों ने बपतिस्मा लिया। उससे पहले की आराधनाओं में साठ ले चुके थे।
यह सब उगा सत्रह साल पहले हुई उसी एक बातचीत में से। फ़िल कहता है — शिष्य बनानेवाले मूवमेंट के लिए जेलें बीज की क्यारियों जैसी हैं।
पीढ़ियों से होकर चलता मूवमेंट
चौथी आदत अब पश्चिमी देशों के परिवारों में भी पीढ़ी से पीढ़ी तक चल रही है। हमने उसे अभी-अभी देखना शुरू किया है।
जनवरी 2026 में हमारे जुड़वाँ बच्चे, बोलेंडर परिवार के दो बच्चों और एक और दोस्त के साथ कोरी यूथ कैंप गए। एक साल पहले डैनी इसी कैंप में गया था। जिस कलीसिया में हम जाते हैं, उसके पास्टर रैंडी हैं। उनका बेटा ज़ायन हमारी बेटी शायना का पति है। वे किशोर बच्चे अपने-अपने "मैं करूँगा" संकल्पों के साथ घर लौटे। उनमें से किसी ने अभी डिस्कवरी ग्रुप शुरू किया हो, यह मुझे मालूम नहीं। पर वे घर लौटे तो ऐसे किशोरों की तरह लौटे जो जानते हैं कि इस चौथी आदत को आगे ले जाना उन्हीं का काम है।
इसके पीछे दो दादी-नानी खड़ी हैं। एक चिनूक में मेरी सास। पति के साथ मिलकर चार आदतें जीईं और बेटियों को सौंप दीं। दूसरी बोलेंडर की ओर की दादी डेलोरेस। रैंडी को मसीही विश्वास में उन्हीं ने पाला। शायना उस एक घर से, अपनी माँ के ज़रिए आई। ज़ायन दूसरे घर से, रैंडी के ज़रिए आया। दोनों ने शादी की। अब शायना और ज़ायन चौथी आदत को अपनी आम मसीही ज़िंदगी की तरह जी रहे हैं। दोनों तरफ़ से वही आदत विरासत में मिले हुए घर में उनकी गृहस्थी चल रही है।
यह काम धीरे-धीरे चलता है तो ऐसे ही चलता है। पहले दादी-नानी जीती हैं। फिर माता-पिता थाम लेते हैं। फिर एक-दूसरे के परिवारों में ब्याह कर आए बच्चे उसे उठाकर ले जाते हैं। उसके बाद की पीढ़ी के लिए तो चार आदतें जन्म से ही आम मसीही ज़िंदगी बन जाती हैं।
चारों आदतों में सबसे धीमी और सबसे कम दिखनेवाली यही चौथी है। और सचमुच टिकनेवाली भी यही अकेली है।
पहली बातचीत
पहले आदमी से क्या कहूँ — यह मुझसे कितनी ही बार पूछा गया है। सीधा जवाब यही है।
आपको सुसमाचार का उपदेश नहीं देना है, न पूरी व्याख्या करनी है। आप किसी से धर्म बदलने को नहीं कह रहे। जो काम आप अपने घर में पहले से कर रहे हैं, उसी में एक दोस्त को बुला रहे हैं। उसे अच्छा लगे तो उसकी अपनी जगह पर उसे शुरू करने में मदद कर रहे हैं। बस इतना।
इसके लिए आपको योग्य होना ज़रूरी नहीं, न इतना सीखा हुआ होना ज़रूरी है। आप उपदेशक नहीं हैं, न जिसे बुलाया उससे ऊपर हैं। आप दोनों मिलकर यह कर रहे हैं। बस इतना।
इसका मतलब यह नहीं कि सुसमाचार को पूरा खोलकर कहना ग़लत है। वह अच्छा भी है और पवित्रशास्त्र के अनुसार भी। हममें से बहुतों को उस साहस के लिए प्रार्थना करनी ही चाहिए। सुसमाचार को सीधा रख देने के शब्द और साहस प्रभु आपको दे, तो कहिए। उसके लिए माफ़ी माँगने की कोई ज़रूरत नहीं।
पर हममें से बहुतों ने वह अचानक, बिना किसी जान-पहचान के आज़माकर भी देखा है। किसी अनजान के पास चलकर जाकर, या किसी दोस्त को पूरी व्याख्या देकर देखा है। वह ठीक से पहुँचना तो दूर, उलटा ही पड़ा। "यह काम मुझसे नहीं होता" सोचकर हम पीछे लौट आए। तीसरा मार्ग आम तौर पर दूसरे रास्ते जाता है। बहस से शुरू न करके, ग्रुप को धीरे-धीरे आगे ले जाते हैं। जहाँ से हम आम तौर पर शुरू करते हैं — पाप, क्रूस, नया जन्म — वहाँ से शुरू नहीं करते। इस पुस्तक के अंत में दी शृंखला की तरह, सृष्टि से या किसी आशा की कहानी से शुरू करते हैं। वह आदमी अपने ही क़दमों से धीरे-धीरे क्रूस तक आता है, और आख़िर में वही उसका सब कुछ बन जाता है। पढ़ने के साथ-साथ, प्रभु आपके अपने जीवन में क्या कर रहा है यह बताते हुए, वह बदलाव दिखाते हैं जो वे अपनी ही आँखों से देख सकते हैं। जितनी भी बहसें आप जीत सकते हैं, उन सबसे ज़्यादा काम वह करता है।
इस पुस्तक के अंत में दी "परमेश्वर की दी हुई आशा की कहानियाँ" शृंखला से शुरू कीजिए। हफ़्ते में एक बार या दो हफ़्ते में एक बार तीस मिनट मिलिए। दो-तीन लोग बहुत हैं। वीडियो कॉल पर एक ही दोस्त हो तो भी बहुत है। एक कहानी साथ पढ़िए, डिस्कवरी ग्रुप के तीनों सवाल पूछिए, और घर जाइए। अगले हफ़्ते आकर अगली कहानी उसी तरह खोलिए। एक बैठक के बाद दूसरी। यही डिस्कवरी ग्रुप की आदत है।
दसों कहानियाँ साथ मिलकर पूरी करने की कोशिश कीजिए। सब पूरी नहीं करेंगे। कुछ बीच में रुक जाएँगे। एक फिर भी चलता रहेगा। शुरू करने के लिए वह एक ही काफ़ी है।
यह पूरी आदत है क्या? जीकर दिखाना, और साथ मिलकर खोजना। यह गवाही "देने" से, व्याख्या "करने" से, किसी को पाठ "पढ़ाने" से अलग काम है।
यह सब इस पुस्तक के अंत में एक ही पन्ने पर रखा हुआ है। जब आप शुरू करने को तैयार हों, वह वहीं मिलेगा।
जब आपका ग्रुप बढ़े
इस हफ़्ते, अपने डिस्कवरी ग्रुप के बाद, प्रभु ने जो एक व्यक्ति आपको दिखाया है उसे अगली बैठक में बुलाइए। कुछ हफ़्ते आ जाने के बाद, उसे अपने ही दोस्तों के साथ, अपने ही परिवार के साथ अपना ग्रुप शुरू करने में मदद कीजिए।
आपके ग्रुप में से कोई नया ग्रुप शुरू करने को तैयार हो, तो उसका हौसला बढ़ानेवाले बनिए। बैठकों के बीच में, अलग से आमने-सामने बात कीजिए। पूछिए कि कैसे हो। पूछिए कि प्रभु तुमसे क्या कह रहा है। पूछिए कि उसके बारे में क्या कर रहे हो। ये सरल कोचिंग के सवाल हैं। डिस्कवरी ग्रुप के सवालों से अलग हैं। डिस्कवरी ग्रुप के सवाल बैठक में काम आते हैं। ये कोचिंग के सवाल दोस्ती को मज़बूत करते हैं, और बैठकों के बीच मूवमेंट को चलता रखते हैं। इस कोचिंग के तरीक़े पर दूसरी पुस्तक में और आएगा।
परमेश्वर की सामर्थ्य देखने की आस रखिए
आइडाहो के कोर डलेन क़स्बे में रहनेवाले टॉम का संदेश मुझे तब आया जब उसे भारत देखकर लौटे कुछ ही हफ़्ते हुए थे। टॉम अपने घर में डिस्कवरी ग्रुप चलाता है और अपनी गली में प्रभु को चलते देखता रहता है। पर भारत में उसने कुछ ऐसा देखा जो घर पर नहीं देखा था। वहाँ के गाँवों में सामान्य विश्वासियों ने बीमारों के लिए प्रार्थना की। वे चंगे हुए। न सुननेवाले कान खुल गए। झुकी हुई देह सीधी खड़ी हो गई। कोई कोर्स की किताबें नहीं लाया। वे लाए तो बस अपना आज्ञा-पालन और अपनी आस। और प्रभु ने वही किया जो वह करता है।
टॉम का संदेश सीधा था। यह शब्द उसी ने लिखा — वही सामर्थ्य यहाँ भी देखनी है। वही स्तुति, वही प्रार्थना, वही चंगाइयाँ। वचन पढ़ते-पढ़ते आत्मा चले और एक घंटे में पड़ोसी का जीवन बदल जाए — वही कमरा। विदेश में नहीं। कोर डलेन में, अपने ही घर के कमरे में, अपनी ही गली में।
मैंने जवाब लिखा। जो यह सवाल पूछनेवाले हर आदमी से कहता हूँ, वही कहा। अपने डिस्कवरी ग्रुप के ऊपर अलग से चंगाई की आराधना या प्रार्थना का कार्यक्रम खड़ा करने की ज़रूरत नहीं। उसे उसी पढ़ाई के भीतर होने दीजिए।
वहाँ ग्रुप पहले से मिलकर परमेश्वर का धन्यवाद कर रहा है और एक-दूसरे की असली ज़रूरतों के लिए प्रार्थना कर रहा है। उसे सरल और हल्का रहने दीजिए। वचन को सोता बने रहने दीजिए। आज्ञा मानने को आदत बन जाने दीजिए। प्रार्थना से उस कमरे को आत्मा भरने दीजिए। और फिर देखते रहिए कि वह क्या करता है। बस इतना।
प्रभु चंगाइयों को किसी और देश के लिए बचाकर नहीं रखता। जिस कमरे में चार आदतें पहले से चल रही हैं, उसी में वह उन्हें देता है।
पश्चिमी देशों में यह जड़ पकड़े तो ऐसा ही दिखता है। किसी कॉन्फ़्रेंस के जोश जैसा नहीं। आइडाहो के एक ऐसे मामूली आदमी जैसा, जो दूर से देखते-देखते थक चुका है और चाहता है कि जैसे उसने दुनिया के दूसरे छोर के एक गाँव में परमेश्वर को चलते देखा, वैसे ही अपने घर के कमरे में भी देखे।
वह जीवन-शैली पश्चिम में भी आकार ले रही है
वह जीवन-शैली पश्चिमी देशों में भी आकार ले रही है। उसका अपना फल भी आने लगा है।
गवाहियाँ अब हर तरफ़ से आ रही हैं। लॉस एंजेलिस के एक मोहल्ले की "अन्ना" नाम की एक हाई स्कूल लड़की की बात हमारी टीम के दोस्तों ने बताई। विरोध होने पर भी उसने बपतिस्मा लिया। उसके बाद प्रभु उससे सामर्थ्य के साथ मिलने लगा।
एक दिन उसे दर्शन में अपनी चाची दिखाई दीं। उन चाची को शुगर की बीमारी इतनी बढ़ गई थी कि चलना बंद हो गया था। "अन्ना" ने प्रार्थना की। उसे अपने हाथों में से गरमी बहती हुई महसूस हुई। उसने चाची से कहा, "यीशु तुम्हें चंगा कर रहा है।" चाची को पता चल गया कि यह सच है। वे बताते हैं कि उसी एक चंगाई ने चाची-चाचा और रिश्ते के बच्चों के लिए यीशु के दिए हुए छुटकारे में आने का दरवाज़ा खोल दिया।
इस काम में पश्चिम की ओर मैं सबसे पास ली के साथ चलता हूँ। ली अमेरिका में हमारा गॉस्पेल मूवमेंट का काम चलाता है। हम दोनों क़रीब-क़रीब हर हफ़्ते बात करते हैं। अपने नेटवर्क की अमेरिकी टीमों को कोचिंग देने के लिए वह मुझे एक शहर से दूसरे शहर बुलाता रहता है।
ली की टीम की मुख्य अगुवाओं में एक हैं दक्षिण आइडाहो की रूथ हॉप। रूथ ने छोटे ग्रुप के अगुवों की एक मंडली को डिस्कवरी ग्रुप चलाना सिखाया। बाद में उन्होंने लिखा — माताओं के पहले ग्रुपों का फल देखकर उनकी कलीसिया ने डिस्कवरी ग्रुप को ही अपने छोटे ग्रुपों का मुख्य तरीक़ा बना लिया।
अमरिलो शहर में एक नौजवान ने अपने काम की जगह पर दरवाज़ा खुलने के लिए दो साल प्रार्थना की। अब वह नौकरी में ही दस डिस्कवरी ग्रुप चला रहा है। ली कहता है कि पिछले एक साल से वह हवा बदलती देख रहा है। मैं भी उसके साथ वही देख रहा हूँ।
एक यात्रा से घर लौटते हुए हम इलिनॉय के ग्रीनविल क़स्बे में अपने दो दोस्तों बिल और टेरी से मिलने रुके। बिल हाल ही में भारत देखकर आया था। आते ही, हर दूसरे मंगलवार अपने घर के कमरे में सात आदमियों के साथ पवित्रशास्त्र पढ़ना शुरू कर दिया। अपनी कलीसिया में भी एक डिस्कवरी ग्रुप शुरू किया। पिछले एक साल से वह क़स्बे के पास की बड़ी जेल में जाता रहा है। भारत में जो देखा, वह अब उस जेल के भीतर उसके चलने के ढंग को गढ़ रहा है।
हमारे विश्वव्यापी मूवमेंट परिवार की अगुवाई करनेवाले एक दोस्त ने, हमारे साथ भारत की यात्रा करके लौटने के बाद, अपने पहले से जाने-पहचाने बीस आदमियों को बुलाया — चार हफ़्ते तक, हर इतवार सुबह सात बजे उसके साथ पवित्रशास्त्र पढ़ने के लिए। जुड़ने की एक शर्त थी — हर एक को अपने ही परिवार के साथ घर में भी एक डिस्कवरी ग्रुप शुरू करना होगा। सात ने हाँ कही। छह टिके। उसके हवाई जहाज़ से उतरने से पहले जो नहीं थे, ऐसे आठ डिस्कवरी ग्रुप अब उसके शहर में मिल रहे हैं। उस पूरे परिवार की अगुवाई करनेवाला आदमी ख़ुद, अपने ही घर के कमरे में वही चार आदतें जी रहा है।
वही ढंग पूरे देश में छोटे-छोटे कमरों में दिख रहा है। उत्तरी आइडाहो में डेविड नाम का एक शांत हाई स्कूल लड़का, स्कूल के बाद अपने दो मसीही दोस्तों को एक कॉफ़ी शॉप ले गया। महीना बीतते-बीतते अपने जूनियर दोस्तों के साथ दूसरा ग्रुप शुरू कर दिया। एनाहाइम में पैट्रिक और आंद्रिया पति-पत्नी अपने घर में पड़ोसियों के साथ पवित्रशास्त्र खोलते हैं। एक शुक्रवार पैट्रिक ने मुझे "आख़िरी घड़ी की विनती" कहकर संदेश किया — नए-नए बने परिचितों के बीच पंद्रह मिनट में शुरू होनेवाले एक नए डिस्कवरी ग्रुप के लिए प्रार्थना माँगी।
विस्कॉन्सिन में मार्कस नाम का एक मूवमेंट अगुवा, हर तीसरे बुधवार वीडियो कॉल पर अपने राज्य के बहत्तर ज़िलों के सामान्य सेवकों को एक साथ बिठाता है। अलबामा के बर्मिंघम में एक बहन ने पचहत्तर से पचानबे साल की बुज़ुर्ग स्त्रियों के साथ एक डिस्कवरी ग्रुप शुरू किया। बाद में उन्होंने लिखा — "उन्हें यह इतना भा गया है। ये दादी-नानी अभी से 'मैं करूँगा' संकल्प कर रही हैं।"
इस साल हमारे भारत समिट से निकली कुछ बातें अब यूरोप में शुरू हो रही हैं। ग्लासगो से हमारा दोस्त एडम हमारे साथ समिट में आया था। कुछ महीनों बाद उसने एक छोटा वीडियो बनाया। उसका नाम था — परमेश्वर की नई हलचल के लिए यूरोप को तैयार करना।
समिट में उसे बदल देनेवाले एक पल के बारे में उसने बताया। भारत की टीम ने कमरे में मौजूद सब यूरोपवालों को आगे बुलाकर उन पर प्रार्थना की। उसके शब्दों में — उन्होंने, रिले दौड़ में छड़ी थमाने की तरह, आत्मिक ज़िम्मेदारी हमारे हाथ में देकर कहा, "जाइए, दौड़िए। हम जो कर रहे हैं वह देखिए। यूरोप में उससे भी ज़्यादा देखिए।" वह छड़ी हाथ में पकड़े ही घर लौटा।
छपने से पहले इस हिस्से को पढ़कर मंज़ूरी देने को जब एडम से कहा, तो उसने उस कमरे से लाई हुई बात और आगे लिखी। उसी के शब्दों में — "यूरोप में यह काम सचमुच पैदा उन्हीं दिनों हुआ जब हम भारत में थे। यूरोप के सेवक हम सब एक होकर एक सवाल पूछें, इसका कारण वही समय बना — परमेश्वर के साथ जुड़कर वही मूवमेंट का विस्फोट अपने महाद्वीप में भी देखना हो, तो हमें क्या चाहिए?" रिले की छड़ी की तस्वीर के साथ एक और बात भी उसके साथ आई, यह भी लिखा — "एक बोध कि प्रभु कह रहा है, आनेवाले पाँच वर्षों में यूरोप में भी मैं रफ़्तार बढ़ाने का काम करूँगा।"
एडम अब यूरोप में उस काम का अगुवा है।
उसी समिट के हफ़्ते में एक और बात हुई। हमारी ग्लोबल पार्टनर्स टीम में सेवा करनेवाली मेरी दोस्त जैकी मेकर को एक सपना आया। उसे एक नक़्शा दिखा। उस पर लाल धागे थे। वे हमारी दुनिया की ओर से, उसकी टीम जिन यूरोपीय शहरों के लिए प्रार्थना करती आई थी, वहाँ तक इधर-उधर दौड़ रहे थे। एक ही दिशा में नहीं, दोनों दिशाओं में।
महीनों बाद, जैसा उसने देखा था वैसा उसकी टीम भी देखे, इसलिए उसने वह चित्र बनवाया। एडम एक रिले की छड़ी घर ले गया। जैकी ने धागे देखे। दो लोग, एक ही समिट, एक ही बात दो रूपों में। दुनिया के इन दो छोरों के बीच परमेश्वर कुछ कर रहा है।
यूरोप में यही काम उठाए एक और दोस्त कितने ही देशों के मूवमेंट अगुवों के साथ चलता है। वह और उसकी पत्नी अपने ही शहर में एक छोटी संगति चलाते हैं। बीस-पच्चीस साल का एक नौजवान सात महीने से उस संगति में है। हाल ही में उनके घर के कमरे में बैठकर उसने कहा — इस गर्मी में वह अपने ग़ैर-मसीही दोस्तों के साथ दो डिस्कवरी ग्रुप शुरू करने जा रहा है। "सात महीने पहले मैं सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा कुछ करूँगा," उसने कहा। एक यूरोपीय शहर के किनारे बैठे एक अकेले नौजवान में भी वही बदलाव शुरू हो रहा है।
इंग्लैंड के एक गाँव में फिलिप नाम के आदमी के भीतर अपने आस-पास के लोगों के बीच डिस्कवरी ग्रुप की वही तड़प जागी। गाँव के पब में, यानी उस छोटी-सी जगह में जहाँ पूरा गाँव मिलता है, एक कमरा अभी-अभी ख़ाली हुआ था। उस कमरे का नाम था — "ऊपरी कमरा।" वहाँ बाइबल खोलने से पहले, ज़मीन तैयार होने के लिए, उसने और कुछ लोगों ने तीन महीने उस कमरे को प्रार्थना से भरने का फ़ैसला किया।
ये कहीं-कहीं होनेवाली अकेली घटनाएँ नहीं हैं। कैलिफ़ोर्निया, आइडाहो, अमरिलो, डलास, ऑस्टिन, कैनसस सिटी, विस्कॉन्सिन, ग्रीनविल से लेकर ग्लासगो, एडिनबरा, वेल्स और इंग्लैंड के शहरों तक गॉस्पेल मूवमेंट टीमों के साथ मैं चला हूँ।
हर हफ़्ते मेरे फ़ोन पर गवाहियाँ आती रहती हैं। जहाँ मैं गया हूँ वहाँ से भी, जहाँ नहीं गया वहाँ से भी — छोटे-छोटे आज्ञा-पालनों की गवाहियाँ आती हैं।
कॉफ़ी शॉप में मिली एक बहन जिसका पति गुज़र गया। बाइबल स्टडी में बदल गया एक पिकलबॉल का खेल। अपने लोगों को उपदेश देना बंद करके सवाल पूछना शुरू करनेवाला एक पास्टर। कैनसस सिटी में उबर चलानेवाला कांगो देश का एक आदमी। यह वह बीज है जिसे प्रभु सींच रहा है। यह अभी आना बाक़ी नहीं है। यह आ चुका है।
उसी उबर की पिछली सीट पर हुई बात ही लीजिए। कुछ महीने पहले एक आदमी ने मुझे कैनसस सिटी में घर छोड़ा। रास्ते की बातों में पता चला — वह कांगो से आया है। और पचास लोगों की एक कलीसिया का पास्टर भी है।
हमारे घर के सामने गाड़ी रुकने से पहले ही, हमारे बीच एक छोटी कोचिंग की बातचीत हो गई। जो किसी से भी पूछता हूँ, वही चंद सवाल पूछे। अपने ही लोगों के साथ पवित्रशास्त्र पढ़ने का सरल रास्ता दिखाया। अपना नंबर दिया। उसका नाम डेविड था। उसका जवाब अभी तक नहीं आया। शायद आए भी नहीं। पर इससे हम दोनों में से किसी का कुछ गया नहीं। एक मंगलवार की रात, उसी गाड़ी में, वहीं दरवाज़ा खुला हुआ था।
आ चुका क्या है? वही जीवन-शैली। सामान्य लोग प्रभु की आवाज़ सुनना, आज्ञा मानना, और आगे पहुँचाना शुरू कर रहे हैं। वह जीवन धीरे-धीरे उनकी आम मसीही ज़िंदगी बनता जा रहा है। पश्चिम में कुछ लोग अभी से पीढ़ियाँ बढ़ती देख रहे हैं। हर एक के लिए मैं ख़ुश होता हूँ। पर जिसकी बाट मैं अब भी जोह रहा हूँ, वह दूसरा दिन है। वह दिन जब यह पश्चिम में भी आम हो जाए। जब चार पीढ़ियों की फ़सल वहाँ भी उतनी ही आम हो जाए जितनी भारत में हो चुकी है। मुझे विश्वास है कि वह दिन आएगा। क्योंकि हर जगह गिनतियाँ जीवन-शैली के पीछे ही आई हैं। कभी पहले नहीं आईं। जीवन-शैली पहले ही ज़मीन में पड़ चुकी थी। हर फ़सल की शुरुआत वहीं से होती है।
इस साल हमारे भारत समिट की एक शाम का समापन किसने किया, पता है? अनिल ने। पूरे कमरे पर आशीष की प्रार्थना उसी ने की। अनिल याद है? हमारे क़स्बे का वह पेट्रोल पंप वाला दोस्त। जमी-जमाई कलीसिया जिन्हें "योग्यताएँ" कहती है, उनमें से एक भी जिसके पास नहीं। उस कमरे में मौजूद हर देश में, सामान्य शिष्यों के बीच परमेश्वर का यही काम हो — उसने यही प्रार्थना की। कुछ महीने बाद, इसी जनवरी में समिट में जिस मूवमेंट अगुवे टॉम से मैं पहली बार मिला था, उसने वही प्रार्थना अपने शब्दों में हमारी टीम के ग्रुप चैट में डाली। हम बाक़ी सबने उसे साथ मिलकर पढ़ा। उसने लिखा — "यीशु, वहाँ तू जो कर रहा है, वह यहाँ अमेरिका में कर। हमें दूसरों के लिए काम करनेवाले बनाकर काम में लगा।" पेट्रोल पंप वाले आदमी ने कमरे को आशीष दी। पश्चिम के एक मूवमेंट अगुवे ने उस प्रार्थना में सुर मिलाया। और जिस आत्मा ने वह प्रार्थना जगाई, वही जवाब बनकर चल रहा है।
इस अध्याय को ख़त्म करने से पहले एक आख़िरी दृश्य बताता हूँ। क्योंकि यह वह दृश्य है जो मेरे भीतर बढ़ता आ रहा है। पश्चिमी देशों की हर बड़ी मिशन संस्था के पास एक मेलिंग लिस्ट होती है। तीस हज़ार नाम। चालीस हज़ार। पचास हज़ार। प्रभु से प्रेम करनेवाले, इस काम से प्रेम करनेवाले, महीने दर महीने प्रार्थना करते और देते आए वफ़ादार सहयोगी। वे पहले से समर्पित लोग हैं।
एक बार कल्पना कीजिए — हर वह संस्था अपने तीस, चालीस, पचास हज़ार लोगों को लिखकर सीधे पूछे तो? "अपने ही घर में, अपने दोस्तों के साथ, अपने परिवार के साथ, अपने पड़ोसियों के साथ एक सरल डिस्कवरी ग्रुप शुरू करेंगे? क्या आप मानते हैं कि जिन देशों की आप इतने बरसों से मदद करते आए हैं, वहाँ काम करनेवाला वही परमेश्वर आपकी अपनी गली में भी कुछ करेगा?"
कितने हाँ कहेंगे, यह मुझे नहीं पता। इतना पता है कि कुछ कहेंगे। यह भी पता है कि पश्चिम में मूवमेंट के लिए सब लोग नहीं चाहिए। जो तैयार हैं, वे काफ़ी हैं। पर उन मेलिंग लिस्टों के लोग वही लोग हैं जिन्हें प्रभु बरसों से तैयार करता आया है। उनका दिया हर दान, उसके काम के लिए एक छोटी "हाँ" है। बस एक "हाँ" और बाक़ी है — उस काम को अपने ही घर ले आने की "हाँ"।
पश्चिमी मिशन संस्थाओं के वफ़ादार सहयोगियों का एक छोटा-सा हिस्सा भी पूछे जाने पर हाँ कह दे और इसी हफ़्ते अपने घरों में डिस्कवरी ग्रुप शुरू कर दे, तो दस साल में पश्चिमी देश ही अलग दिखने लगेंगे।
यही चौथी आदत है।
यह आँखों को कैसा दिखता है?
चारों आदतें अब आपके हाथ में हैं। पुस्तक के इस हिस्से को किसी चित्र के साथ ख़त्म करने का मेरा मन नहीं। मैं दिखाऊँगा कि वे एक साधारण कमरे में कैसी दिखती हैं। क्योंकि पन्ने पर से कहीं ज़्यादा साफ़ वे कमरे में ही दिखती हैं।
एक पिता, एक माँ, और दो किशोर बच्चों की कल्पना कीजिए। इन दिनों वे चारों अपनी खाने की मेज़ पर बैठकर, एक-एक कहानी करके बाइबल पढ़ते हैं। चलानेवाला चौदह साल का लड़का है, पिता नहीं। खोए हुए बेटे की कहानी हो या निन्यानबे को छोड़कर गए चरवाहे की, वह उसे खोलकर, अपने ही माता-पिता से एक सवाल पूछकर, इंतज़ार करता है।
कुछ भी पवित्र-सा मत सोच लीजिए। एक बच्ची छत की ओर ताक रही है। पिता गोद में रखे फ़ोन पर चोर-नज़र डाल रहे हैं। उस कमरे में किसी को भाषण नहीं सुनना है। सुनने की ज़रूरत भी नहीं। यह तरीक़ा ऐसा है ही इसीलिए।
एक रात वह खोए हुए बेटे की कहानी थी। हमेशा की तरह पहले हर एक ने सच कहा — एक बात जिसके लिए धन्यवादी है, एक जो बोझ है। फिर लड़के ने पढ़ा और बहन से दोहराने को कहा। उसने बिना किसी चर्च वाली चमक के दोहराया — एक बेटा जो चाहता था कि उसका पिता मर जाए। पैसे लिए, उड़ा दिए, और सूअरों के चारे को देखकर ललचाने जितनी भूख तक आ पहुँचा। नौकर बनकर रह लूँगा, यह सोचकर घर की ओर चला। दूर से ही देखकर वह पिता दौड़ता हुआ आया।
फिर सवाल आते हैं। हर बार वही चंद सवाल। यह हमें परमेश्वर के बारे में क्या दिखा रहा है? मनुष्यों के बारे में क्या दिखा रहा है? परमेश्वर तुझसे क्या कह रहा है? मेज़ पर जो हिस्सा कोई तैयार नहीं कर सकता, वह यही है। उन थोड़े मिनटों में कहीं न कहीं, जो किसी ने सिखाई नहीं, ऐसी एक बात प्रभु उस कमरे में किसी एक से कहता है। वह बात किसी न किसी के चेहरे पर चमकती हुई आप देखते हैं। भाषण उतना ही दे सकता है जितना आगे खड़े आदमी को पहले से मालूम है। यह तरीक़ा तो आपको उसी प्रभु के हाथ में सौंप देता है जो सबके बैठने से पहले ही उस कमरे में बोल रहा था।
उठने से पहले आख़िरी सवाल। इस हफ़्ते इसके बारे में क्या करोगे? किससे कहोगे? हर एक ने एक बात कही। असली काम, असली आदमी। अगले हफ़्ते की शुरुआत उसी सवाल से हुई — "कैसा रहा?"
कुछ रातें उस लड़के का मन वीडियो गेम खेलने का होता है। कुछ रातें सब फीका-सा बीतता है। फिर भी वे करते हैं। फिर भी वह उनके हफ़्ते का सबसे सच्चा आधा घंटा है। आपकी अपनी पहली मेज़ भी ऐसी ही हो, आधी-अधूरी चलती और थोड़ी ज़बरदस्ती-सी लगे, तो आप जैसे बहुत लोग हैं। सच्ची चीज़ें ज़्यादातर ऐसी ही होती हैं।
वह मेज़ पहला दृश्य है। अब दूसरा दृश्य — वह चीज़ जो एक ग्रुप को तीसरे महीने तक चुपचाप बंद हो जाने से बचाती है।
ऐसा ग्रुप अच्छी तरह शुरू होकर भी मुरझा सकता है। मुरझानेवालों में ज़्यादातर का कारण एक ही होता है — जिसने शुरू किया, उसके साथ कोई चल नहीं रहा। प्रशिक्षण तो उसी पढ़ाई में है। उसे चलाए रखती है बस इतनी बात, कि एक क़दम आगे चलनेवाली एक सहेली पूछती रहे, "कैसा चल रहा है?" इस पूछने का एक नाम है। अध्याय ख़त्म होने से पहले बता दूँगा। पहले वह बातचीत सुनिए। नाम से ज़्यादा ज़रूरी उसकी आवाज़ है।
मान लीजिए आपकी कलीसिया में एक बहन ने कुछ महीने पहले अपनी छोटी बहन और एक पड़ोसन के साथ इसी तरह बाइबल पढ़ना शुरू किया। उसे मैं रोज़ा कहूँगा। एक और बहन, ग्रेस, ने एक साल पहले अपना ग्रुप शुरू किया था। ग्रेस क़रीब-क़रीब हर हफ़्ते आधे घंटे के लिए रोज़ा को फ़ोन करती है। उसके पास न प्रशिक्षण है, न रुतबा। बस रोज़ा से एक क़दम आगे है। इस स्तर पर इतना ही काफ़ी है।
ग्रेस पाठ से शुरू नहीं करती। जैसे सहेली से बात शुरू करते हैं, वैसे ही करती है — हफ़्ता कैसा बीता, घर में सब कैसे हैं। फिर एक-दो वाक्य की प्रार्थना से प्रभु को उस बातचीत में बुला लेती है। उसमें असली काम करनेवाली वह ख़ुद नहीं है। उसके बाद, पिछले हफ़्ते रोज़ा ने जो एक काम करने की बात कही थी, उस पर लौट आती है।
अब सुनिए। यह सचमुच हुई किसी बातचीत का रिकॉर्ड नहीं है। ऐसी बातचीतें आम तौर पर कैसे चलती हैं, यह दिखाने के लिए गढ़ी गई है।
"अपनी पड़ोसन के साथ क्या हुआ?" ग्रेस ने पूछा। "तुमने कहा था कि अगली कहानी उसके साथ पढ़ने को पूछोगी।"
"उसने हाँ कह दी," रोज़ा ने बताया। "उसने ज़िंदगी में कभी बाइबल नहीं खोली। और हाँ कह दी। अब मुझे डर लग रहा है कि पता नहीं क्या करना है।"
"इस हफ़्ते प्रभु तुझसे क्या कह रहा है?"
"यह कि वह मुझसे उपदेशक बनने को नहीं कह रहा। जो हिस्सा मैंने पढ़ा, उसमें उसने बिना प्रशिक्षण के मामूली लोगों को ही भेजा था। लगा जैसे वह कह रहा हो, 'तेरे तैयार होने का इंतज़ार मैं नहीं कर रहा। तेरे पास जो है, उसी के साथ जा।'"
"सच बता — अभी तू है कहाँ? क्या मदद कर रहा है? क्या रोक रहा है?"
"पढ़ना कठिन नहीं है। कहानी पर बात करते हैं। बस इतना। रोकती है वह भीतर की आवाज़ — 'इसे चलानेवाली मैं होती कौन हूँ? वह तो मुझसे ज़्यादा सालों से चर्च जाती है।'"
"वह आवाज़ न होती तो क्या करती?"
"बस शुरू कर देती। पहली कहानी चुनकर उसके साथ पढ़ लेती। बाक़ी प्रभु पर छोड़ देती।"
"वह पहली कहानी कौन-सी हो सकती है?"
"वह लक़वे का मारा आदमी, जिसे उसके दोस्त उठाकर लाए थे। पिछले महीने उसने मुझसे कहा था कि उसे कहीं फँसे होने जैसा लगता है। मुझे लगता है उस कहानी में वह ख़ुद को देख लेगी।"
"कब कर सकती है? तैयार होने के लिए तुझे क्या चाहिए?"
"गुरुवार, जब बच्चे स्कूल में होंगे। पहले मैं ख़ुद पढ़ लूँगी और सवाल लिखकर रख लूँगी।"
"क्या रुकावट आ सकती है? आए तो क्या करेगी?"
"वह टाल सकती है। टाले तो मैं उसे 'ना' नहीं मानूँगी। बस कोई और दिन पूछ लूँगी।"
"तो इस हफ़्ते क्या करेगी?"
"बुधवार को मरकुस का दूसरा अध्याय पढ़कर सवाल लिख लूँगी। गुरुवार सुबह उससे मिलूँगी। तब तक हर दिन उसका नाम लेकर प्रार्थना करूँगी।"
"मैं यह लिख रही हूँ," ग्रेस ने कहा। "मैं भी उसके लिए प्रार्थना करूँगी। फ़ोन रखने से पहले मुझे तेरे लिए प्रार्थना करने दे।"
बस इतना। यह प्रशिक्षण जैसा नहीं, दोस्ती जैसा दिखता है। उस आधे घंटे में ग्रेस ने एक बार भी रोज़ा से "ऐसा कर" नहीं कहा। पूछा। इंतज़ार किया। जवाब प्रभु को ही देने दिया।
उस आधे घंटे में ग्रेस ने जो कुछ किया, उसका एक ढाँचा है। उस ढाँचे का एक नाम है। उसे IGROW कहते हैं। मेरे एक दोस्त ने बरसों पहले कोचिंग के इस ढंग को सरल बनाया था। ग्रेस ने प्रभु को भीतर बुलाया (Invite)। पूछा कि वह क्या कह रहा है — वही लक्ष्य है (Goal)। पूछा कि रोज़ा सचमुच कहाँ है — वही वास्तविकता है (Reality)। पूछा कि वह क्या-क्या कर सकती है — वही रास्ते हैं (Options)। पूछा कि वह क्या करेगी — वही संकल्प है (Will)। पाँच मामूली सवाल, तीस मिनट। इनमें से किसी के लिए न डिग्री चाहिए, न रुतबा।
और सबसे सरल रूप में, जब न आधा घंटा हो न फ़ोन, तो ये दो सवाल बन जाते हैं जो रोज़ा किसी से भी पूछ सकती है। पिछली बार प्रभु ने जो दिखाया, उसकी आज्ञा कैसे मानी? किससे कहा? दो ही सवाल। दयालु, पर कड़े। समय बीतते-बीतते, एक अच्छे गपशप वाले फ़ोन को मूवमेंट में यही बदलते हैं।
सामान्य शिष्या को रुतबा नहीं चाहिए। सब कुछ जम जाने तक इंतज़ार भी नहीं करना। उसे दो ही चीज़ें चाहिए — एक क़दम आगे चलकर सच्चे सवाल पूछती रहनेवाली एक सहेली, और ख़ुद किसी और के लिए वैसी ही सहेली बन जाना। चौथी आदत को एक अच्छा महीना नहीं, एक पूरा जीवनकाल बना देती है यही बात।
गॉस्पेल मूवमेंट ज़मीन पर ऐसा ही दिखता है। एक मेज़, जहाँ चौदह साल का लड़का अपने माता-पिता को एक कहानी में से चलाता है। एक फ़ोन कॉल, जहाँ एक सहेली दूसरी से पूछती है — प्रभु क्या कह रहा है? उसके बारे में क्या करोगी? दोनों में मंच पर कुछ भी नहीं है। और दोनों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आप इसी हफ़्ते न कर सकें।
चारों का सार यही है। सामान्य शिष्य परमेश्वर की आवाज़ सुनता है, उसकी आज्ञा मानता है, और एक और व्यक्ति की ऐसा करने में मदद करता है।
इस पुस्तक में अब जो बचा है, वह कुछ नया सीखने को नहीं है। सामान्य शिष्य की जीवन-शैली जीनी हो तो कितनी क़ीमत चुकानी पड़ती है — बस यही बताना बचा है। और उसके बारे में मैं आपसे सच्चा रहना चाहता हूँ।
मनन के लिए
प्रभु ने आपके साथ जो किया, वह किसी एक व्यक्ति को बता रहे हैं — ऐसा सोचें तो किसका चेहरा सामने आता है?
अपनी सबसे बड़ी गवाही हमने उसी एक कमरे में ताला लगाकर रख दी है जहाँ सब पहले ही विश्वास कर चुके हैं। आपकी कलीसिया की दीवारों के बाहर, इसे सबसे ज़्यादा सुनने की ज़रूरत किसे है?
इस हफ़्ते, जो काम आप पहले से कर रहे हैं उसमें एक व्यक्ति को बुलाइए — "मेरे साथ एक छोटी कहानी पढ़कर उस पर बात करोगे?" किसे बुलाएँगे?
सातवाँ अध्याय28 मिनट
इस रास्ते की एक क़ीमत है
पीढ़ी दर पीढ़ी क़ीमत चुकाकर आज्ञा मानी जाए तो क्या पैदा होता है, और एक सौ अड़तालीस साल तक चली जीवन-शैली कैसी दिखती है — पहले यह आपको दिखाना है।
पाँचवें अध्याय में बताया वह तेलुगु पिन्तेकुस्त याद है न। आज के आंध्र प्रदेश के तटवर्ती इलाक़े में 1878 तक उमड़ी उस विशाल फ़सल के पीछे परमेश्वर ने जिन लोगों को इस्तेमाल किया, उनमें एक तेलुगु आदमी था। अब उसका नाम बताता हूँ — यर्रगुंटला पेरय्या। उस समय बताया था कि वह चमड़े का काम करनेवाला साधारण आदमी था। भैंसों की खालें ख़रीदकर उनका व्यापार करते हुए जीता था। वह न मिशनरी था, न पास्टर, न प्रचारक।
अपने ही लोगों के बीच वह सामरी स्त्री जैसा था — उसके पास मंच नहीं था, पर रिश्तेदारी थी।
सुसमाचार उस तक पहुँचा तो उसने उसे किधर ले गया, यह देखिए। रिश्ते ही पुल बन गए। उसके जीवन की हर बात जिन पुलों से होकर चली, सुसमाचार भी उन्हीं से होकर चला। उसके लोग ही उसकी दुनिया थे। जिन बस्तियों में वह पैदा हुआ, वही उसका यरूशलेम थीं। उसने शुरू वहीं से किया जहाँ वह पहले से था, और उन्हीं लोगों के साथ जो परमेश्वर ने पहले ही उसे दिए थे।
विश्वास करने के बाद के चार साल पेरय्या ने क्या किया? एक बस्ती से दूसरी बस्ती चलते हुए, जो सुना था वह अपने ही लोगों को, उन्हीं की सदियों पुरानी बोली में कहता चला गया। चार साल तक यही करता रहा। एक-एक करके लोग विश्वास में आते गए। बस्तियों में झुंड बनाकर बैठे अपने लोगों से कहता, सिखाता गया। बड़े इंतज़ामों वाली सभाएँ और प्रचार-यात्राएँ उसके पास नहीं थीं। अपने लोगों से कहना उसने कभी नहीं छोड़ा। एक सामान्य शिष्य की तरह, जो सुना वही कहता हुआ चला।
उन चार वर्षों की आत्मिक यात्रा के अंत में ही आया वह महान दिन जिसका ज़िक्र पाँचवें अध्याय में किया — 3 जुलाई 1878, जिस दिन गुंडलकम्मा नदी में एक ही दिन में दो हज़ार दो सौ बाईस लोगों ने बपतिस्मा लिया। उसके बाद के हफ़्तों में नौ हज़ार से भी ज़्यादा लोगों ने लिया।
उस लहर में भीगे हज़ारों परिवारों में हमारा परिवार भी एक था। ऐसा परिवार अकेला हमारा ही नहीं है। पीढ़ियाँ पार करके चलते रहे परिवारों में हमारा भी एक है, बस इतना।
विश्वास कैसे फैला, यह देखिए — लोगों को उनके परिवारों से खींचकर बाहर लाने से नहीं। उन्हीं परिवारों में उतरकर, वहीं जम जाने से फैला। परिवार पूरे के पूरे आए। उस समाज के लोग ही सुसमाचार को आगे ले जानेवाले बन गए। कोई प्रचार-अभियान नहीं। अपने लोगों से प्रेम के कारण, जो ख़ुद सुना वही उन्हें कहता रह गया — ऐसे एक ही सामान्य शिष्य के कंधों पर चली वह एक पीपुल मूवमेंट थी।
उस साल पूरे इलाक़े को डुबो देनेवाली उस लहर ने हमारे अपने पड़दादा-पड़दादी को भी छुआ। अकाल की राहत और बपतिस्मे जिन परिवारों के जीवन बदल गए, उनमें वे भी थे। दिखनेवाली हर बात में वे मामूली ही थे। उनके पास एक ही चीज़ थी — सुसमाचार। वह उन्होंने अपने बच्चों को सिखाया। उन बच्चों ने अपने बच्चों को सिखाया।
1950 के दशक तक, उनके वंशजों ने एक साफ़, पीढ़ियों को पार करनेवाला वाचा-बंधन किया — कि अपने इलाक़े में सुसमाचार के काम को ही अपने जीवन देंगे। वह वाचा करनेवालों में हमारे नाना-नानी भी थे। उस वाचावाले घर में जन्मे बारह बच्चों में सबसे बड़ी हमारी माँ थीं।
हमारे नाना-नानी आगे बढ़कर कितनी ही कलीसियाओं के नेटवर्क वाले एक स्थानीय मिशन को चलाते रहे। अगली पीढ़ी में हमारे माता-पिता ने अपनी सेवकाई शुरू की। अपने घर में मैं पाँचवीं पीढ़ी का मसीही हूँ। वह जगह मैंने कमाई नहीं। मैं उसी में पैदा हुआ, और सिर्फ़ इतनी कोशिश की कि चलना बंद न हो।
हमारे परिवार में पाँच पीढ़ियों से जो चल रहा है, वह कोई तरीक़ा नहीं, एक जीवन-शैली है।
1878 वाली उस पहली पीढ़ी के पास "डिस्कवरी ग्रुप" शब्द नहीं था। पर वह रुख़ था। सामान्य शिष्य थे। परमेश्वर की आवाज़ सुनना था। आज्ञा मानना था। और जो सुना वह अगले व्यक्ति को कह देने की आदत भी थी।
एक सौ अड़तालीस साल बाद, पाँचवीं पीढ़ी को, जिस सार ने उनके परिवार को इतने समय चलाया, उसका आख़िरकार एक नाम मिल गया।
वह एक जीवन-शैली है। वही आम मसीही ज़िंदगी है। चार आदतें एक परिवार के जीवन के लिए बहुत लंबे समय तक आम हो जाएँ, तो यही होता है।
पाँच पीढ़ियों तक क़ीमत चुकाकर आज्ञा मानने से आनेवाला फल यही है।
यीशु, और उसके सामने आए जंगल
यीशु ने अपनी सेवकाई शुरू करने से पहले जंगल में क़दम रखा। चालीस दिन रोटी को, अधिकार को, और चमत्कार के तमाशे को "ना" कहकर, अपने सामने रखे काम के लिए तैयार होकर वह गलील में आया। वह जंगल दंड नहीं था। वही जगह थी जिसने उसे तैयार किया।
पर हम कभी-कभी इसे एक ख़त्म हो चुके अध्याय की तरह पढ़ते हैं — यीशु परखा गया, जीत गया, शैतान चला गया, बात वहीं ख़त्म। पर सुसमाचार पढ़िए तो पता चलता है कि वह लड़ाई वहाँ रुकी नहीं। उसकी सेवकाई के तीनों वर्षों में वह बार-बार लौटती रही। छुड़ाए जाने की ज़रूरत वाले लोगों में दुष्टात्माएँ। नियमों में उसे फँसाने की ताक में बैठे धर्म के अगुवे। अधिकार से और पैसे से उसका मुँह बंद करना चाहते बड़े लोग। और आख़िर में, उसके हाथ का खाना खाकर, उसी से चंगे हुए वही भीड़ें पलटकर चिल्लाईं — "क्रूस पर चढ़ा!"
वह जिस किसी को भेजता है, उसके साथ यही होता है। यीशु के लिए जैसा, वैसा ही हमारे लिए भी — हमारा जंगल चालीस दिन में ख़त्म होनेवाला अध्याय नहीं, हमारे भीतर बसनेवाली जगह है। क़ीमत किसी एक दिन आनेवाली बड़ी चोट नहीं, रोज़ की बात है।
आगे बढ़ना है तो क़ीमत चुकानी है
मेरे जीवन में, परमेश्वर के दिए काम में जब भी नया विस्तार आया, वह गहरी पीड़ा या परीक्षा के बिना कभी नहीं आया। और जब वह आती है, तो वह पीड़ा इस बात का चिह्न नहीं होती कि "कुछ ग़लत हो गया"। वह भी इसी रास्ते का हिस्सा है।
यह जीवन बहुत समय जीने के बाद मुझे समझ आया — हममें से बहुतों को क़ीमत के बारे में किसी ने ज़्यादा बताया ही नहीं। हमारी पीढ़ी के शिष्यत्व के लेखन का बहुत बड़ा हिस्सा इस बारे में ईमानदार नहीं है। उसने फल की बात की। फल सच है। पर उस फल की एक क़ीमत भी है।
यह जीवन-शैली हर एक से कोई न कोई क़ीमत चुकवाती है। जो इसे जीते हैं उनसे भी, और उनके आस-पास वालों से भी। वे जिस संस्था में हैं उससे भी, जिस मिशनरी संस्था ने उन्हें गढ़ा उससे भी, इसे जगह देने की कोशिश करते पास्टर से भी, और जिस परिवार से नए ढंग से जीने को कहा जा रहा है उससे भी। आप मूवमेंट अगुवा हों या सामान्य शिष्य, असली क़ीमत चुकाएँगे। वह क़ीमत आम तौर पर आपके ही जीवन का, आपकी ही बुलाहटों का आकार ले लेती है।
सेवकाई में अगुवे के रूप में मैंने क़ीमत चुकाई। सारा ने और हमारे बच्चों ने चुकाई। हमने जिन कुछ क़ीमतों का सामना किया, और हर बार प्रभु ने हमें कैसे पार लगाया — वह आपको बताऊँगा। उन जंगल के दिनों में भी पिता हम पर अपने प्रेम की बात कहना नहीं छोड़ता। आत्मा हमें दिलासा देना नहीं छोड़ता। आपके जंगल में भी वह यही करेगा, यह मुझे मालूम है।
वह दौर जब मैं टूट गया
उस दिन की बात बताता हूँ जब मैं भीतर से टूट गया।
17 सितंबर 2003।
उससे दो साल पहले हम अपने ज़िले से एक बड़े शहर में आ गए थे। हमारी योजना राज्य के हर ज़िले तक बढ़ चुकी थी। लाखों लोग, हज़ारों गाँव। उस सेवा का बोझ देखकर ही डर लगता था। एक ऐसी बेचैनी से जूझ रहा था जिसका नाम भी मुझे नहीं मालूम था। सारा तब साढ़े आठ महीने की गर्भवती थीं। हमारी तीसरी बेटी अमीरा आनेवाली थी।
समझदार और नई-नई बातें सोचकर करनेवाली हमारी बड़ी बेटी सिमोना तब छह साल की थी। प्यारी नन्ही शायना सत्रह महीने की। दोनों घर पर ही थीं।
मैं अपने घर की छत पर था। भीतर से एक चीख़ सुनाई दी।
दौड़कर नीचे आया तो देखा, मेरी पत्नी शायना को बाथरूम में ले जाकर उस पर ठंडा पानी डाल रही हैं। शायना रसोई में चलकर गई थी और चूल्हे के पास रखे उबलते चिकन सूप के बर्तन को अपने ऊपर खींच लिया था। घर में हमारी मदद करनेवाली महिला पल भर पहले ही उसे वहाँ रखकर गई थी। नन्ही शायना बुरी तरह जल गई। साफ़ चादर में लपेटकर हम अस्पताल की ओर दौड़े।
वह सफ़र मुझे याद ही नहीं। जले के वार्ड में सारा शायना के पास ही रह गईं। डॉक्टर जान बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे और वे बच्ची को गोद में लेकर दूध पिलाती बैठी रहीं।
कुछ दिनों बाद शायना के घावों में संक्रमण फैल गया और ख़ून की ज़रूरत पड़ी। उसका ब्लड ग्रुप मेरा ही था। इसलिए डॉक्टर ने मुझसे ख़ून देने को कहा। मैंने नमूना दिया। रिपोर्ट आने पर डॉक्टर ने बताया — आपका ख़ून काम का नहीं है।
"क्यों?"
"हेपेटाइटिस सी।"
हेपेटाइटिस सी क्या होता है, मुझे मालूम नहीं था। अस्पताल की लॉबी के कंप्यूटर पर जाकर ढूँढ़ा। पता चला — यह बिना साफ़ की गई सुइयों से फैलता है। बचपन में मुझे लगे कुत्ते के काटने के इंजेक्शनों की क़तार याद आ गई। उन दिनों एक ही सिरिंज सबके लिए इस्तेमाल होती थी। एक कटोरी के पानी को सिरिंज में खींचकर, बाहर मारकर, वही सुई फिर लगा देते थे। यानी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा यह बीमारी मेरे भीतर ही रहकर चुपचाप नुक़सान करती आई होगी।
इलाज क्या है, यह देखने आगे पढ़ा। "ठीक करनेवाली दवा नहीं है" — ये शब्द दिखते ही लगा जैसे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
फिर जले के वार्ड में लौटा। वहाँ मेरी सत्रह महीने की बच्ची पट्टियों में लिपटी पड़ी थी। मेरी गर्भवती पत्नी, जिनके दिन पूरे हो चुके थे, उस बिस्तर के पास बैठी थीं। मुझे उनसे कहना पड़ा कि बरसों से मैं अपने भीतर एक बीमारी लिए घूम रहा हूँ। किसी को लगी नहीं, पर लगने का ख़तरा है — यह भी कहना पड़ा।
(यहाँ एक नाम कृतज्ञता से लेना है — हमारी क़रीबी रिश्तेदार संध्या रानी। शायना के लिए ख़ून देने रातोंरात बस पकड़कर आ गईं और हमें सँभाल लिया।)
हमारी बड़ी बेटी सिमोना तब छह साल की थी। शायना उसकी जान थी। अस्पताल जाना संभव नहीं था, इसलिए बहन का दुख कम करने को उसने जो कर सकती थी वह किया। फ़ोन पर गीत और कविताएँ गाकर सुनाती। काग़ज़ के खिलौने मोड़कर, रंगीन चित्र बनाकर, अस्पताल का कमरा सजाने के लिए भेजती। उन हफ़्तों में माँ अस्पताल में शायना के पास थीं। मैं भीतर से पूरी तरह टूटा हुआ था। उस अकेलेपन में सिमोना ने अपनी बहन के लिए बहुत दुख और बहुत डर उठाया। वह बोझ बरसों तक सिमोना का गहरे तक पीछा करता रहा।
ऐसे समय में, इतनी सारी मुश्किलों के बीच, परमेश्वर ने हमें सोना दिया। 6 अक्टूबर 2003 को, शायना के अस्पताल में भर्ती होने के उन्नीसवें दिन, सारा कुछ घंटों के लिए शायना के पास से उठकर गईं और हमारी तीसरी बेटी अमीरा को जन्म दिया। अमीरा का आना उठाने के लिए कोई और बोझ नहीं बना। वह नन्ही बच्ची जंगल के बीचोंबीच परमेश्वर की दिखाई करुणा थी। कठिनाई और दुख चलते रहते हुए भी प्रभु अपने प्यारों को आनंद और जय देता है — इसकी वह जीती-जागती गवाही है।
अभी-अभी जन्मी अमीरा को उस वार्ड में ले जाना मना था जहाँ उसकी बहन संक्रमण से लड़ रही थी। अस्पताल के नियम इजाज़त नहीं देते। जिन दिनों वह बोझ हम दोनों से नहीं उठ रहा था, तब सहारा बनने सारा की माँ नैंसी आ गईं। उसके बाद के पूरे हफ़्ते दोनों ने बारी बाँट ली। एक अस्पताल में शायना के पास, दूसरी घर पर अमीरा और सिमोना के पास। सारा दोनों नन्ही बच्चियों को दूध पिलाती रहीं, और दूर रहना पड़ता तो अमीरा के लिए दूध निकालकर रखती रहीं। (मैं एक तरह की सन्न हालत में पड़ा रहा और उनकी ज़्यादा मदद नहीं कर पाया।)
उसी महीने, आगे के इलाज के लिए शायना के सफ़र लायक़ होते ही, सारा तीनों बेटियों — सिमोना, शायना और नन्ही अमीरा — को लेकर अमेरिका चली गईं। मैं अकेला भारत में, किराए के एक छोटे फ़्लैट में रह गया। क्यों, पता है? मुझे यह बेतुका डर पकड़ बैठा था कि कहीं मेरी बीमारी उन्हें न लग जाए।
इंटरफ़ेरॉन का इलाज शुरू किया। उसके साथ डॉक्टर की दी हुई बेचैनी कम करने की दवा शुरू की। वह दवा लत बन जानेवाली है, यह मुझे नहीं मालूम था। लेता चला गया।
कुछ ही महीनों में मुझे ऐसी चीज़ें दिखने लगीं जो थीं ही नहीं। मेरे बोलने का ढंग इतना बदल गया कि साथ रहनेवाला सहायक डर गया। उसने मेरे भाई को फ़ोन किया। भाई अपने परिवार के साथ आकर मुझे हमारे माता-पिता के घर ले गया। कुछ हफ़्तों तक मैं मानसिक रूप से अपने होश में ही नहीं था।
उस समय मैं भारत में और सारा बच्चों के साथ अमेरिका में थीं, इसलिए फुसफुसाहटें शुरू हो गईं। दोस्तों के दोस्तों के ज़रिए मेरे कान तक आईं। "जेम्स ने कुछ किया होगा। इसीलिए बेटी के साथ ऐसा हुआ। सारा छोड़कर चली गई होगी। शादी ख़त्म ही समझो।" कुछ भी सच नहीं था। पर झूठ फैलता रहा।
सारा ने नहीं छोड़ा। इलाज पूरा होने के बाद मैं परिवार के पास अमेरिका गया। बीमार और कमज़ोर हालत में मोंटाना पहुँचे मुझे कुछ सुंदर दिखाने के लिए, बच्चों को गाड़ी की पिछली सीट पर बिठाकर, वे मुझे बर्फ़ के पहाड़ों के बीच ग्लेशियर पार्क में घुमा लाईं।
जो लोग हमारे साथ खड़े रहे
उस साल हम अकेले नहीं पड़े। क़दम-क़दम पर हमारे साथ खड़े रहनेवाले लोग थे।
सारा ने हर बात में मुझसे सच कहा। दया से कहा। कठिन बातों को नरम किए बिना कहा। मुझे जो करना चाहिए, वह कहा।
जिस साल मैं भारत में इलाज करा रहा था, चिनूक में सारा के परिवार ने उन्हें और बच्चों को अपने घर में रख लिया। मेरे माता-पिता का घर मेरे लिए हमेशा खुला रहा। पिताजी और माँ ने मुझे प्रार्थनाओं में उठाया। मैं घर लौटूँ तो बता सकें, इसलिए माँ प्रभु से वादे सुनती रहीं। दोस्तों ने हमारे लिए प्रार्थना की, हमें सँभाला। कुछ ने तो हमें आराम करने और उबरने के लिए समुद्र के किनारे कुछ हफ़्तों के लिए एक घर किराए पर ले दिया।
आगे के दौर का दरवाज़ा खोलनेवाला परिचय विनयार्ड नाम के कलीसियाओं के परिवार से आया। कैलिफ़ोर्निया में माइक की कलीसिया में, हफ़्तों तक, मैं आख़िरी पंक्ति में बैठा रहा। किसी से बात नहीं की। उन्होंने मुझे देख लिया। बाद में मुझसे कहा — देख रहा था, और हैरानी हुई कि तुम कुछ माँगने आए ही नहीं। "भारत के सेवक आम तौर पर आकर सेवकाई के परिचयों के लिए पीछे पड़ जाते हैं। यह आदमी चर्च आ रहा है। मुझसे बात करने तक नहीं आ रहा।" बहुत समय बाद, मुझे सेवकाई के अगुवे के रूप में नहीं, एक आदमी के रूप में देखनेवाले वे पहले व्यक्ति थे।
वही दोस्ती आगे चलकर सेवकाई का रास्ता बनी। प्रभु ने जो विश्वव्यापी सेवकाई के बुज़ुर्ग हमारे पास भेजे, उनमें से एक रैंडी क्लार्क आकर हमारी टीमों के साथ प्रार्थना करते रहे। परमेश्वर ने आगे हमारे लिए जो तैयार किया था, उसमें उन्होंने हमें आगे बुलाया।
दो लड़ाइयाँ
वह सितंबर दो तरह की लड़ाइयाँ एक साथ लेकर आया।
बाहरी लड़ाई — अपने ही ज़िले में फुसफुसाहटें, "जो हुआ उसी के लायक़ था" जैसे इल्ज़ाम। असल में सितंबर 2003 से बरसों पहले से किसी न किसी रूप में यह सुनता आ रहा था। हमारे इलाक़े के कुछ पारंपरिक पास्टर और मिशन के बड़े लोग मेरी पीठ पीछे बातें करते आए थे। कि हम ग़लत लोगों को नियुक्त कर रहे हैं। कि रोज़ की मज़दूरी करनेवाले साधारण लोगों को कलीसिया स्थापित करने भेज रहे हैं। यही बात लिखकर उन्होंने मेरे सहयोगियों को चिट्ठियाँ भी भेजीं।
भीतरी लड़ाई — वह बेचैनी की दवा, न होनेवाली चीज़ों का दिखना, सहायक को डरा देनेवाली बातें, होश खोए हुए हफ़्ते। यह उस महीने शुरू नहीं हुई। मैंने यह काम शुरू ही मज़बूत दिल से नहीं किया था। बीस साल की उम्र में एक रेल में परमेश्वर के दिए दर्शन के साथ, और बीमारियों में बीते बचपन से चिपके रह गए डरों के साथ शुरू किया था। काम ने उसके ऊपर नई बेचैनियाँ पैदा कीं। जिन साधारण लोगों को मैंने ख़ुद शिष्य बनाया, उन्हीं के साथ एक पूरे राज्य के हर गाँव तक पहुँचने का सेवा-बोझ — उसने नींद उड़ा देनेवाली ऐसी रातें दीं जिन्हें बयान नहीं कर सकता। चोरों का डर, हमलों का डर, काम नाकाम हो जाने का डर।
भीतर से आनेवाली लड़ाई यही होती है।
ये दोनों सितंबर 2003 से बरसों पहले से साथ-साथ चलती रहीं। उसके बाद भी बरसों चलती रहीं।
उन्हीं दो लड़ाइयों के बीच काम बढ़ता भी गया। सैकड़ों कलीसियाएँ स्थापित हो रही थीं। हज़ारों शिष्य बन रहे थे। प्रभु जो बनाने को कह चुका था, वह बनाता ही रहा। और उसी समय उन दो लड़ाइयों को चलते रहने की इजाज़त भी देता रहा।
मैं इस विश्वास तक आया — ये दोनों लड़ाइयाँ क़ीमत का ही हिस्सा हैं। हममें से बहुतों को न बताई गई क़ीमत यही है। बहुत-से मूवमेंट अगुवों को पहला क़दम उठाने से ही रोक देती है यही। जिस-जिस मूवमेंट अगुवे ने शुरू किया, उसने ये दोनों क़ीमतें चुकाईं। जिन्होंने शुरू नहीं किया, वे आम तौर पर इन दोनों में से किसी एक से डर गए थे।
आप भी दोनों चुकाएँगे। यह जानते हुए ही भीतर आइए, यही मेरी चाह है।
फ़सल के वर्ष
दिसंबर 2004 में, जिस तट पर हम काम कर रहे थे उसे सुनामी ने डुबो देने के बाद, हम साथ मिलकर भारत लौट आए।
उसके बाद के पाँच साल मेरी सेवकाई के जीवन के सबसे फलवंत साल रहे। पास्टरों के बड़े सम्मेलन, हज़ारों की सभाएँ, जिसे खड़ा करना चाहते थे वह आराधना का स्कूल, साराज़ कवनेंट होम्स — सब उसी दौर में शुरू हुए। योजना एक ज़िले से दूसरे ज़िले आगे बढ़ती ही रही।
आज भारत में इस पुस्तक को पढ़नेवाले बहुत-से शिष्य उन्हीं वर्षों में जन्मे।
17 सितंबर 2003 हमारा अंत नहीं बना। जंगल सच था, पर वही आख़िरी बात नहीं बना। प्रभु हमें बाहर ले आया। जले के वार्ड और उसके बाद आनेवाली क़ीमत के बीच के वर्षों को उसने हमारे जीवन के सबसे फलवंत काम में लगा दिया। जिस दिन मैं अस्पताल के कंप्यूटर कमरे में "हेपेटाइटिस सी" ढूँढ़कर ढह गया था, उस दिन मैंने बिलकुल नहीं सोचा था कि यह आएगा।
क़ीमत वह थी। उसके बाद आई आशीष यह है। एक ही दोपहर में हम ढह गए। उबरने में साल लगे। और उसके पीछे आई फ़सल में भी साल ही लगे।
एक ओर सेवकाई बहुत अच्छी चल रही थी, पर उसी समय क़ीमत फिर आई। इस बार मेरी पत्नी पर आई।
मेरी पत्नी की बीमारी
दुनिया में जिससे मैं सबसे ज़्यादा प्रेम करता हूँ, उससे आज्ञा-पालन ने क्या क़ीमत ली — यह बताना है।
2014 और 2015 में, सेवकाई चलते उन वर्षों में, मेरी पत्नी लंबे समय तक बुरी तरह बीमार रहीं। एक बार नौ दिन अस्पताल में रहीं। उन्हें लगा कि वे मर जाएँगी। मैं भी डर गया था। उस दौर के छोड़े हुए निशान वे आज भी उठाए हुए हैं।
इस पुस्तक में मैं यह नाटक नहीं करूँगा कि हमारा बाक़ी सारा जीवन बहुत ठीक-ठाक चला। क्योंकि चला ही नहीं! हमारे वैवाहिक जीवन में ऐसे दौर भी रहे जब मैंने अपनी पत्नी का बोझ हल्का नहीं किया। और जो दौर उन्होंने उठाए, वे मेरे लिए भी आसान नहीं बीते।
तीसरे मार्ग की क़ीमत में यह भी है — एक ऐसी गृहस्थी जिसे दोनों के थक जाने पर, और दोनों में से किसी एक के बरसों बीमार रहने पर भी, साथ चलना सीखना पड़ा।
आप इस रास्ते पर चलेंगे तो आपका वैवाहिक बंधन भी परखा जाएगा। हम आज भी यहीं हैं, और आगे भी रहेंगे। पर हम टिके हैं तो सिर्फ़ परमेश्वर की कृपा से।
बच्चे, अपने-अपने घावों के साथ
हमारे बच्चों में से हर एक ने यह क़ीमत अपने-अपने रूप में चुकाई। हर एक का अपना रूप। वे ब्यौरे उनके हैं, मेरे नहीं।
क़ीमत सिर्फ़ वह जलना नहीं थी। भारत में किराए के उस छोटे फ़्लैट में जब मैं था, उन दिनों मेरी देखभाल हमारी सेवकाई के भाई राजू ने पास रहकर की। उसी समय सारा मोंटाना में बच्चों के साथ अकेली थीं। सिमोना सात साल की। घर पर ही पढ़ाई। शायना दो साल की। जले के इलाज में। अमीरा दूध पीती बच्ची। अमीरा को मैंने क़रीब एक साल नहीं देखा। जाते समय वह नन्ही थी। मैं दोबारा मिला तो वह चल रही थी। उस पूरे समय सारा ने मेरे बिना ही बच्चों को उठाया। वे अब बड़ी हो गई हैं। वहाँ न होने के लिए उन्होंने मुझे क्षमा कर दिया होगा, यही आशा है।
हमारे परिवार ने जो कठिनाइयाँ झेलीं, क्या वे इसके लायक़ थीं — यह हमने उनसे पूछा। कभी-कभी वे ऐसे बोलती हैं जैसे हाँ, लायक़ थीं। पर यह भी मानती हैं कि कुछ दौर बहुत कठिन थे। और चाहती हैं कि उनके अपने बच्चों की ज़िंदगी इतनी दबाववाली न हो।
तीसरे मार्ग पर चलनेवाले जो क़ीमत चुकाते हैं, वह उनके साथ उनके बच्चे भी चुकाते हैं। आप ऐसे माता या पिता हैं जो इसे सचमुच अपनाने की सोच रहे हैं, तो आँखें खोलकर अपनाइए। आपके बच्चे अपनी क़ीमत में से होकर गुज़रेंगे।
छँटाई
यीशु की कही बात याद कीजिए — "मैं सच्ची दाखलता हूँ और मेरा पिता किसान है। जो डाली मुझमें है और नहीं फलती, उसे वह काट डालता है; और जो फलती है, उसे वह छाँटता है ताकि और फले" (यूहन्ना 15:1-2)। फलनेवाली डाली को किसान छाँटकर साफ़ करता है, दंड देने के लिए नहीं, और ज़्यादा फल के लिए। उसी काम को मैं छँटाई कह रहा हूँ।
बरसों तक कितने ही लोग मेरे साथ रहे। ऐसे लोग जिनके बारे में लगता था कि जीवन भर मेरे साथ ही रहेंगे। सब नहीं रह गए। छँटाई के दौर कितनी ही बार आए। इतनी बार आए कि असहज कर दें।
आपने भी इसका कोई न कोई रूप देखा ही होगा — बात करना कम कर देनेवाला रिश्तेदार, आपका जीवन बदलना शुरू होते ही दूर हट जानेवाला दोस्त।
मेरी छँटाई के दौरों ने बहुत दुख दिया। जिन लोगों को मैंने खड़ा किया और जिनके साथ बरसों चला, वे चले गए। कुछ ख़ाली हाथ भी नहीं गए। एक दौर ऐसे ख़त्म हुआ — जिस काम में मैंने बरसों उँडेले थे, उस पर एक दरवाज़ा बंद हो गया। चीज़ों को देखने का हमारा नज़रिया अलग हो गया। क्यों — यह पूछने कोई मेरे सामने बैठे, उससे पहले ही वह बंद हो गया। हर अंत मेरे प्रेम किए हुए लोगों को, और मेरे बनाए काम के हिस्सों को साथ ले गया। मैंने शुरू से शुरू किया।
उस हर अंत को प्रभु ने किसमें इस्तेमाल किया, पता है? मुझे यह दिखाने में कि मुझमें क्या बदलना है। अगला दौर शुरू होने से पहले जो छँटना ज़रूरी था — असुरक्षा, डर, घमंड — वह उसने मेरे भीतर खोलकर रख दिया। हर छँटाई में मैं यह मानकर गया कि "समस्या दूसरे की है"। और हर छँटाई में से अपनी ही उस सूची के साथ बाहर आया जिसे प्रभु के सामने रखना था।
दुख, ठुकराया जाना, और अपमान जैसा लगने वाली बेइज़्ज़ती — ये मेरे साथ आगे नहीं चलतीं। इन्हें मैं प्रभु के पास ही ले जाता रहता हूँ। कुछ दौरों में दिन में एक से ज़्यादा बार ले जाता हूँ। अपने शरीर के स्वभाव को भी वैसे ही ले जाता रहता हूँ। छँटाई ने मुझसे बहुत क़ीमत ली। पर उसने मुझमें से जो घमंड काटा, उससे कम ही ली।
मैंने यह देखा है — प्रभु नुक़सानों को बेकार नहीं जाने देता। वह जान-बूझकर ही छाँटता है। छाँटते हुए हमारे साथ शोक भी करता है। जो चला गया उसे वापस नहीं लाता। फिर भी अगला दौर देता है। उन अंतों में से सबसे दुखदाई अंत के दो साल के भीतर, हमारी बेटी सिमोना हमारे परिवार के काम की अगुवाई में उतर आई। रिले की छड़ी उसके हाथ में चली गई।
प्रभु ने दरवाज़े बंद किए। खिड़कियाँ खोलने के लिए ही बंद किए। पर उस बंद होने ने महीनों का शोक और उलझन ली। और वह खुलना तब आया जब शोक को आख़िर तक जी लिया गया।
ऊपर कही उस यूहन्ना 15 की बात के अनुसार, पिता दाखलता को फलवंत छँटाई से ही बनाता है। बरसों वह बात पढ़ता आया। पर वह मेरी देह में सच इन्हीं दौरों में हुई। तीसरा मार्ग जिएँगे तो छँटाई होगी। वह आपसे लोग छीनेगी। पर उस पार आनेवाली नई कोंपल, आपके पास पहले जो था उससे ज़्यादा है। नुक़सान और नई कोंपल — दोनों एक साथ सच हैं।
आप इस रास्ते पर चलें, तो इसकी आस रखते हुए ही चलिए।
वह जंगल अभी ख़त्म नहीं हुआ
बेचैनी वहीं रुक नहीं गई। 2017 में, सेवकाई छोड़कर कंप्यूटर का क्षेत्र सीख लूँ — यह सोचते दौर में वह लौट आई। वह दौर कुछ साल बाद, एक अतिथि गृह में डेव की दी हुई मदद से ख़त्म हुआ। (उसके बारे में आगे के हिस्से में बताऊँगा।)
जिन दौरों में मैं अब भी भीतर हूँ, उनमें भी वह लौटती रही है। इसी साल अप्रैल में भी, हमारी दोस्त आंद्रिया की लिखी बेचैनी पर जय नाम की पुस्तक पर काम कर रहा हूँ। सोचनेवाले दिमाग़ से पैदा होनेवाली बेचैनी और डर पैदा करनेवाले भीतरी हिस्से से आनेवाली बेचैनी का फ़र्क़ सीख रहा हूँ। मेरी ज़्यादातर पहली क़िस्म की है — इस विश्वास तक आया हूँ।
उस पुस्तक के पहले ही पन्नों ने यशायाह 41:10 मेरे सामने रख दिया — "मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ; इधर-उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ; मैं तुझे दृढ़ करूँगा और तेरी सहायता करूँगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सँभाले रहूँगा।" बड़े होने के बाद इतने बरसों से मेरा वचन यही रहा है। सातवाँ अध्याय लिखनेवाला आदमी, सातवाँ अध्याय जो कह रहा है उसी के भीतर अब भी है — प्रभु ने दया से यही कहा। क़ीमत चुकना बंद नहीं हुआ। सहायता भी बंद नहीं हुई।
पश्चिमी देशों का जंगल
यह लिखते समय इस रास्ते पर चलनेवाला मैं अकेला नहीं हूँ। मेरे सबसे क़रीबी पश्चिमी मूवमेंट अगुवे अपने-अपने जंगल में से गुज़र रहे हैं।
हर एक अलग-अलग मुझसे एक ही बात कहता है — भारत में, और अफ़्रीका के कुछ इलाक़ों में जो बढ़ोतरी आम हो चुकी है, वह पश्चिमी देशों में उनकी उम्मीद जितनी अभी नहीं आई। पश्चिम में ग्रुप शुरू होते हैं। बहुतों में अच्छा फल भी आता है। पर बहुत-से टिकते नहीं। ज़्यादातर दूसरी पीढ़ी पर ही रुक जाते हैं। मेरे आत्मिक मित्र इस बारे में ईमानदार ही रहे हैं। "क्यों, प्रभु?" — यह वे उसी से पूछ रहे हैं।
यही वह गिनतियों वाली बात है जो पहले कही थी। जीवन-शैली वहाँ पहले से है। गिनतियाँ ही अभी नहीं पहुँचीं। हर मूवमेंट के पहले साल ऐसे ही दिखे हैं। पहले जीवन-शैली चलती है। गिनतियाँ पीछे से आती हैं।
सोचनेवाला पाठक यहाँ एक जायज़ सवाल पूछेगा। उसका जवाब मैं किसी नारे से नहीं देना चाहता। अगर चार आदतें सचमुच मूवमेंट पैदा करती हैं, तो पूर्वी देशों में जीवन भर देखी वह बढ़ोतरी मैंने पश्चिम में अब तक क्यों नहीं देखी?
चार आदतें किसी एक संस्कृति का तरीक़ा नहीं हैं। वे सुसमाचार का अपना ढंग हैं। एक-दूसरे से बिलकुल मेल न खाती जातियों, भाषाओं और सदियों में से होकर उन्हें चलते मैंने अपनी आँखों से देखा है। पश्चिमी देश सुसमाचार से परे नहीं हैं। वहाँ यह अभी शुरुआती दिनों में ही है, बस इतना।
पहले दो मार्गों को भी वहाँ फल देने में पीढ़ियाँ लगीं। सामान्य शिष्यों का मार्ग उन दोनों से छोटा है।
अपने ही समय के हिसाब पर भरोसा न करना भी मैंने सीखा है। अपने ही क्षेत्र के बारे में प्रभु से मैं बीस साल बहस करता रहा। जिस पल बहस करना छोड़ा, वह बढ़ गया।
इसका मतलब यह नहीं कि यह जाँच से परे है। असली जाँच यह नहीं कि ग्रुपों की क़तार कितनी पीढ़ियाँ गई। दूसरी पीढ़ी पर रुक भी जाए तो चलेगा। बस इतना हो कि सामान्य विश्वासी नए-नए ग्रुप शुरू करते हुए, और ज़्यादा लोगों तक, और ज़्यादा घरों तक पहुँचते हुए, एक पूरा इलाक़ा भरने तक जाते रहें। जो फल मैं देख रहा हूँ, वह यही है।
एक पीढ़ी बीत जाने पर भी पश्चिम में यह न हो तो? सामान्य विश्वासी एक के बाद एक ग्रुप शुरू करके अपने आस-पास वालों तक सुसमाचार न पहुँचाएँ तो? तब उस मिट्टी के बारे में मैं ग़लत निकला। और ग़लत निकला, यह कह भी दूँगा। मुझे नहीं लगता कि हम यही देख रहे हैं। मुझे विश्वास है कि हम पहले साल देख रहे हैं। फिर भी मेरी बात पर नहीं, फल पर ही मुझे कसने को कहता हूँ।
पश्चिम का यह जंगल-काल कोई कल्पना की बात नहीं। उसमें आँखों के सामने दिखनेवाली असली कठिनाइयाँ हैं। एक उदाहरण देखिए।
ज़ीरो अवर चलानेवाला कोरी बरसों से यह काम कर रहा है — किशोरों को गर्मियों के कैंपों से घर भेजना ताकि वे डिस्कवरी ग्रुप शुरू करें। जहाँ वह खड़ा है वहाँ से दिखनेवाली तीन क़ीमतें उसने एक-एक करके बताईं।
पहली — जिन चर्चों और माता-पिता के पास उसकी टीम साझेदारी के लिए जाती है, उनकी आलोचना: "यह बेक़ाबू काम है, यह चलेगा नहीं।" दूसरी — जो थोड़ा-सा फल आता है, उसके लिए उसकी टीम को बहुत सारे विद्यार्थियों के साथ चलना पड़ता है। तीसरी — साथ काम करनेवाले, स्वयंसेवक और विद्यार्थी कॉलेज के लिए दूसरे राज्यों में चले जाते हैं, और ऐसी सेवकाइयों में लग जाते हैं जो शिष्य बनाने को महत्त्व नहीं देतीं।
पश्चिम की जितनी कैंप-सेवकाइयाँ मैं जानता हूँ, उनमें से ज़्यादातर से लंबे समय से कोरी इस काम में है। जिन किशोरों को वह घर भेजता है, उनके लिए वह एक पिता है। वह जो क़ीमत चुका रहा है, वह ऐसी दिखती है — ऐसे देश में मूवमेंट के लिए युवा-सेवकाई चलाना, जहाँ आस-पास की सेवकाई की दुनिया को अभी यही नहीं मालूम कि मूवमेंट का काम होता क्या है।
पश्चिम में यह जंगल-काल जैसा दिखता है, वह भारत में मेरे जंगल-काल के दिखने से अलग है। पश्चिमी अगुवों को शायद डेंगू या हेपेटाइटिस सी न हो। गाँव की फुसफुसाहटें नहीं हैं। "ग़लत लोगों को कलीसिया स्थापित करनेवाला बना रहे हो" — यह इल्ज़ाम भी नहीं है। उसकी जगह एक और बोझ है — एक ऐसी दुनिया के ढाँचे का बोझ जो अभी पहचान ही नहीं पाती कि मूवमेंट का काम कैसा दिखता है। पीछे खींचनेवाली कलीसिया की पंचायत। कोई ग्रुप पहली पीढ़ी से आगे न जाने के कारण सूखे-से बीते अठारह महीने। दो साल कोशिश करके बीज को मरा हुआ-सा देखता एक पास्टर।
वे क़ीमतें मेरी क़ीमतों से रत्ती भर भी कम सच्ची नहीं हैं। बस रूप अलग है।
आपके जीवन में यह कैसा दिखेगा?
अब तक जो क़ीमतें दिखाईं, वे मेरी हैं और मेरे सबसे क़रीबी दोस्तों की। ये उन लोगों की क़ीमतें हैं जो चार आदतों को अपने जीवन के उठा सकने भर बड़े स्तर तक ले गए। हो सकता है आप मूवमेंट अगुवे न हों। इस पुस्तक को पढ़नेवालों में से बहुत-से नहीं हैं।
आप अपनी क़ीमतें चुकाएँगे।
वे आपके जीवन के नाप की ही होंगी — आपके डिस्कवरी ग्रुप शुरू करते ही आपसे दूर हट जानेवाला एक दोस्त। बहुत व्यस्त रहनेवाला पति या पत्नी, या परिवार के डिस्कवरी ग्रुप को लेकर आपके उत्साह में शामिल न होनेवाले बच्चे। या फिर वह अकेलापन, जिसमें किसी और के शुरू करने से पहले एक-दो साल आप अकेले ही यह करते रहते हैं।
हममें से बहुतों को यह सच किसी ने बताया ही नहीं। हमारे समय की शिष्यत्व की पुस्तकों ने अक्सर बिना किसी चेतावनी के बढ़ोतरी का वादा किया। बढ़ोतरी सच है। क़ीमत भी सच है।
चार आदतें लेकर, प्रभु ने आपके जीवन में जो लोग रखे हैं उनके साथ चलना शुरू करेंगे, तो आपको असहज लगेगा। जिन लोगों की आप इज़्ज़त करते हैं, उन्हें आपसे असहज लगेगा। आपकी अपनी बेचैनियाँ आपकी याद से भी ऊँची आवाज़ में चिल्लाएँगी। जिनसे आप सबसे ज़्यादा प्रेम करते हैं, उनके चेहरों पर वह क़ीमत दिखेगी। पर आप फल भी देखेंगे। फल सच है। वह एक पीढ़ी से आगे टिकता है। यह चाल आपसे क़ीमत लेगी। फिर भी उस क़ीमत का एक-एक पैसा उसके लायक़ है।
क़ीमत का मतलब जंगल ही है। यीशु जंगल के दौरों में से बार-बार गुज़रा। सेवकाई से पहले सिर्फ़ एक बार नहीं। आप भी अपने जंगलों में से वैसे ही गुज़रेंगे। वह आपको जंगल के चारों ओर घुमाकर नहीं ले जाएगा। उसी में से होकर चलाएगा। और चलाते हुए, अकेला नहीं छोड़ेगा।
मनन के लिए
दुख कभी-कभी इस रास्ते का हिस्सा ही होता है। यह इसका चिह्न नहीं कि कुछ ग़लत हो गया। यह बात, आप जिस कठिन दौर में अभी हैं, उसे कैसे नए ढंग से दिखा रही है?
क्या क़ीमत का डर आपको एक क़दम आगे बढ़ने से रोक रहा है? कौन-सा डर?
आपकी अपनी क़ीमत ऐसी हो सकती है — दूर हटता दोस्त, व्यस्त जीवनसाथी, एक-दो साल की अकेली चाल। इनमें से किससे आपको सबसे ज़्यादा डर लगता है? उसे ईमानदारी से प्रभु के सामने रख सकेंगे?
आठवाँ अध्याय22 मिनट
प्रभु कैसे पालता है?
परमेश्वर के हाथ के पालन में मैं बहुत समय से जीता आया हूँ। चौथे अध्याय में प्रभु ने मुझसे जो बातें कहीं, उनमें से एक याद है न — "मैं पालूँगा।" वह बात मेरे जीवन में कैसे सच होती चली आई, अब यही आपको बताना है।
सिंगापुर की दादी के भेजे दो हज़ार डॉलर
1996 में हम बिना पैसे के ओरल रॉबर्ट्स यूनिवर्सिटी पहुँचे — यह पाँचवें अध्याय में बताया था। तब एक बात छोड़ दी थी। सिमोना के जन्म से पहले, अस्पताल को पहले ही इतनी बड़ी रक़म जमा करनी होगी जो हम चुका ही नहीं सकते थे — उस घड़ी की बात अब बताता हूँ।
हम पहुँचे तब मेरी पत्नी पाँच महीने की गर्भवती थीं। तुलसा शहर हमारे लिए नया था। बिना किसी सामान के एक कमरे के छोटे फ़्लैट में रहते थे। मैं यूनिवर्सिटी के प्रेयर टावर में और लाइब्रेरी में काम करता था। सारा एक चर्च में बच्चों की देखभाल का काम करती थीं। जिस अस्पताल में प्रसव होना था, वहाँ अपना हिस्सा पहले ही जमा करना होगा — यह गर्भ के आख़िरी दिनों तक हमें मालूम ही नहीं था। बैंक खाता ख़ाली था। दिल धड़क उठा। उस हालत में विश्वास बनाए रखना हमारे लिए कठिन ही था।
स्कूल के पहले ही हफ़्तों में सारा की जेनिस नाम की एक युवती से अच्छी दोस्ती हो गई। जेनिस और उनके पति क्रिस, दोनों सिंगापुर से आए थे। कुछ महीनों बाद जेनिस के पति क्रिस को उनकी दादी ने एक बड़ी रक़म उपहार में दी। जो मिला था उसका एक हिस्सा धन्यवाद की भेंट के रूप में परमेश्वर को देने का उस जोड़े ने निश्चय किया। जेनिस ने प्रार्थना की तो उन्हें लगा कि प्रभु उसे मेरी पत्नी को देने की अगुवाई कर रहा है। हमारी ज़रूरत उन्हें मालूम नहीं थी। परमेश्वर को मालूम थी।
जो रक़म आई — दो हज़ार डॉलर। हमें ठीक उतनी ही चाहिए थी।
जेनिस ने वह भेंट सारा को दे दी, उसके बाद उनके पति क्रिस को अपना चमत्कार मिला। अगले ही दिन स्कूल ने उन्हें बताया कि जीमैट नाम की परीक्षा में उनके अंकों पर उन्हें दो हज़ार डॉलर की एकमुश्त छात्रवृत्ति दी जा रही है।
वह बात मैं तब से कितनी ही बार सुनाता आया हूँ। वे दादी हमसे कभी मिलीं ही नहीं। जिनकी अभी-अभी शादी हुई थी, उन जेनिस और क्रिस ने, अपने न सोचे हुए उपहार के पहले फल हमें दे दिए। पहले बच्चे की बाट जोहता, पैसे की तंगी में फँसा वह युवा सेमिनरी जोड़ा हम ही थे। पति भारतीय, पत्नी अमेरिकी। वह मदद हमारे लिए बहुत बड़ी थी। जेनिस और क्रिस के आज्ञा मानने से परमेश्वर ने हमें और उन्हें, दोनों को दिखा दिया कि वह हम सबकी देखभाल कर रहा है।
वह चेक जिसने कहा, "काम मत रोक"
यह 2017 में शुरू हुआ। उस साल हमारे पिताजी अपने क़स्बे में चल बसे। हम पैसे की गहरी तंगी में थे। सेवकाई छोड़कर, कंप्यूटर का क्षेत्र सीखकर नौकरी ढूँढ़ लूँ — यह सोचना शुरू कर दिया।
मन खोलकर बाँट सकूँ, ऐसी कोई संगति मेरे पास नहीं थी। जिस कलीसिया में हम तब जाते थे, वहाँ आराधना मुझे बहुत भाती थी, पर वहाँ की शिक्षा हमें रास नहीं आती थी। हमारे मिशन काम का रोज़ का बोझ मेरे उठा सकने से भारी हो गया था। मैं बुरी तरह थक चुका था।
2021 आते-आते, जिस साल मैंने पचास में क़दम रखा, मैंने सचमुच काम बंद कर देने की ठान ली। कुछ ही महीने पहले माँ भी चली गई थीं, तो थकान और शोक एक साथ मुझ पर आ पड़े। ठीक उसी समय हमारे प्रिय दोस्त डेव बैरी ने अपनी पत्नी जॉसलिन के साथ कैनसस सिटी आकर हमसे मिलना चाहा। बास्किन रॉबिन्स नाम की आइसक्रीम की दुकान में उनसे मिला। एक घंटा बैठे। हम जो काम कर रहे हैं वह क्या है, और उसे उठाने के लिए कितनी क़ीमत चुका रहे हैं — यह बताया। डेव से पैसे कुछ नहीं माँगे। सिर्फ़ काम के बारे में बताया।
वे जिस गेस्ट हाउस में ठहरे थे, वहाँ लौट गए। अगली सुबह फ़ोन करके एक बार आने को कहा। पहुँचते ही मेरे हाथ में एक चेक रख दिया।
उस चेक की रक़म मेरे लिए बहुत मायने रखती थी। क्योंकि उस संख्या में ग्यारह था। जब से मुझे याद है, ग्यारह की संख्या मेरे जीवन पर प्रभु के किए हुए पुष्टि के हस्ताक्षर जैसी रही है। "मैं तुझे देख रहा हूँ। मैं यहीं हूँ। मैं पाल रहा हूँ" — यह कहने का उसका ढंग है। डेव को इसका कुछ पता नहीं था। प्रभु ने उन्हें जो संख्या बताई, उन्होंने बस वही लिख दी।
उस गेस्ट हाउस की खाने की मेज़ पर बैठकर मैं रो पड़ा।
उस चेक के ज़रिए प्रभु मुझसे एक ही वाक्य कह रहा था — "तेरा पालनेवाला मैं ही हूँ। मैं सँभालूँगा। काम मत रोक।"
मैंने काम नहीं रोका।
जहाँ मेरा अपना रास्ता ख़त्म हो चुका था, वहाँ प्रभु का खोला हुआ दरवाज़ा वह चेक था। पर असली उपहार वह संख्या नहीं, वह अगुवाई थी। वह मेरे क़दम जमाते हुए कह रहा था कि चलना मत छोड़, और जो काम मैंने तेरे हाथों में रखा है, उसे करता रह।
4 दिसंबर 2022
भारत में प्रभु जो कर रहा है, वह बाँटने के लिए एक कलीसिया ने मुझे बुलाया। कलीसिया भरने से पहले ही मैं जाकर बैठ गया। तभी, जिनसे मैं पहले कभी नहीं मिला था, ऐसी एक आत्मिक बहन हॉल के पीछे से चलकर मेरे पास आईं। मैं कौन हूँ, वहाँ क्यों आया हूँ — उन्हें नहीं मालूम था। फिर भी उन्होंने कहा कि उन्होंने आत्मा में देखा है कि प्रभु मेरा पालन करने जा रहा है, और यह बात मुझसे कहनी ही थी, ऐसा उन्हें लगा। मैंने मुस्कुराकर उनका धन्यवाद किया, और यह भी कहा कि मैं आया ही ठीक इसीलिए हूँ।
उनकी बातों ने मेरे भीतर एक बहुत पुराना वादा जगा दिया। बरसों पहले, तुलसा के उस छोटे फ़्लैट के दिनों में, प्रभु के दिए दर्शन के आकार से डरता वह नौजवान मैं ही था। उस दर्शन के लिए पालन वह ख़ुद देगा — यह वादा उसने तभी मुझसे किया था। वह वादा तब से मेरे भीतर गूँजता ही रहा। और अब वही बात, एक अनजान व्यक्ति के मुँह से फिर मेरे कानों तक आ गई।
पास्टर ने जब मुझे ऊपर बुलाया, तो हम जो दर्शन उठाए हैं, वह बाँटा। उस समय से और बीस साल में, यानी 2040 तक, उस दर्शन तक कैसे पहुँचेंगे — यह बताया। मैं बोल रहा था, तब कलीसिया में पैट्रिशिया नाम की एक और बहन बैठकर प्रार्थना कर रही थीं। उनसे भी मैं पहले कभी नहीं मिला था।
बाद में उन्होंने मुझे बताया — उन्होंने पूछा था, "प्रभु, क्या तू इसे और जल्दी कर सकता है? सात साल में कर सकता है?" तब उन्हें लगा जैसे उसने उनके दिल पर पाँच साल छाप दिए।
मैं मंच से नीचे उतरा ही था कि उन्होंने मेरे हाथ में पाँच सौ डॉलर का एक चेक रखा, और उसके साथ एक बात भी रखी। जिसमें बीस साल लगेंगे, ऐसा हमने सोचा था; उसे प्रभु पाँच साल में करेगा — यही वह बात थी। चेक की रक़म में भी पाँच ही था। उसमें प्रभु का कोई इरादा है क्या — यह तब से सोचता ही रहा हूँ।
उन दोनों के बारे में पास्टर से पूछा तो उन्होंने बताया कि दोनों ऐसी भरोसेमंद भविष्यद्वाणी की आवाज़ें हैं जिन्हें वे ध्यान से सुनते हैं। और यह भी कि पैट्रिशिया उस कलीसिया में भविष्यद्वाणी की सेवकाई की अगुवा हैं।
चेक पर तारीख़ थी — 4 दिसंबर। उन्हें मालूम नहीं था, पर 1991 से 4 दिसंबर मेरे जीवन में गहरी गड़ी हुई तारीख़ है। चौथे अध्याय में बताया वही दिन। पास्टर रॉबर्ट स्मिथ और उनके साथ प्रार्थना करनेवालों की एक छोटी मंडली ने मुझ पर हाथ रखकर, प्रार्थना करके इस बुलाहट में भेजा — वही दिन।
उस बात को लिखकर रख लिया और पकड़े रहा। हालाँकि सच कहूँ तो पाँच साल वाली बात पर मुझे तब ज़्यादा विश्वास नहीं था।
तब से प्रभु ने हमारी योजना से ज़्यादा ही किया है। बरसों से साथ रहे दोस्त और सहभागी वैसे ही खड़े रहे। नए भी आकर हाथ मिलाते गए। इससे सेवकाई एक राज्य से कितने ही राज्यों में फैल गई। 2040 तक लगेगा, यह जो सोचा था, वह वह कुछ ही वर्षों में करता आ रहा है। पैट्रिशिया की बात के पाँच साल दिसंबर 2027 में पूरे होते हैं। आज हम जहाँ खड़े हैं, वहाँ से देखें तो लगता है कि जैसा उन्हें लगा था, वैसा ही वह पाँच साल में कर सकता है। जब उन्होंने वह चेक मेरे हाथ में रखा, मुझे विश्वास नहीं हुआ था। पर वह आँखों के सामने पूरा हो रहा है।
यही प्रभु का पालन है।
टक्सन हवाई अड्डे पर आया वह फ़ोन
आपको बताई वह रेल याद है न। उसी रेल में प्रभु ने मुझसे लंबी उम्र का वादा किया और हेपेटाइटिस सी से चंगा करने की बात भी कही। वह बात वहाँ पूरी नहीं कही थी। बाक़ी अब कहता हूँ।
बीमारी एक बार लौट आने के बाद, भारत में दूसरी बार और लंबा, और कठिन इलाज हुआ। उस इलाज से वायरस फिर दिखना बंद हो गया। पर वह लौटकर नहीं आएगा, यह कह सकने के लिए दो साल बाद फिर जाँच करानी थी।
उस बीच माँ प्रार्थना करती रहीं। उनका बेटा ठीक हो जाएगा — यह प्रभु ने उनसे कहा, ऐसा उन्होंने अपनी डायरी में लिखा। वह मैंने बाद में पढ़ा।
दो साल की अवधि आने पर मैं पेट और यकृत के रोगों के विशेषज्ञ के पास गया। ख़ून लेकर बताया कि नतीजे कुछ दिनों में आएँगे।
उन्हीं दिनों मैं टक्सन नाम के शहर में, पास्टर बॉब की कलीसिया में बोलने गया हुआ था। बॉब वह दोस्त हैं जो हमारा काम देखने भारत आए थे। घर लौटने के जहाज़ के लिए टक्सन हवाई अड्डे के गेट पर बैठा था, तभी डॉक्टरों के दफ़्तर से फ़ोन आया।
फ़ोन पर आवाज़ ने कहा — "वायरस नहीं मिला।"
मैंने अपनी पत्नी को फ़ोन किया। रोते हुए ही किया।
तब से हर साल जाँच कराता आ रहा हूँ। बीस साल बीत गए। आज तक वायरस नहीं मिला।
2000 के दशक की शुरुआत में उस रेल में चंगा करने का वादा करनेवाली वही आवाज़ मुझसे उससे पहले भी बोली थी। अमेरिका आने के शुरुआती दिनों में चिनूक के एक फ़्लैट में एक बार, और उसके साल-दो साल बाद तुलसा में एक बार वह आवाज़ मुझसे बोली।
मेरे जीवन में प्रभु ने मुझसे जितनी बार बात की, वे अनगिनत हैं। उनमें से कुछ को इन अध्यायों में आपसे बाँटता आया हूँ। जो बाँटीं, वे सब बहुत छोटी बातें ही थीं। एक वाक्य, या कुछ शब्द। मामूली जगहों में एक मामूली आदमी से कही गई बातें। पर हर वादा सच हुआ। कुछ कुछ ही हफ़्तों में पूरे हुए, कुछ दशकों के बाद सच हुए। जैसे भी हो, परमेश्वर भरोसे के लायक़ ही निकला।
मेरे जीवन में पालन ऐसा दिखा।
वह चेक जिसने कमी को ठीक-ठीक ढँक दिया
जून 2026 में हमारा पूरा परिवार, कोलोराडो राज्य के हॉली नाम के छोटे क़स्बे में, मेरे मामा की नातिन की शादी में शामिल होने गाड़ी से गया। इतवार सुबह उपदेश देने को वहाँ के पास्टर ने कहा। शनिवार रात तक प्रभु से मुझे कोई बात नहीं मिली। मनन करने और तैयारी करने का समय भी नहीं मिला। वैसे ही सो गया।
आधी रात, कंधे पर किसी के थपथपाने जैसा लगा। पत्नी होंगी, यह सोचकर उठकर देखा तो वे चैन से सो रही थीं। फिर लेट गया। दूसरी बार भी वैसा ही हुआ। फिर तीसरी बार भी। तीनों देह पर लगे असली स्पर्श ही थे।
वैसे ही लेटे-लेटे लगा जैसे प्रभु कह रहा हो। अमेरिका को देने के लिए उसके पास, हमारे परिवार के ज़रिए, एक ख़ास मक़सद है। उसी में वह हम सबको बुला रहा है। अब अमेरिका में बसे हमारे रिश्तेदारों में क़रीब-क़रीब सब, इस महाद्वीप पर कहीं न कहीं सुसमाचार पहुँचाते हुए पास्टर या मिशनरी के रूप में सेवा कर रहे हैं। शादी में उन सबको देखता रहा। पीढ़ियों से जिसे वह गढ़ता आया है, वह अब छूटकर बाहर आने वाला है — प्रभु यही कह रहा था।
इतवार का उपदेश अच्छा रहा। वह बात अमेरिका तक पहुँचने के बारे में ही थी।
घर लौटे तो हमारा बैंक खाता माइनस में चला गया था। एक अनचाहा चार्ज लग गया था। क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करना हम पहले ही छोड़ चुके थे। ऊपर से उस महीने की यात्राओं ने सोचे से ज़्यादा ख़र्च ला दिया था। कमी कितनी है, यह देखा। फिर, इतवार के उपदेश के लिए हॉली की कलीसिया के दिए चेक की ओर देखा।
वह क़रीब-क़रीब ठीक उतनी ही रक़म थी।
बात परमेश्वर ने ही दी थी। उसे सुनने के लिए मुझे नींद से जगाया भी उसी ने। हमारे परिवार के लिए अपने दर्शन का एक हिस्सा दिखाकर, उसी इतवार बैंक की कमी भी पूरी कर दी।
वह संगति जो परिवार बन गई
हमारे परिवार की चुकाई क़ीमत के जवाब में आया पालन किसी एक पल में नहीं आया। साल दर साल, हमारे चारों ओर धीरे-धीरे जमा होती एक संगति के रूप में आया।
हमें एक विश्वव्यापी गॉस्पेल मूवमेंट परिवार की ज़रूरत थी। प्रभु ने वह परिवार हमें दे दिया। उसके लिए हम कृतज्ञ हैं। महीने में एक बार मुझसे मिलकर मेरी ख़बर लेनेवाले एक बुज़ुर्ग मेरे पास हैं। मेरे जीवन में उनका काम एक ही है — मैं कैसा हूँ यह पूछना, सुनना, और मेरे लिए प्रार्थना करना।
मैं एक टीम का हिस्सा हूँ। कितने ही साल जैसे उठाया, वैसे अब अकेले बोझ नहीं उठाता। 2000 के दशक से ज़्यादा स्वस्थ जीवन-शैली अब हम अपनाते हैं। वह परिवार अपने अगुवों को स्वास्थ्य बीमा भी देता है। उस संगति के भीतर हमने कितनी ही तरह से सीखा है, बहुत बढ़े हैं।
सबसे कठिन दौरों में ऐसी ही संगति की हमें बहुत ज़रूरत थी। जलने के बाद के साल। वह बीमारी का पता चलना। वे अफ़वाहें। हमारे परिवार का अमेरिका लौटना पड़ना एक बड़ा बदलाव था। और भी कितने ही कठिन दौर। अब वह सहारा हमारे पास है। कैसे माँगूँ, यह भी मुझे मालूम नहीं था — ऐसा पालन है यह।
छोटी बातों में भी यह संगति मुझसे सच कहती है। बरसों तक मैं, रास्ता कितना ही तकलीफ़देह हो, समय कितने ही ख़राब हों, जो सबसे सस्ता हवाई टिकट मिलता वही ख़रीदता था। आख़िर उस संगति के एक दोस्त मार्क ने मुझसे साफ़ कह दिया। इस उम्र में ऐसा करना ठीक नहीं है, उसने कहा। रात ग्यारह बजे चलकर अगली सुबह नौ बजे कहीं उतरना अब मैं देखता नहीं रहूँगा — कुछ ऐसे कहा। उसने जो कहा वह सही ही था। अब मैं दिन की उड़ान ही लेता हूँ। हो सके तो सीधी उड़ान देखता हूँ। थका-हारा लड़खड़ाता हुआ नहीं, नींद पूरी करके, अगली सुबह काम लायक़ हालत में उतरता हूँ।
सातवें अध्याय में छँटाई के उन दौरों की बात कही थी न। उनमें सबसे दुखदायी नुक़सान होने के दो साल के भीतर ही, हमारी बेटी सिमोना ने ग्लोबल कवनेंट की एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर के रूप में ज़िम्मेदारी सँभाल ली। बरसों से वह हमारे साथ ही सेवा करती आ रही थी। अब उस ज़िम्मेदारी में उसका एक साल पूरा हो गया है। उसने इसकी योजना नहीं बनाई थी। उसी के शब्दों में — "मैं फ़ाइन आर्ट्स में मास्टर्स करना चाहती थी। पर अपने ही परिवार में, अपनी विरासत में परमेश्वर जो कर रहा है, उसे छोड़ नहीं पाई।"
डिग्री के आख़िर में उसने जो शोध किया, वह अलग-अलग संस्कृतियों के बीच पलनेवाले बच्चों की उस बीच की जगह को देखता है। मंज़िल तक पहुँचने तक हम जो अस्थायी तंबू खड़े करते हैं, और न पूरी तरह मंज़िल तक पहुँच पाने, न पूरी तरह अपना घर लगने की उस अजीब हालत के बारे में वह शोध कहता है।
अलग संस्कृतियों के बीच पलना उसके लिए क़ीमत भी बना और उपहार भी। वह और उसके भाई-बहन पूरे-पूरे भारत के हैं, और साथ ही पूरे-पूरे अमेरिकी। किसी एक ख़ाने में समा जानेवाले बच्चे नहीं हैं। उन्हीं दिनों उसकी बनाई कलाकृतियाँ — परदेस में परदेसी, छिपने की जगह, शरण — भीतर खींचनेवाली उस भावना को तभी नाम दे रही थीं।
ठीक वैसे ही छोटे तंबुओं में इकट्ठी होनेवाली कलीसियाओं के मूवमेंट को वह अपनी जवानी देने जा रही है — यह उसे तब मालूम नहीं था। मैंने उससे पूछा। उसने हाँ कही।
सेवकाई में लगे परिवार का बोझ छोटा नहीं होता। दर्शन बहुत बड़ा है। एक परिवार को विरासत में मिला एक बड़ा फ़सल का खेत है वह। इतने बड़े दर्शन के भीतर एक कलाकार की जगह कहाँ होगी — यह उसने सोचा। उसे जवाब नहीं मिला। कुछ समय वह सवाल अकेले ही उठाए घूमती रही।
फिर एक रात वह भारत के नक़्शे के सामने बैठी। ज़िलों की सारी सीमाएँ खींचकर, हर ज़िले का नाम लिखकर, जिन ज़िलों में हमारी सेवकाई चल रही थी उन्हें रंग दिया। तभी उसे वह दिखा। सेवकाई के खेत पर उतरता परमेश्वर की महिमा का वस्त्र! "पृथ्वी यहोवा की महिमा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है" — हबक्कूक भविष्यद्वक्ता के इसी वादे जैसा वह उसे दिखाई दिया।
उसके साथ आई भावना का उसके पास कोई और नाम नहीं था। परमेश्वर जो कर रहा है, उससे बाहर नहीं रह जाना है — यही आत्मिक तड़प थी। अपने ही परिवार में, अपनी ही विरासत में परमेश्वर जो कर रहा है, उसे वह छोड़ नहीं पाई।
यह दौर भारत के लिए है — यह उसकी समझ में आ गया। हर ज़िले में मूवमेंट की जीवन-शैली को जड़ पकड़ते देखना ही उसकी तड़प है। उसके लिए उसने अपने ही सपने, आगे की पढ़ाई को एक तरफ़ रख दिया। अभी के लिए ही रखा। आगे किसी दौर में, हाथों से कलाकृतियाँ बनाने के लिए परमेश्वर उसे फिर छोड़ देगा — यह उसने विश्वास किया। भारत के लिए परमेश्वर अपना वादा पूरा करेगा — पहली बार उसे इसका पक्का विश्वास हुआ। वह उनके साथ है, अपने ही बल पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं — यह उसने महसूस किया।
एक बार भी मुझे उसके काम को पीछे से जाँचना नहीं पड़ा। 21 मई 2026 को, पिन्तेकुस्त के हफ़्ते में, काम के अगले दौर पर — यानी उस हिस्से पर जो मैं नहीं लिखूँगा — उसने अपने हस्ताक्षर कर दिए। वह दौर कितना लंबा होगा, यह प्रभु पर ही छोड़ दिया। सिमोना दर्शनी, एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर। चौथी पीढ़ी की मूवमेंट अगुवा। छठी पीढ़ी की मसीह-अनुयायी। जो उसने मुझसे खो जाने दिया, वही प्रभु ने मेरे अपने घर के ज़रिए लौटा दिया। ओंगोल में शुरू हुआ वह काम उसके हाथों में आ गया।
हमारे बच्चों में से दो को अपना घर बसाते हम अब तक देख चुके हैं। पहले सिमोना ने, 2016 में, जोसाया से शादी की। जोसाया के माता-पिता पीटर और मर्सी भी मिशनरी हैं। उसके परदादा-परदादी उत्तर अमेरिका से आकर भारत में लंबी मिशन सेवा की विरासत छोड़ गए थे। उस शादी से, सुसमाचार उठाए दो और वंश हमारे वंश में आ मिले।
हमारी दूसरी बेटी शायना ने, शुक्रवार 8 मार्च 2024 को, कैनसस सिटी में ज़ायन से शादी की। छठे अध्याय में बताई उन दो घरों की बात याद है न। ज़ायन के माता-पिता रैंडी और केल्सी हैं। जिसे हम अपनी कलीसिया कहने लगे हैं, उसी के वे पास्टर हैं। तीस साल से भी ज़्यादा समय से असहाय बच्चों और परिवारों के लिए सेवा करते आ रहे हैं। दो महाद्वीपों के दो परिवार, बिलकुल अलग-अलग रास्तों से चलकर आए, और उस विवाह के मंच पर मिल गए।
उस पूरे हफ़्ते कैनसस सिटी का हमारा घर उन सबसे भर गया। परिवार और जिगरी दोस्त समुद्र पार से हवाई जहाज़ों में आए। कुछ और टेक्सस से और मोंटाना से गाड़ियों में आए। सारा के माता-पिता ब्रेंट और नैंसी पूरे हफ़्ते हमारे साथ ही बैठे रहे। उनकी बहनें, और हमारे बच्चे जिनके साथ पले-बढ़े वह बड़ा कज़िनों का झुंड भी आया।
उसी हफ़्ते, शादी से पहले हमारी परंपरा में होनेवाली हल्दी की रस्म को हमने परिवार की आशीष के रूप में एक दोस्त के घर मनाया। मटन पुलाव मैंने ख़ुद पकाया। अगली दोपहर शायना दुल्हन के रूप में सजी। बहनें उसे बाहर ले गईं। 2003 में जिस बच्ची को लेकर हम अस्पताल की ओर दौड़े थे, वही मार्च 2024 की एक शुक्रवार दोपहर, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर, दुल्हन बनकर मंच की ओर चली। प्रभु ने उन दो वंशों को एक कर दिया। तब मुझे जो महसूस हुआ, उसे कहने के लिए शब्द कम पड़ते हैं।
ये सब परिवार को मिले पालन के रूप हैं। ये किसी एक दिन एक लिफ़ाफ़े में नहीं आते। सालों के बीच से, धीरे-धीरे परिवार बन जानेवाली एक संगति के ज़रिए आते हैं।
सिर्फ़ एक ही हाथ से नहीं
गॉस्पेल मूवमेंट को उठानेवाली तीन ही चीज़ें हैं — लोग, पैसा, और परमेश्वर की बुद्धि। दर्शन जितना बड़ा होगा, ये तीनों उतने ही ज़्यादा चाहिए। इस काम में हम सबसे ज़्यादा सक्रिय प्रभु ही है। लोगों के पास हमारे साथ हाथ मिलाने की आज़ादी है। और पीछे हट जाने की भी आज़ादी है। दोनों सचमुच होते हैं।
सिमोना ने जो दर्शन देखा था, उसे खोलकर बताया तो उसके जवाब में एक बड़ी रक़म का दान आया। उसने विश्वास से आगे बढ़कर प्रभु से माँगा। उस दाता ने भी उदारता से जवाब दिया। पर बाद में समस्याएँ आ गईं। दर्शन से जिनका कोई नाता नहीं था, ऐसी क़िस्म की समस्याएँ। इसलिए वह दान लौटाना पड़ा। उस दौर को सिमोना ने अच्छे से झेल लिया। आगे बढ़ना उसने नहीं रोका।
ऐसे दौरों में मैंने यह सीखा — जब एक हाथ पीछे हट जाता है, तब प्रभु के पास पहले से और हाथ तैयार होते हैं। इस बार, चले गए एक दाता की जगह एक और दाता नहीं आया। एक पूरा झुंड आया। उस एक के छोड़े ख़ाली स्थान को भरने कितने ही दोस्त साथ मिलकर आगे आए। हमें ज़रूरत पड़ेगी, यह हमें ही मालूम होने से पहले प्रभु उन्हें तैयार करता आ रहा था।
परमेश्वर भला है।
हम बढ़ें, इसके लिए वह हमें कमी में चलने देता है — ऐसे दौर होते हैं। और कुछ समय वह अपनी उदारता दिखाता है। तब उसका पालन हमसे आगे-आगे चलता है। काम उसी का है।
चमत्कार, और आम रास्ता
चमत्कारों पर हद से ज़्यादा भरोसा कर बैठना भी होता है। जॉर्ज म्युलर ने जो फल देखे, वैसा कुछ हुए बिना ही, "प्रभु पालेगा" कहते हुए म्युलर का-सा विश्वास हममें भी है — ऐसा नाटक करना वैसा ही है। म्युलर कौन थे, बताता हूँ। उन्नीसवीं सदी में इंग्लैंड में हज़ारों अनाथ बच्चों को पालनेवाले आदमी थे वे। पैसे किसी से नहीं माँगने चाहिए, प्रार्थना करना ही अपना काम है, और देने के लिए लोगों को हिलाने का काम प्रभु का है — यह उन्होंने माना।
प्रभु ने म्युलर को उसी रास्ते चलाया। म्युलर ने भी उसी के अनुरूप बड़ा विश्वास दिखाया। पर प्रभु आम तौर पर उस रास्ते काम नहीं करता। वह बाक़ी सब जिस तरीक़े से करता है, पालन भी उसी तरीक़े से करता है। यानी लोगों के ज़रिए। एक को ज़रूरत देता है। वह ज़रूरत दूसरे को सुनाई दे, ऐसा करता है। और मदद करने के लिए उसका दिल हिला देता है।
चमत्कार परमेश्वर आज भी ज़रूर करता है। स्वर्ग से सीधे संसाधन उतारना, या सपने में किसी दाता से बात करना उसके लिए असंभव नहीं। भारत के हमारे गाँवों में से एक में, एक युवा किसान ने छह सौ फुट गहरा बोर करवाया फिर भी पानी नहीं निकला। इससे फ़सल और परिवार दोनों ख़तरे में पड़ गए। उसने और उसके आस-पास के विश्वासियों ने परमेश्वर को पुकारा। पानी आ गया। खेत बच जाने भर का पानी आ गया।
हमारे अपने परिवार ने भी चमत्कार बहुत देखे हैं। हमारे पिताजी अपने जीवन का पहला आधा हिस्सा नास्तिक रहे। एक दिन दोपहर तीन बजे, सोते हुए ही उन्हें उद्धार मिला। बिस्तर के पास माँ प्रार्थना कर रही थीं। वे चिल्लाते हुए, काँपते हुए उठे। दर्शन में यीशु को देखा, और काटी जाने को तैयार एक फ़सल का खेत देखा। उस एक ही दर्शन ने उन्हें यीशु का अनुयायी बना दिया। और आख़िर में सुसमाचार का सेवक भी बना दिया। दर्शन में यीशु से मिलकर बाद में पौलुस कहलाए गए नए नियम के शाऊल की याद में, उन्होंने अपना मसीही नाम पॉल रखा।
चमत्कारों के लिए विश्वास हमारे घर में पीढ़ियों से चला आ रहा है। हमारे नाना-नानी ने उसी विश्वास में से सेवकाई की। उस दर्शन के बाद हमारे पिताजी पॉल और हमारी माँ रवा रत्नकुमारी, दोनों ने मिलकर उसी में से सेवा की। अब मैं और मेरी पत्नी उसी में से सेवकाई कर रहे हैं। सिमोना उसे आगे ले जा रही है।
चमत्कारों का रास्ता सच है। पर परमेश्वर आम तौर पर जो रास्ता चुनता है, वह यह नहीं है।
आम रास्ता वही है जिस पर यीशु आम तौर पर चला। लोगों के साथ बाँटनेवाले लोगों के ज़रिए काम करना। पिता लोगों को अपनी ओर खींचता है। आत्मा परमेश्वर लोगों को जगाता है। यीशु ने अपने साथ काम करने के लिए लोगों को ही नियुक्त किया। उद्धार भी उसी रास्ते आता है। पालन भी उसी रास्ते मिलता है।
आप क्या आस रख सकते हैं
यह पुस्तक पढ़कर आप तीसरे मार्ग पर चलें, तो पालन के मामले में आप इतनी आस रख सकते हैं।
चेक हर बार समय पर न आए। चंगाई आपके चाहे हुए समय पर न आए। आवाज़ ठीक उस घड़ी न सुनाई दे जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत लगी हो। पर जो आपके लिए काफ़ी है, वह ज़रूर आएगा। वह अक्सर ऐसी दोस्ती के ज़रिए आएगा जिसकी आपने योजना नहीं बनाई, या किसी सामान्य शिष्य से आए एक छोटे अनपेक्षित उपहार के ज़रिए आएगा।
इतने वर्षों में मैंने यही सीखा है। पालन आम तौर पर "काफ़ी" का रूप लेता है। भरपूर नहीं, ऐशो-आराम नहीं। और न ही कुछ भी न होना। ठीक उतना जितना काफ़ी हो। कमी को ढँकनेवाला चेक। "काम मत रोक" कहनेवाली एक अर्थवाली संख्या। अपनी दादी के दिए उपहार को उदारता से बाँटनेवाले दोस्त। अस्पताल के ख़र्च जितना, ठीक समय पर।
तीसरे मार्ग पर चलते रहेंगे, तो आपको काफ़ी मिलता रहेगा।
आगे आता है — इस रास्ते पर आपके साथ चलनेवाला परिवार।
मनन के लिए
पालन अक्सर "काफ़ी, ठीक समय पर" के रूप में ही आता है। परमेश्वर ने आपको ठीक उतना ही दिया जितना काफ़ी था — ऐसा आपके जीवन में कहाँ देखा? उस समय आपने उसे पहचाना था?
आप कहाँ थक चुके हैं, काम रोक देने का मन कर रहा है, और सुनने की ज़रूरत है कि पालनेवाला प्रभु ही है?
इस हफ़्ते किसी को कुछ देने के लिए, किसी को आशीष देने के लिए प्रभु आपके मन में डाल रहा है?
नौवाँ अध्याय20 मिनट
इस रास्ते पर साथ चलनेवाला परिवार
इस पुस्तक ने जो कुछ कहा, उसे आख़िर में सच होना है तो एक ही जगह होना है — परिवार में।
किसी जीवन-शैली की सबसे छोटी इकाई परिवार ही है। चार आदतें परिवार में चल रही हों, तो उसके ऊपर पूरे समाज में वह जीवन-शैली संभव है। परिवार में न चलें, तो बाहर जिसे हम जीवन-शैली कहते हैं, वह असल में नाटक ही है।
अब अपने ही घर की बात करता हूँ। लोगों ने मुझसे सबसे ज़्यादा बार जो सवाल पूछा, उसका जवाब मेरे ही घर में है। मेरे अपने लोग ही वह जवाब हैं।
अब उनसे आपका परिचय कराता हूँ।
अपनी पत्नी के बारे में बताता हूँ
सारा पहली बार 1993 में भारत आईं। तब वे सत्रह साल की हाई स्कूल की लड़की थीं। हमारे पिताजी के चलाए बच्चों के आश्रम की इमारत पर कंक्रीट की छत डालने आई एक काम की टीम के साथ आई थीं। तीसरे अध्याय में यह बात आपको बताई थी न। वे अमेरिका के मोंटाना राज्य के चिनूक नाम के छोटे क़स्बे में पली-बढ़ीं। चारों ओर गेहूँ के खेत, ऊपर बड़ा आसमान, क़स्बे की आबादी क़रीब बारह सौ। उनके माता-पिता ब्रेंट और नैंसी उस क़स्बे के लोगों की दशकों से चुपचाप सेवा करते आए हैं। वे एक साधारण घर में ही पली-बढ़ीं। पर वही साधारणपन उस घर की सुंदरता थी। स्थिर, भरोसेमंद, हमेशा उपलब्ध रहनेवाला घर। छोटे क़स्बे की ज़िंदगी की सारी भलाई से भरा घर।
ब्रेंट कभी वेतन लेनेवाले पास्टर नहीं रहे। अपने पिता के घर बनाने के काम में पले। बीस से तीस की उम्र के बीच चिनूक का गोल्फ़ मैदान चलाया। तीस से चालीस के बीच अपने छोटे भाई बीजे के साथ खेती की। कुछ समय बीमा पॉलिसियाँ बेचीं। कुछ समय तेल और गैस के क्षेत्र में काम किया। अपने क़स्बे की कलीसियाओं की प्रबंध समिति में सेवा की। तीसरे अध्याय में बताए उस मसीही रेडियो स्टेशन के दशकों तक अध्यक्ष रहे। एक ही छोटे प्रसारण से शुरू हुआ वह स्टेशन, उन्हीं की देखरेख में पूरे मोंटाना में और उससे आगे सुनाई देनेवाला स्तुति-गीतों का रेडियो नेटवर्क बन गया।
उन हर ज़िम्मेदारी में उन्होंने ढूँढ़ा एक ही चीज़ — कोई और नौजवान, जिसके साथ खड़े होकर वे उसे आगे ले जा सकें।
जिस लड़के को उन्होंने गोल्फ़ सिखाया, वह बरसों बाद एक शादी में उनके पास आकर बोला, "इतने सालों तक मेरा गोल्फ़ कोच रहने के लिए आख़िरकार धन्यवाद कहना था।" ब्रेंट ने आँख मारते हुए चिढ़ाया, "पहले ही साल मेरी बात मान ली होती, तो तभी सब सीख गया होता न!"
उनके काम का ढंग यही है। अपना काम अच्छे से करो। उसी काम के ज़रिए सुसमाचार पहुँचाओ। अपनी बात कहो। लोगों तक पहुँचने का रास्ता यही है। अब सत्तर की उम्र में भी, अनंत जीवन के बारे में जिसे निश्चय नहीं है, ऐसे हर व्यक्ति से वे बताते ही रहते हैं कि प्रभु ने उस सवाल को उनके जीवन में कैसे तय किया।
ब्रेंट की पत्नी नैंसी और उनकी बहन नेली जो, उनके साथ ही, और भी चुपचाप, सेवा करती आई हैं। अशक्तताओं वाले बच्चों के लिए हमारे परिवार ने भारत में जो साराज़ कवनेंट होम्स शुरू किया, उसकी अमेरिका से बरसों तक रीढ़ ये तीनों ही रहे। ब्रेंट इसे अपने सीधे ढंग से कहते हैं — "ज़्यादा काम नैंसी ने ही किया। नेली जो ने उसकी अच्छी मदद की।" काग़ज़ों का काम, प्रार्थनाएँ, और एक छोटी सेवा-संस्था को खड़ा रखनेवाली लंबी दोस्तियाँ — ये सब इन्हीं तीनों के बीच चलीं। हमारे पीछे खड़े होकर की गई इसी मदद से, अशक्तताओं वाले कितने ही बच्चे गोद लिए जाकर अपने परिवार पा सके। शिष्य बनाना यही है। एक छोटी रसोई की मेज़ पर ही हो जाने जितना सरल काम।
सारा दूसरी बार भारत आईं तब हम दोनों मिले। वह 1994 था। पढ़ाई के बीच एक साल की सेवा के लिए आई अठारह साल की युवा मिशनरी थीं वे। बच्चों से उन्हें बहुत प्रेम था। शुरू में हम दोनों बहुत कम बात करते थे। मैं तेईस का था, हाथ भर काम था। वे बहुत शर्मीली थीं।
उसके अगले साल में हम दोनों के बीच कुछ बदल गया। हमारे परमेश्वर ने हमें एक-दूसरे के लिए ही बनाया है — यह हम दोनों को लगा।
5 जनवरी 1996 को, चिनूक की उनकी कलीसिया में हमारी शादी हुई। हमारे माता-पिता नहीं आ सके। ठीक उसी महीने भारत में अमेरिकी वीज़ा दफ़्तर ख़र्च की समस्याओं के कारण बंद थे। हमारे परिवार में किसी को वीज़ा नहीं मिला। अमेरिका में बने मेरे नए दोस्त भी कोई नहीं आ सके। अपनी ही शादी के दिन, चौबीस साल की उम्र में, मैं अकेला खड़ा था।
उस दिन से आज तक, हर साल वे मेरे साथ खड़ी रही हैं।
मैंने जो हर क़ीमत चुकाई, वह उन्होंने भी चुकाई। जो कितनी ही क़ीमतें मैंने नहीं चुकाईं, वे उन्होंने अकेले चुकाईं। इस यात्रा का हर साल मेरे साथ ही चलीं। वे टिकी रहीं, मजबूरी से नहीं, अपनी मर्ज़ी से टिकीं। दो सौ से ज़्यादा अशक्तताओं वाले बच्चों को उन संस्थाओं से बचानेवाली एक संस्था उन्होंने खड़ी की, जिनमें बहुतों के जीने की कोई संभावना ही नहीं थी। उसी के साथ-साथ हमारे छह बच्चों को जन्मा, पाला, और प्रेम किया। घर, काम, बच्चे, और मैं — सब उन्हीं के कंधों पर चला। जब उन्हें उठानेवाला कोई नहीं था, उन दौरों में उन्होंने ख़ुद को ख़ुद ही सँभाला।
हर बार मैंने उनका बोझ हल्का नहीं किया। उसके बारे में भी इस पुस्तक में लिखा है। फिर भी वे आज भी यहीं हैं। मैं भी हूँ। और काम भी चल ही रहा है।
परिवार के बिना तीसरे मार्ग पर नहीं चला जा सकता। वह परिवार विवाह से बना ही हो, यह ज़रूरी नहीं। नए नियम के शिष्य व्यापक अर्थ में एक आत्मिक परिवार ही हैं। मेरे मामले में वह मेरा विवाह ही बना। मेरे जीवन में चार आदतों का पहला घर सारा ही हैं।
दौरों के नाम पर जन्मे हमारे छह बच्चे
हमारे छह बच्चे हैं। हर एक के जन्म के समय परमेश्वर हमारे जीवन में क्या कर रहा था, वही दौर उनका नाम बन गया।
सिमोना दर्शनी। सिमोना यानी सुननेवाली। दर्शनी यानी जिसके पास दर्शन है। प्रभु हमें जो दिखा रहा था, उसे देखना हम सीख रहे थे — उसी दौर में वह आई। अब वह ग्लोबल कवनेंट की एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर है। 2016 में जोसाया से शादी की।
शायना आराधना। आराधना और विनती की प्रार्थना को साथ चलाना हम सीख रहे थे, उस दौर में वह पैदा हुई। आराधना का अर्थ हिंदी में बताने की ज़रूरत नहीं। शायना का अर्थ यिद्दिश भाषा में सुंदर है। दोनों मिलकर — सुंदर आराधना। शायना ने आराधना पर केंद्रित सेवकाई की डिग्री ली। उसका पति ज़ायन भी एक आराधना के स्कूल से ही पढ़कर आया है।
अमीरा जया। हमारा परिवार भारी परीक्षाओं में था, उस दौर में वह पैदा हुई। अमीरा यानी राजकुमारी। सचमुच उसकी चाल में हमेशा एक शाही ठसक रही है। उसका मध्य नाम हमने सत्या से बदलकर जया किया। दुख के दौर में जय को पहले ही मान लेनेवाली विश्वास की घोषणा थी वह। फिर भी सत्या भी भविष्यद्वाणी ही निकला। पिछले कुछ वर्षों से वह सत्य के पक्ष में खड़े होने की सेवकाई में ही है।
जियाना धन्या और जेम्स रोहन। ये दोनों जुड़वाँ हैं। धन्या यानी आशीष पाई हुई, कृतज्ञ। रोहन यानी ऊपर चढ़नेवाला। काम रफ़्तार पकड़ रहा था, उस दौर में, धन्यवाद के पर्व के आस-पास, हमारे लिए बहुत अर्थवाली एक तारीख़ को ये पैदा हुए।
जोएल जहान। जहान का अर्थ फ़ारसी में दुनिया है। जोएल पिछली गर्मियों में भ्रूण-गोद के ज़रिए हमारे परिवार में आया। हमारी सेवकाई दुनिया भर में फैल रही थी, उसी दौर में उसने हमारे जीवन में क़दम रखा।
छह बच्चे, छह नाम, हमारे परिवार में परमेश्वर के किए काम की छह गवाहियाँ। यह लिखते समय हमारे सबसे छोटे जोएल का एक साल पूरा होने को है।
चार आदतें सबसे पहले सचमुच जिस जगह जीनी हैं, वह परिवार ही है। परमेश्वर की आवाज़ सुनना, उसकी आज्ञा मानना, और एक-दूसरे की ऐसा करने में मदद करना। इनमें से किसी में भी हम सिद्ध नहीं हैं। एक-एक दिन करके, आज्ञा मानने के एक-एक मामूली काम के हिसाब से, हर दिन परिवार के रूप में मिलकर प्रभु की सेवा करने की कोशिश कर रहे हैं। बस इतना।
खाने की मेज़
कैनसस सिटी में मैं, मेरी पत्नी, जुड़वाँ बच्चे और जोएल — हम परिवार के डिस्कवरी ग्रुप के रूप में बैठने की कोशिश करते हैं। सच कहूँ तो समय न मिलने की दिक़्क़त बनी ही रहती है। जितने हफ़्ते बैठ पाए, उनसे ज़्यादा छूट गए। और जब बैठते भी हैं, तो समय ढूँढ़कर थोड़ा जूझने के बाद ही बैठते हैं। इस बारे में आपसे ईमानदार ही रहना चाहता हूँ।
उसी समय एक और सच भी कह सकता हूँ — चार आदतें अब मेरे लिए हफ़्ते में एक बार का तरीक़ा भर नहीं रहीं। वे मेरी जीवन-शैली ही बन गई हैं। परमेश्वर की आवाज़ सुनना, उसकी आज्ञा मानना, किसी और की ऐसा करने में मदद करना — ये हर दिन मेरे भीतर चलते रहते हैं। हवाई अड्डों में, अपने बच्चों पर की जानेवाली प्रार्थनाओं में, अनजान लोगों के साथ किए भोजनों में, और अभी कोई उठा भी न हो तब अकेले पवित्रशास्त्र पढ़ने के ढंग में चलते हैं। परिवार का डिस्कवरी ग्रुप उस जीवन-शैली के दिखने का एक रूप भर है, पूरा रूप नहीं।
हमारे सबसे छोटे के लिए हुए एक समारोह में, हमारे अपने शहर ओंगोल में, एक रात की बात बताता हूँ। उस कमरे में क़रीब पचास रिश्तेदार थे। चार आदतों को सरलता से लौटा लाने पर पूरी किताब लिख चुका आदमी हूँ न। उस रात उपदेश नहीं देना चाहा। डिस्कवरी ग्रुप करते हैं — यह सोचकर उसे चलाने के लिए अपनी बेटी सिमोना से कहा। कमरे में चारों ओर दस मेज़ें लगाईं। सबको उत्पत्ति का पैंतालीसवाँ अध्याय दिया। वही हिस्सा जिसमें यूसुफ़ आख़िर अपने भाइयों को बताता है कि वह कौन है। सबसे कहा कि साथ मिलकर बाइबल खोलें।
असल में बाइबल खोली सिर्फ़ तीन-चार मेज़ों पर बैठे लोगों ने। बाक़ी हमारी ओर, या एक-दूसरे के चेहरों की ओर, या अपने फ़ोन की ओर देखते रह गए। मेरा अपना तरीक़ा, मेरे अपने शहर में, मेरे अपने परिवार के सामने काम न करते हुए मैंने चुपचाप देखा। जब समझ आया कि क्या हो रहा है, तो जो एक काम कर सकता था वही किया — वहीं रास्ता बदल दिया। माइक लेकर सबको फिर एक ही मंडली बनाकर, वे सवाल मैं ही ज़ोर से पूछने लगा। शुरू में नया और असहज लगा, पर आख़िर में सबको अच्छा ही लगा।
यह बात आपको क्यों बता रहा हूँ — चार आदतें कोई मंत्र नहीं हैं। मैं भी उनमें उस्ताद नहीं हूँ। वे मेरे हाथों में भी नाकाम होती हैं। वह रात आख़िर में अच्छी ही रही। पर सच्ची चीज़ें जैसे अच्छी होती हैं, वैसे ही हुई। थोड़ी अस्त-व्यस्त, आधी-अधूरी चलती, और मौक़े पर सँभाल लेने से टिकी। आपका पहला ग्रुप ऐसा दिखे, तो आप जैसे बहुत लोग हैं। मेरा अपना परिवार भी उन्हीं में है।
हाल ही में सारा, जुड़वाँ बच्चे और मैंने मिलकर परमेश्वर की दी हुई आशा की कहानियाँ शृंखला पूरी पढ़ी। पवित्रशास्त्र की दस कहानियों से चलनेवाली एक सरल डिस्कवरी ग्रुप शृंखला है वह। उनमें से कुछ हमने अपने कमरे में पढ़ीं। कुछ सौदा लेने जाते हुए गाड़ी में ही पढ़ीं। कुछ रात के खाने की मेज़ के चारों ओर पढ़ीं।
दसों कहानियाँ पूरी कीं।
परिवार का डिस्कवरी ग्रुप जुड़वाँ बच्चे बारी-बारी से चलाते हैं। वे चौदह साल के हैं। हम बाक़ी सबसे वही तीनों सवाल वे ही पूछते हैं। हम जवाब देते हैं। इस हफ़्ते क्या करेंगे, यह प्रभु से पूछते हैं। अगले हफ़्ते, क्या किया — यह एक-दूसरे से पूछकर जान लेते हैं।
2026 में, कैनसस सिटी के एक घर में, तीसरा मार्ग ऐसा दिखता है — ध्यान से न देखनेवाली आँख को दिखाई ही न दे, इतना छोटा। फिर भी, पूरी बात उसी में है।
उससे भी बड़ा परिवार
तीसरे मार्ग का परिवार मेरे दांपत्य से भी बड़ा है, मेरे बच्चों से भी बड़ा।
इसे पढ़नेवालों में से बहुत-से, मेरी तरह पाँचवीं पीढ़ी के मसीही परिवार में जन्मे नहीं हैं। आप शुरू वहीं से करेंगे जहाँ आप हैं। इसमें कुछ ग़लत नहीं। केसबो ने वहीं से शुरू किया जहाँ वह था। मिंडेन के ग्रेग ने भी। अपने क़स्बे में डैनी ने भी।
पाँच पीढ़ियों को कहीं न कहीं से शुरू तो होना ही है। वे आपसे भी शुरू हो सकती हैं।
आनंद से भर गया एक दारोग़ा का घर
प्रेरितों के काम का वही सोलहवाँ अध्याय। लुदिया की घटना के कुछ ही आयतों बाद।
लुदिया के घर ठहरी वही टीम — पौलुस और सीलास — अब मुसीबत में पड़ जाती है। मालिकों को पैसे कमाकर देनेवाली एक दासी लड़की में से उन्होंने दुष्टात्मा निकाल दी। उन मालिकों ने पौलुस और सीलास को अधिकारियों के सामने घसीट लिया। अधिकारियों ने उनके कपड़े उतरवाकर, बेंतों से पिटवाकर, नगर के बंदीगृह की भीतरी कोठरी में डलवा दिया। पैरों में काठ ठोंककर कसकर बाँध दिया।
आधी रात को पौलुस और सीलास प्रार्थना करते और परमेश्वर की स्तुति करते रहे। बाक़ी क़ैदी सुनते रहे। तभी एक बड़े भूकंप ने बंदीगृह की नींव हिला दी। हर दरवाज़ा खुल गया। हर एक की बेड़ियाँ खुल गईं।
बंदीगृह का दारोग़ा जागकर, सब दरवाज़े खुले देखकर, समझा कि सब क़ैदी भाग गए। रोमी क़ानून के अनुसार, क़ैदियों को खो देनेवाले अधिकारी को अपनी जान देनी होती थी। ख़ुद को मार डालने के लिए उसने तलवार खींच ली।
अँधेरे में से पौलुस ज़ोर से चिल्लाया — "अपने आप को कुछ हानि न पहुँचा, क्योंकि हम सब यहीं हैं।"
उस दारोग़ा ने दीये मँगवाए, काँपता हुआ भीतर दौड़ा, और पौलुस और सीलास के सामने गिर पड़ा। उन्हें बाहर लाकर, जो सवाल कब से उसके भीतर उसे बिना पता चले घूम रहा था, वही पूछ लिया — "हे साहिबो, उद्धार पाने के लिए मैं क्या करूँ?"
जवाब सीधा आया — "प्रभु यीशु पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा।"
उसी आधी रात में वह उन्हें अपने घर ले गया। उनके घाव धोए। उन्होंने उसे और उसके घर के हर एक को परमेश्वर का वचन सुनाया। उसी रात, उसी घड़ी, उसने और उसके घरवालों सबने बपतिस्मा लिया। फिर उसने उनके आगे भोजन रखा। लूका का लिखा शब्द है — उसने सारे घराने समेत परमेश्वर पर विश्वास करके आनंद किया।
इस घटना में भी चारों आदतें आप देखें, यही मेरी चाह है।
पहली आदत — सामान्य शिष्य। वह एक बंदीगृह का दारोग़ा है। एक छोटे नगर में सरकारी नौकरी करनेवाला मामूली रोमी आदमी। न यहूदी, न भक्त, किसी धार्मिक परंपरा में कोई योग्यता नहीं। एक तलवार, एक नौकरी, एक परिवार — उसके पास यही थे।
दूसरी आदत — परमेश्वर की आवाज़ सुनना। इस घटना में डिस्कवरी एक भूकंप के ज़रिए, एक पुकार के ज़रिए आई। भागे नहीं, वहीं खड़े रहे दो क़ैदियों के ज़रिए प्रभु उस दारोग़ा से मिला। यहाँ डिस्कवरी बहुत तेज़ी से हुई। अपने सामने कौन खड़ा है यह समझ आते ही, वह ज़मीन पर गिरता हमें दिखाई देता है।
तीसरी आदत — आज्ञा मानना। उसका आज्ञा मानना तुरंत हुआ। उसी रात उन्हें घर ले गया। उसकी अपनी व्यवस्था ने जो घाव किए थे, उन्हें अपने हाथों से धोया। उसी रात, उसी घड़ी, अपने ही घर में, अपने सब घरवालों के साथ बपतिस्मा लिया। उनके आगे भोजन रखा। सुबह होने तक नहीं रुका। किसी याजक की सलाह नहीं ली। जो सुना, वैसा ही किया। बस इतना।
चौथी आदत — दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना। घरवालों की बात सबसे तीखी यहीं दिखती है। उसने अकेले विश्वास नहीं किया। उसी अँधेरी घड़ी में उसके घरवालों सबने उसके साथ ही बपतिस्मा लिया। "अपने नए विश्वास को अपने परिवार के साथ आगे कैसे बाँटना है" — ऐसी कोई रणनीति पौलुस और सीलास ने उसे नहीं दी। उसी रात उसके घर के हर एक को वचन सुनाया। उसका उद्धार, उसी रात उसके पूरे घर को उसके साथ भीतर ले गया। आनंद से भरा वह अकेला नहीं। उसका पूरा घर उसके साथ ही भर गया।
एक घर अपनी बाइबल भर की सीमा तक जाए तो ऐसा होता है — एक आदमी, उसकी पत्नी, बच्चे, घरवाले सब, एक ही रात में परमेश्वर के राज्य में आ गए। क्योंकि एक आदमी ने सुना और आज्ञा मानी।
हमें हर बार भूकंप नहीं आएगा। उसी रात बपतिस्मा भी नहीं होगा। पर सिद्धांत हमें भी मिलता है — सुसमाचार सबसे पहले आपके अपने लोगों में से होकर ही भीतर आता है।
आपका परिवार, आपके लोग
उस पहले खेत के बारे में मुझे आपसे ईमानदार रहना चाहिए। क्योंकि उसके बारे में कोई पहले से चेतावनी नहीं देता। जिन लोगों तक आप पहुँचने की कोशिश करेंगे, उन सबमें अक्सर सबसे कठिन आपके अपने ही होते हैं।
अनजान आदमी आपको नई नज़र से देखता है। पर आपके छोटे भाई को याद है कि पंद्रह साल की उम्र में आप कैसे थे। आपके पिता आपकी बातें पहले भी सुन चुके हैं। बचपन के दोस्त ने आपको गिरते देखा है। इनमें से कोई भी जल्दी विश्वास नहीं करेगा कि प्रभु आपके ज़रिए कोई सुनने लायक़ बात कहेगा। सुसमाचार आसानी से भरोसे की राह पर ही चलता है। अपने परिवारों के साथ वह भरोसा बरसों के इतिहास में उलझा होता है। फिर भी शुरुआत उन्हीं से होती है। कठिन होगा, यह जानते हुए भीतर जाते हैं। बस इतना ही फ़र्क़ है।
यीशु को भी वह कठिनाई मालूम थी। वह अपने पले-बढ़े नासरत नगर लौटकर आराधनालय में सिखाने लगा। जिन्होंने उसे बड़ा होते देखा था, वही बोले — यह वही बढ़ई है न, मरियम का बेटा न? उन्होंने उसके विषय में ठोकर खाई। तब उसने यह कहा — "भविष्यद्वक्ता अपने देश और अपने कुटुंब और अपने घर को छोड़ और कहीं निरादर नहीं होता।" वहाँ वह कोई बड़ा काम नहीं कर सका, यह मरकुस ने लिखा। उसके अपने भाइयों ने भी, उसके मरकर जी उठने तक, उस पर विश्वास नहीं किया। परमेश्वर के पुत्र के लिए ही अपना नगर कठिन ज़मीन था, तो आपका नगर भी कठिन हो सकता है। इसमें शर्म की कोई बात नहीं।
फिर भी, शुरू वहीं से कीजिए। धीरे से शुरू कीजिए। मेरी बेटी चलाने की कोशिश कर रही थी और मेरे पचास रिश्तेदार फ़ोन की ओर देख रहे थे — यह आपने देखा ही। वह वैसा भी दिखता है। ऐसा हो जाए तो आप जैसे बहुत लोग हैं। प्रभु ने आपको पकड़ने से पहले से जो आपको जानते हैं, उनके पास उसे ले जाना — सब कामों में सबसे कठिन काम है। और अक्सर सबसे फलवंत काम भी वही है। उनमें से कुछ धीरे-धीरे आएँगे। कोई इसी साल आ सकता है। आपका छोटा भाई या आपकी माँ आख़िर आपके पास बैठकर आपके साथ पवित्रशास्त्र खोल ले — वह शाम, वहाँ तक पहुँचने में लगी हर कठिन कोशिश की क़ीमत चुका देती है।
आपका परिवार मेरे परिवार जैसा न हो, यह हो सकता है।
हफ़्ते के बीच एक रात आपके साथ खाना खानेवाले दोस्त हो सकते हैं। इस दौर में प्रभु ने आपके चारों ओर जुटाई छोटी मंडली हो सकती है। जीवन साथ बाँटने के लिए आपके चुने हुए लोग हो सकते हैं।
पूरे नए नियम में यही ढंग दिखता है। इस पुस्तक में आप तीन लोगों से मिल ही चुके हैं — कुरनेलियुस, लुदिया, और फिलिप्पी के बंदीगृह का दारोग़ा। ये तीनों यीशु के पास अपने ही लोगों के साथ आए।
महान आज्ञा भी यहीं से शुरू होती है। प्रेरितों के काम 1:8 में यीशु ने कहा — "परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।" पहले यरूशलेम। यानी आपके अपने लोग, आपकी अपनी गली, आपकी अपनी खाने की मेज़।
लूका 10 उसके बाद की सीढ़ी है। सत्तर लोग दो-दो करके, अपने लिए अब तक अनजान गाँवों में जाते हैं। परमेश्वर ने जिसे सुसमाचार के लिए पहले ही खोल रखा है, ऐसे शांति के व्यक्ति को ढूँढ़कर उसी के घर ठहरते हैं। पर लूका 10 काम तब करता है जब आपके अपने लोगों से पहले शुरुआत हो चुकी हो। जो दो जाते हैं, वे चार आदतें अपने ही घर में कैसी दिखती हैं, यह पहले सीख चुके होते हैं।
आप जहाँ पहले से हैं वहाँ, अपने ही लोगों से पहले शुरू कीजिए। वहाँ से बाहर, और दूर चलिए।
जहाँ हर कोई अपने-अपने ढंग से जीने का चलन ज़्यादा है, वहाँ कोई न कोई कहेगा — "हमारे यहाँ सब अलग-अलग जीते हैं। कुरनेलियुस जैसे मज़बूत परिवार हमारे पास नहीं हैं। यह सब यहाँ नहीं चलेगा।" यह बात मैंने कितनी ही बार सुनी है। मेरा जवाब यह है — आपके लोग का मतलब सिर्फ़ आपके ख़ून के रिश्तेदार नहीं। एक मेज़ पर बैठी आपकी पत्नी और बच्चे हो सकते हैं, तीन राज्यों में बिखरे आपके माता-पिता और भाई-बहन हो सकते हैं, या अपना परिवार कहने भर क़रीब हो चुके दोस्त हो सकते हैं। कभी वे एक मेज़ के चारों ओर बैठते हैं। कभी एक स्क्रीन पर मिलते हैं। आपके लोग को तय करती है एक ही बात — प्रभु ने आपको कौन दिए हैं।
आप अकेले हो सकते हैं, रिश्तेदारों से कट चुके हो सकते हैं, बिना बच्चों के हो सकते हैं। फिर भी चार आदतों का घर आपके पास है, और प्रभु ने आपके पास रखे लोगों के पास है।
चार आदतों को कहीं न कहीं सच होना है। आप जहाँ भी हों, वहाँ आपके साथ जो भी हों — वही जगह है जहाँ उन्हें सच होना है। वही आपके लोग हैं।
आपके परिवार के लिए एक आशीष
यहाँ तक पढ़कर आए हैं, इसलिए आपके परिवार के लिए एक आशीष के साथ आपको घर भेजना चाहता हूँ।
आपसे कोई नहीं कह रहा कि वीर बनिए। मसीह ने जिस शब्द को नया अर्थ दिया, उसी अर्थ में — सामान्य बने रहिए, इतना बहुत है।
आपसे जो माँगा जा रहा है, वह यह है — जिन लोगों से आप पहले से प्रेम करते हैं, उनके साथ मिलकर खाने की मेज़ पर प्रभु की सुनिए। इस हफ़्ते उसने जो छोटा काम कहा है, उसकी आज्ञा मानिए। यह काम जो आपने अभी शुरू किया है, उसे करने में अपने जीवन के कम से कम एक व्यक्ति की मदद कीजिए।
इस हफ़्ते ये तीन काम कर लें, तो आप पहले से ही एक गॉस्पेल मूवमेंट का हिस्सा हैं। हो सकता है वह आपकी आँखों को अभी न दिखे। मूवमेंट का मतलब है तैयार होती ज़मीन। फल पीछे से आता है।
वह फल आते मैं कितने ही वर्षों से देख रहा हूँ — माताओं के ज़रिए, किशोर बच्चों के ज़रिए, पति खो चुकी बहनों के ज़रिए, मोटरसाइकिल चलानेवालों के ज़रिए, पिकलबॉल खेलनेवालों के ज़रिए, होटलों में परोसनेवालों के ज़रिए, प्याज़ बेचनेवालों के ज़रिए, ऑटो चलानेवालों के ज़रिए देखा है। इनमें कोई ख़ास नहीं था। फिर भी हर एक ने, प्रभु ने जो लोग उन्हें पहले से दे रखे थे, उन्हीं के बीच सुसमाचार पहुँचाया।
आप भी उन्हीं में से एक हैं।
मनन के लिए
चार आदतों को सबसे पहले आपके अपने परिवार में सच होना है। शुरू करने के लिए प्रभु ने सचमुच आपको कौन लोग दिए हैं?
मेरे अपने पचास रिश्तेदार कमरा भरकर बैठे थे, और मेरा दिया पवित्रशास्त्र बिना खोले एक-दूसरे की ओर या फ़ोन की ओर देखते रहे। ऐसी गड़बड़ी भी आम ही है — यह जान लेने से, काम जितना सोचा था उतना सुथरा न हो तब भी शुरू करने की आज़ादी आपको मिलेगी?
इस हफ़्ते किस दिन आपके घरवाले बैठकर एक कहानी साथ खोल सकते हैं?
दसवाँ अध्याय11 मिनट
शुरुआत वहीं से, जहाँ आप अभी हैं
आपको देने के लिए मेरे पास कोई रणनीति नहीं है।
है तो एक सवाल — "अभी आपके सामने, आज्ञा मानने का अगला काम कौन-सा है?"
यह तरीक़ों की पुस्तक नहीं है
दुनिया में अच्छे कोर्स हैं। डिस्कवरी ग्रुप के कितने ही रूप हैं। परमेश्वर की दी हुई आशा की कहानियाँ शृंखला है। सृष्टि से मसीह तक नाम की शृंखला भी है। मूवमेंट अगुवों के लिए और बड़ी सूची दूसरी पुस्तक में आएगी।
पर इस रास्ते पर चलने के लिए, पहले सबसे अच्छा कोर्स कौन-सा है — यह ढूँढ़ते बैठने की ज़रूरत नहीं।
सामरी स्त्री किसी कोर्स के लिए रुके बिना सीधे अपने नगर गई। पाँच बहनों और एक बाइबल वाली शेरोन भी नहीं रुकीं। एक घंटे की कैंप की कक्षा ख़त्म करके घर आकर, अपने सामने के लोगों के साथ बाइबल खोलनेवाला डैनी भी नहीं रुका।
आपको कोर्स नहीं चाहिए। जाइए और शुरू कीजिए, बस इतना।
क़ब्रों के बीच रहनेवाला आदमी
इस आदमी से आपका परिचय हो चुका है। चौथे अध्याय में उसके बारे में एक बात कहकर, पूरी घटना बाद में बताऊँगा, यह कहा था न। आपको भेजने से पहले, वह पूरी घटना अब बताता हूँ। मरकुस, पाँचवाँ अध्याय।
यीशु झील पार करके गिरासेनियों के इलाक़े में गया। वह ग़ैर-यहूदियों का इलाक़ा था, दस नगरों का इलाक़ा। कोई यहूदी शिक्षक आम तौर पर जहाँ पैर नहीं रखता, वैसी ज़मीन। वहाँ एक आदमी उससे मिलने आया। वह नगर से दूर, क़ब्रों के बीच ही रहता था। उसे कितनी ही बार ज़ंजीरों से बाँधा गया था। दुष्टात्मा के उठाए आवेश में उसने वे सब ज़ंजीरें तोड़ डालीं। रात-दिन चिल्लाता, पत्थरों से ख़ुद को ही काटता रहता था। नगर के लोग उस पर कब का ठप्पा लगा चुके थे।
यीशु ने उन दुष्टात्माओं को निकाल दिया। नगर के लोग दौड़े हुए आए। आकर देखा तो वह आदमी कपड़े पहने, ठीक मन से, शांत होकर यीशु के पाँवों के पास बैठा था। वे डर गए। अपना इलाक़ा छोड़कर चले जाने की उन्होंने यीशु से विनती की।
पर उस आदमी ने विनती यह की कि उसे भी अपने साथ ले चले।
यीशु ने मना कर दिया।
उसने उससे यह कहा — "अपने घर जाकर अपने लोगों को बता कि तुझ पर दया करके प्रभु ने तेरे लिये कैसे बड़े काम किए हैं।"
वह आदमी चला गया। मरकुस हमें एक ही वाक्य देता है — "वह जाकर दिकापुलिस में इस बात का प्रचार करने लगा कि यीशु ने मेरे लिए कैसे बड़े काम किए; और सब अचंभा करते थे।"
दिकापुलिस का अर्थ है दस नगर। हफ़्ता भर पहले क़ब्रों के बीच चिल्लाकर जीनेवाले एक ही आदमी के ज़रिए, सुसमाचार दस नगरों तक पहुँचा।
उसके पास अपनी गवाही के सिवा कोई योग्यता नहीं थी। अपने इलाक़े के सिवा कोई मंच नहीं था। "जाकर कह" — इस बात का आज्ञा-पालन करने के सिवा कोई धर्मविज्ञान नहीं था। ऐसे ही आदमी को प्रभु ने दस नगरों तक पहुँचने के लिए काम में लिया।
क़ब्रों के बीच रहनेवाला वह आदमी कोई दुर्लभ अपवाद नहीं है। वही असली नमूना है। प्रभु ने हमेशा निर्बलों को ही चुना। एक बार उन्हें क़तार में देखिए।
मूसा एक आदमी को मारकर जान बचाकर भागा हुआ आदमी था। प्रभु ने बुलाया तो बहस की कि मेरा मुँह और जीभ भारी है।
दाऊद हाथ में गोफन लेकर खड़ा लड़का था। बाद में दूसरे की पत्नी लेकर, उसके पति को मरवा देनेवाला भी। फिर भी आज तक उसे परमेश्वर के मन के अनुसार कहा जाता है।
गिदोन डर के मारे दाखरस के कुंड में छिपकर चुपचाप गेहूँ झाड़ रहा था। प्रभु के दूत ने उसे देखकर, छिपे रहते हुए ही, हे शूरवीर कहकर पुकारा।
पतरस, एक दासी के मुँह के सामने ही, यीशु कौन है मैं जानता ही नहीं — यह कहनेवाला। उसी को यीशु ने कलीसिया की नींव की चट्टान बनाया।
शाऊल, स्तिफनुस को पत्थर मारते समय मारनेवालों के कपड़ों की रखवाली करनेवाला। वही शाऊल पौलुस बनकर, अन्यजातियों तक सुसमाचार ले जानेवाला महान प्रेरित बना।
इनमें से कोई भी योग्य नहीं था। फिर भी प्रभु ने हर एक को बुलाया। वह ढंग बाइबल के शुरू से आख़िर तक दिखता ही रहता है। आप बलवान हो जाएँ, इसकी वह बाट नहीं जोहता। वह एक ही बात कहता है — "मैं तेरे संग रहूँगा।" आपकी पूरी योग्यता वही एक वाक्य है।
यीशु ने उस आदमी को जो आख़िरी निर्देश दिया, वही मैं भी आपके हाथ में रखकर जाना चाहता हूँ। अपने घर जाकर अपने लोगों से कह कि तेरे लिए प्रभु ने कैसे बड़े काम किए हैं।
हो सकता है आप पहले से ही सुन रहे हों
यहाँ तक पढ़कर आए हैं, तो हो सकता है प्रभु आपसे पहले से ही बात कर रहा हो।
बरसों पहले जो सवाल मैंने ख़ुद से पूछना सीखा, वही अब आपसे पूछ रहा हूँ। इस हफ़्ते आपने जो बातें सुनीं, उनमें कोई ऐसी है जिसकी आपने अभी आज्ञा नहीं मानी?
हो, तो इस पुस्तक का बाक़ी सारा हिस्सा उसी बात की आज्ञा मानने के लिए आपको दिया गया हौसला है।
न हो, तो इस पुस्तक की प्रार्थना यह है — इसी हफ़्ते, कहीं किसी मेज़ पर, किसी एक और व्यक्ति के साथ मिलकर आप जो पाठ पढ़ें, उसके ज़रिए प्रभु आपसे बात करे।
परमेश्वर की आवाज़ सुनाई देने तक रुकने की ज़रूरत नहीं। आप अभी शुरू कर सकते हैं। वह आवाज़ रास्ते में ही आपसे मिल जाएगी।
इतने वर्षों में मेरा अनुभव यही है।
जिस वादे ने मुझे चलाया
जिस वादे ने मुझे इतनी दूर चलाया, उसी से इस पुस्तक के ज़रिए आपको हौसला देना चाहता हूँ।
2002 में, अपने ही ज़िले में काम शुरू किए पाँच साल पूरे होने के दिन, प्रभु ने मुझसे कहा — इससे कहीं बड़ा मिशन क्षेत्र मैंने तुझे विरासत में दिया है।
पहले मैंने उस पर विश्वास नहीं किया। बाद में देखा तो विश्वास करना ही आसान हिस्सा निकला। उसने जो दिखाया था, उसमें पूरी तरह चलकर उतरने में मुझे क़रीब बीस साल लगे। उस दर्शन से थोड़ा हटकर ही खड़ा रहा। उसके बग़ल में काम किया, पर पूरी तरह भीतर पैर नहीं रखा। सोचता था कि मैं व्यावहारिक हो रहा हूँ। सच कहूँ तो, डर रहा हूँ — यह कहने का इज़्ज़तदार तरीक़ा भर था वह। पूरी तरह भीतर पैर रखा 2021 में ही। परमेश्वर कब का तय कर चुका था, उस बात पर उससे बहस करने के लिए यह बहुत लंबा अरसा है।
आख़िर शुरू किया तो काम मेरे नाप सकने से बड़ा हो गया।
प्रभु ने आपसे भी बात की है। उसके यहाँ पक्षपात नहीं। आप ख़ास हो जाएँ या पूरी तरह तैयार हो जाएँ, इसकी वह बाट नहीं जोह रहा। वह सिर्फ़ इसकी बाट जोह रहा है कि आप शुरू करें।
तीसरा मार्ग आपके कंधे पर उठाने की कोई परियोजना नहीं है। वह आपकी आम मसीही ज़िंदगी ही है।
इसके लिए ख़ुद को सौंप दें, तो ज़्यादा समय बीतने से पहले ही, यही आपके जीने का ढंग बन जाएगा।
वह छोटी जगह जहाँ से सब शुरू होता है
मोंटाना के चिनूक में, सारा के माता-पिता के घर के एक कमरे में बैठकर मैं ये आख़िरी पन्ने लिख रहा हूँ।
बग़ल के कमरे में मेरी पत्नी अपनी बहनों और अपनी माँ के साथ हैं। ब्रेंट और नैंसी इसी घर में छियालीस साल से रह रहे हैं। अब, बुज़ुर्गों के लिए बने फ़्लैटों में एक घर के लिए प्रतीक्षा-सूची में हैं। हम आए सिर्फ़ एक शादी में शामिल होने नहीं, बल्कि जगह ख़ाली होने पर वे आसानी से जा सकें, इसके लिए सामान बाँधने में मदद करने भी।
जोएल मेरे पास बिस्तर पर है। उसका एक साल पूरा होने को है। मेरी नोटबुक पर रेंगता हुआ हँस रहा है।
खिड़की के बाहर एक खेत है, और 1995 से मेरा जाना-पहचाना एक रास्ता। गली में दूर तक देखें तो खड़ी गाड़ियाँ ही हैं, रास्तों पर लोग नहीं। भारत की खचाखच भरी गलियों से इसकी कोई तुलना ही नहीं। यहाँ सब कुछ बहुत शांत है।
आपसे जो कुछ बाँटा, उसमें से कोई भी किसी बड़ी जगह में शुरू नहीं हुआ। एक खुली बाइबल और सुनने बैठा एक और व्यक्ति — ऐसी ही किसी रसोई की मेज़ पर यह सब शुरू हुआ।
आपकी भी क़रीब-क़रीब उतनी ही छोटी जगह होगी। वह किसी सुबह दफ़्तर जाती रेल में शुरू हो सकती है। दफ़्तर में चाय के कमरे के कोने में, किसी सहकर्मी के साथ शुरू हो सकती है। जो संदेश भेजने को प्रभु कब से आपके मन में डाल रहा है, उसी के साथ आपके फ़ोन पर शुरू हो सकती है। बाइबल के बारे में हज़ार सवाल पूछनेवाले आपकी बहन के बेटे के साथ, उनके घर के सोफ़े पर शुरू हो सकती है।
आपकी छोटी जगह कहाँ है, मुझे नहीं मालूम। प्रभु को मालूम है। इसी हफ़्ते उसने वह आपको एक-दो बार दिखाई भी होगी। जैसे मैं बरसों भारत की ओर देखे बिना टालता रहा, वैसे ही आपने भी उसे एक-दो बार टाला होगा।
एक बार फिर देखिए।
यह पुस्तक बंद करने से पहले तीन वाक्य लिख लीजिए — एक नाम, इस पुस्तक के अंत में से एक कहानी, और इस हफ़्ते साथ बैठने का एक समय।
सब कुछ वहीं से शुरू होता है।
मई 2026 की एक शुक्रवार रात, पसाडेना की उस खाने की मेज़ से मैं जो सुना हुआ वाक्य घर लाया था, उसी से ख़त्म कर रहा हूँ।
गॉस्पेल मूवमेंट का अर्थ है — सामान्य शिष्य परमेश्वर की आवाज़ सुनें, उसकी आज्ञा मानें, और दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करें। जब तक वही आम मसीही ज़िंदगी न बन जाए।
उन सामान्य शिष्यों में से एक आप भी हैं।
आप यीशु की आवाज़ सुनते हुए, उसकी आज्ञा मानते हुए, किसी और की ऐसा करने में मदद करते हुए चल रहे हैं, तो आप पहले से ही इस बात के भीतर हैं। हिस्सा बनने के लिए बाट जोहने की ज़रूरत नहीं।
अभी भीतर न आए हों, तो आइए। जगह है।
जाइए और शुरू कीजिए।
इसी हफ़्ते शुरू कीजिए
सिखानेवाले आप नहीं, पवित्र आत्मा है। आपको न योजना चाहिए, न रुतबा, न अनुमति। एक नाम और तीस मिनट काफ़ी हैं।
एक। जहाँ आप पहले से हैं, वहीं से शुरू कीजिए। अपने ही घर में, जो लोग पहले से आपके क़रीब हैं, उनके साथ एक ग्रुप शुरू कीजिए। या फिर, प्रभु ने आपके जीवन में जो एक व्यक्ति रखा है, उसके साथ शुरू कीजिए। एक दोस्त, एक पड़ोसी। एक ही काफ़ी है। फ़ोन की स्क्रीन पर दिखनेवाला एक दोस्त भी काफ़ी है। नए लोगों को बुला रहे हों, तो बात सरल रखिए। इतना काफ़ी है — "जो पुस्तक मैं पढ़ रहा हूँ, उसने कहा कि किसी दोस्त के साथ मिलकर एक छोटी कहानी पढ़ो और उस पर बात करो। मेरे साथ पढ़ोगे?"
दो। इस पुस्तक के अंत में जो परमेश्वर की दी हुई आशा की कहानियाँ हैं, वहाँ तक जाइए। पहली कहानी साथ मिलकर ज़ोर से पढ़िए। फिर कोई एक उसे अपने शब्दों में दोहराए। पहले आप ही दोहराइए। तब वह किसी को परीक्षा जैसी नहीं लगेगी। ऐसे दोहराने से वह कहानी उनकी अपनी बन जाती है। फिर वह आपका भाषण बनकर नहीं रह जाती।
तीन। तीन सवाल पूछिए। यह कहानी हमें परमेश्वर के बारे में क्या दिखा रही है? मनुष्यों के बारे में क्या दिखा रही है? प्रभु तुमसे क्या कह रहा है? कोई कहे "मुझे नहीं मालूम", तो कोई बात नहीं। बस रुककर इंतज़ार कीजिए।
चार। उठने से पहले एक और सवाल पूछकर, हर एक ने जो कहा वह लिख लीजिए। इस हफ़्ते इसके बारे में क्या करोगे? यह कहानी किसे सुनाओगे?
पाँच। अगले हफ़्ते फिर मिलिए। जहाँ रुके थे वहीं से शुरू कीजिए — "क्या किया? क्या हुआ?" फिर, अगली कहानी खोलिए।
डिस्कवरी ग्रुप बस इतना ही है। उनमें से कोई तैयार हो जाए, तो अपने ही घर में, अपने ही लोगों के साथ यही काम शुरू करने में उसकी मदद कीजिए। इसे मूवमेंट कहने की ज़रूरत नहीं। इस पुस्तक का हर मूवमेंट ऐसे ही शुरू हुआ — एक नाम, एक कहानी, एक-एक हफ़्ता करके।
मनन के लिए
क़ब्रों के बीच रहनेवाले उस आदमी के पास दो ही चीज़ें थीं — अपनी गवाही, और "जाकर कह" इस बात का आज्ञा-पालन। इन्हीं दो को पकड़कर वह दस नगरों तक पहुँचा। प्रभु ने आपके साथ जो किया, उसमें से क्या है जिसे आप बस जाकर कह सकते हैं?
इस हफ़्ते प्रभु ने आपसे जो माँगा, उसमें कोई ऐसी बात है जिसकी आपने अभी आज्ञा नहीं मानी?
अभी तीन वाक्य लिख लीजिए — एक नाम, पुस्तक के अंत में से एक कहानी, और इस हफ़्ते साथ बैठने का एक समय।
आशीर्वाद2 मिनट
कुएँ पर एक सामरी स्त्री से बात करनेवाला प्रभु, इस हफ़्ते आपसे भी बात करे। जहाँ आप पहले से हैं, वहीं वह आपसे मिले। आज्ञा मानने का एक छोटा काम वह आपके हाथ में रखे। वह काम कर डालिए।
उसने आपसे जो कहा, वह किसी एक व्यक्ति से कहिए। हो सकता है वे ख़ुद आपसे कहें — और सुनाइए।
चार आदतें आपके घर की हवा में, आपकी गली में, आपके नगर में घुल जाएँ। आप इन्हें कर रहे हैं, यह बात ही भूल जाएँ — इतना वे आपका हिस्सा बन जाएँ।
क़ीमत आएगी। उसके साथ पोषण भी आएगा। जिन लोगों से आप प्रेम करते हैं, वे इस रास्ते पर आपके साथ चलेंगे।
जो हम भूल चुके हैं, वह हमें फिर याद आ जाए। आपकी अपनी पीढ़ी में तीसरा मार्ग आम मसीही ज़िंदगी बन जाए।
यह सब आपके लिए माँग रहा हूँ। क्योंकि अपने लिए भी यही माँगा था, और प्रभु भरोसे के लायक़ ही निकला। आपके लिए भी वह वफ़ादार ही रहेगा।
आपको साथ चलनेवाले चाहिए। कोई गॉस्पेल मूवमेंट टीम ढूँढ़िए, किसी एक को कोचिंग दीजिए, किसी और से कोचिंग लीजिए। यह रास्ता अकेले चलने के लिए बना ही नहीं है।
रास्ते में कहीं भी आपको ऐसा लगे कि अपने ही लोगों से ज़्यादा लोगों की ज़िम्मेदारी प्रभु आप पर रख रहा है। या ऐसा लगे कि वह आपके चारों ओर रखे सामान्य शिष्यों की सेवा करने को कह रहा है, और एक पूरे नगर के लिए एक साधारण रसोई की मेज़ पर बैठनेवाली छोटी वाचा-टीम बन जाने को कह रहा है। तो भी, उसके माँगने से पहले उसकी ओर हाथ मत बढ़ाइए। जब वह माँगेगा, आपको ख़ुद पता चल जाएगा। और वहाँ तक जाने का रास्ता भी यही है जिस पर आप अभी चल रहे हैं।
इसलिए, शुरू कीजिए।
जेम्स पॉल
अगर दूसरों को आगे भेजने की तड़प आपमें हो2 मिनट
आप इस पुस्तक के अंत तक आ गए। आपमें से बहुत-से इसे बंद करके, जिन्हें आप पहले से जानते हैं उन्हें बताने के उस मामूली, वफ़ादार काम में उतरने को तैयार हैं। आप वैसे हैं, तो परमेश्वर के साथ जाइए।
पर आपमें से कुछ को अब तक कुछ और ही लग रहा होगा। आपके चारों ओर जो थोड़े लोग अभी-अभी शुरू कर रहे हैं, उनकी ओर भीतर कुछ धीरे-धीरे खींचता हुआ। कुछ बड़ा चलाने का नहीं, बल्कि उन्हें पास लाकर, कुछ समय उनके साथ खड़े रहकर, फिर आपके बिना ही वे आगे चल सकें — ऐसा कर देने का एक बोध, बस इतना। वह आपके भीतर हिल रहा है, तो एक दूसरी पुस्तक है। वह लिखी ही आपके लिए गई है।
उसका नाम है The Making of a Movement Catalyst (मूवमेंट अगुवे की तैयारी)। तीसरा मार्ग शृंखला की यह दूसरी पुस्तक है। वह सीखने के लिए एक और बड़ी व्यवस्था आपके सिर पर नहीं रखती, सरलता ही आपके हाथ में लौटा देती है। इस पूरे काम में भूमिकाएँ दो ही हैं, पाँच नहीं। आपको भेजने से पहले प्रभु ने आपसे प्रेम किया। वही प्रेम पहले है। वह पुस्तक तरीक़े को जितना महत्त्व देती है, आपके थके हुए प्राण की भी उतनी ही मज़बूती से परवाह करती है। क्योंकि यह काम धीमा है, साथ मिलकर करने का है, और अपनी क़ीमत के बारे में ईमानदार है।
आज ही रात तय करने की ज़रूरत नहीं। वह खिंचाव सच्चा हो, तो कल भी वह वहीं तैयार मिलेगा। वफ़ादार बने रहने के लिए आपको दूसरी पुस्तक की ज़रूरत नहीं। और आगे जाना चाहें, तभी वह वहाँ है। जो भी हो, बिना किसी बोझ के, निश्चिंत होकर इस पुस्तक को बंद करके रख दीजिए। जो आपको पहले ही मिल चुका है, वह काफ़ी है।
डिस्कवरी ग्रुप2 मिनट
सवाल
कुछ दोस्त, एक खुली बाइबल, और ये सवाल — बस इतना। सरल रखिए। शब्दों को अपने लोगों के हिसाब से बदल लीजिए। न बदलने योग्य सिर्फ़ चार आदतें हैं — सामान्य शिष्य, परमेश्वर की आवाज़ सुनना, परमेश्वर की आज्ञा मानना, दूसरों की भी ऐसा करने में मदद करना।
मिलना। एक-एक करके बताइए — "इस हफ़्ते किस बात के लिए धन्यवादी हैं? क्या बोझ है? पिछली बार आपने जो करने को कहा था, वह कैसा रहा?" फिर एक पल चुप रहकर, प्रभु से बोलने को कहिए। वह बोलेगा।
खोजना। पाठ को ज़ोर से पढ़िए। कम से कम एक व्यक्ति, और समय हो तो हर एक, उसे अपने शब्दों में दोहराए। तब वह कहानी किसी का भाषण न रहकर, हर एक की अपनी बन जाती है। फिर मिलकर पूछिए — "यह पाठ परमेश्वर के बारे में क्या दिखा रहा है? मनुष्यों के बारे में क्या दिखा रहा है? इसे सुनते हुए प्रभु आपसे क्या कह रहा है? क्या दिखा रहा है? कोई शब्द, कोई दृश्य, कोई बोध?" जो सुना, वह सीधे कह दीजिए, और वह प्रभु की ओर से ही है या नहीं — यह पूरा ग्रुप मिलकर परखे। फिर — "इस हफ़्ते आप क्या बदलाव करेंगे?"
भेजना। "इस हफ़्ते हम एक-दूसरे की क्या मदद कर सकते हैं? इस कमरे के बाहर हम किसकी सेवा कर सकते हैं? यह बात किससे कहने के लिए प्रभु आपके मन में डाल रहा है?" किससे कहने जा रहे हैं, वह नाम ज़ोर से कहिए, और जाकर करने के लिए एक-दूसरे को भेज दीजिए।
आपमें से कुछ ऐसी परंपरा से आए हैं जो प्रभु की उपस्थिति में ठहरकर उसकी आवाज़ सुनती है। कुछ ऐसी परंपरा से जो निकलकर जाती है और भेजती है। यह छोटा साधन इन दोनों को एक साथ थामने के लिए ही बना है। क्योंकि सुनना भेजने को बल देता है, और सुनी हुई बात को काम में उतारने का रास्ता भेजना ही देता है।
इस पुस्तक के दो साधनों के लिए एक धन्यवाद की बात। यहाँ दिया गया डिस्कवरी ग्रुप ग्लोबल कवनेंट का रूप है। इसे गढ़ा सिमोना दर्शनी और ग्लोबल कवनेंट के सामान्य शिष्यों ने। उन्होंने ही इसे बरसों पूरे भारत में पहुँचाया। डिस्कवरी की पद्धति के जो और बुज़ुर्ग हैं, उनके नाम इस पुस्तक में पहले ले चुका हूँ। आगे आनेवाली कहानी-शृंखलाएँ हमारी टीम के फ़िल एलेसी ने जोड़ीं। यह सब इस्तेमाल करने और दूसरों के साथ बाँटने के लिए मुफ़्त दे रहे हैं।
डिस्कवरी कहानी-शृंखलाएँ3 मिनट
शुरू करने के लिए यहाँ चार डिस्कवरी कहानी-शृंखलाएँ हैं — फ़िल एलेसी की जोड़ी तीन शृंखलाएँ, और उनके साथ सृष्टि से मसीह तक शृंखला। हफ़्ते में एक कहानी पढ़िए और डिस्कवरी ग्रुप के सवाल पूछिए।
परमेश्वर की दी हुई आशा — दस कहानियाँ
ज़रूरत में पड़े लोगों से यीशु के मिलने की दस कहानियाँ। यीशु कौन है यह अभी न जाननेवाले नए ग्रुपों के लिए अच्छी शुरुआत।
- यीशु चंगा करता है (मरकुस 2:1-12)
- नीकुदेमुस को यीशु की शिक्षा (यूहन्ना 3:1-17)
- बदल गया एक जीवन (मरकुस 5:1-20)
- न भूलनेवाला काम (लूका 7:37-50)
- खोए हुए बेटे का लौटना (लूका 15:11-32)
- कृतज्ञता (लूका 17:11-19)
- परमेश्वर क्या देखता है (लूका 18:9-14)
- वह तेरे घर आ रहा है (लूका 19:1-10)
- परमेश्वर के लिए प्यास (यूहन्ना 4)
- परमेश्वर की आवाज़ सुनना (मरकुस 4:1-20)
परमेश्वर का प्रेम — बारह कहानियाँ
- उसने स्वर्ग छोड़ा (यूहन्ना 1:1-18)
- चरनी में जन्मा (लूका 2:1-20)
- परीक्षा का सामना किया (मत्ती 4:1-11)
- वह हमें चलाता है (मत्ती 5:1-16)
- कठिनाइयाँ सहीं (लूका 9:57-62)
- हमारे लिए प्रार्थना की (यूहन्ना 17:1-26)
- उसे पकड़कर मुक़दमा चलाया (मरकुस 14:43-65)
- हमारे लिए मरा (मरकुस 15:22-47)
- फिर जी उठा (यूहन्ना 20:1-23)
- वह हमें भेज रहा है (मत्ती 28:16-20)
- वह हमारे लिए फिर आएगा (प्रेरितों के काम 1:1-11)
- अपने पीछे आने को बुला रहा है (लूका 5:1-11)
परमेश्वर पर विश्वास — दस कहानियाँ
- विश्वास करना (यूहन्ना 3:1-17)
- घोषित करना (प्रेरितों के काम 16:16-34)
- इकट्ठा होना (प्रेरितों के काम 2:37-46)
- प्रेम करना (यूहन्ना 15:9-27)
- देना (मरकुस 12:41-44)
- क्षमा करना (लूका 7:37-50)
- प्रार्थना करना (मत्ती 6:5-15)
- गवाही देना (प्रेरितों के काम 1:1-11)
- सेवा करना (मरकुस 10:35-45)
- फलना और बढ़ना (मरकुस 4:1-20)
परमेश्वर की कहानी — सृष्टि से मसीह तक
बाइबल के पहले पन्नों से लेकर यीशु के जी उठने और स्वर्गारोहण तक चलनेवाली पूरी कहानी। परमेश्वर की कहानी अभी न जाननेवाले ग्रुप के लिए अच्छी शुरुआत।
सृष्टि की कहानी
- जगत की सृष्टि (उत्पत्ति 1:1-25)
- मनुष्य की सृष्टि (उत्पत्ति 2:4-24)
पतन
- पहला पाप (उत्पत्ति 3:1-13)
- दंड (उत्पत्ति 3:14-24)
- जलप्रलय (उत्पत्ति 6:1-9:17)
पुराने नियम में छुटकारा
- अब्राम से वादा (उत्पत्ति 12:1-8, 15:1-6)
- वेदी पर इसहाक (उत्पत्ति 22:1-19)
- फ़सह का वादा (निर्गमन 12:1-28)
- दस आज्ञाएँ (निर्गमन 20:1-21)
- बलिदानों की व्यवस्था (लैव्यव्यवस्था 4:1-35)
- यशायाह का पहले से दिखाया वादा (यशायाह 53)
नए नियम में छुटकारा
- यीशु का जन्म (लूका 1:26-38, 2:1-20)
- यीशु का बपतिस्मा (मत्ती 3, यूहन्ना 1:29-34)
- मसीह की परीक्षा (मत्ती 4:1-11)
- नीकुदेमुस का आना (यूहन्ना 3:1-21)
- सामरी स्त्री (यूहन्ना 4:1-26, 39-42)
- यीशु की चंगाई (लूका 5:17-26)
- तूफ़ान को शांत करना (मरकुस 4:35-41)
- दुष्टात्माओं को निकालना (मरकुस 5:1-20)
- लाज़र को जिलाना (यूहन्ना 11:1-44)
- प्रभु भोज (मत्ती 26:26-30)
- पकड़वाया जाना और मुक़दमा (यूहन्ना 18:1-19:16)
- क्रूस पर मृत्यु (लूका 23:32-56)
- पुनरुत्थान (लूका 24:1-35)
- स्वर्गारोहण (लूका 24:36-53)
- उद्धार का निर्णय (यूहन्ना 3:1-21)
इस पुस्तक के बारे में4 मिनट
परमेश्वर की दया हमारे घर तक कैसे पहुँची, यह मैं आपको बताता हूँ। मैं पेट्रोल पंप पर काम करता हूँ। शुरू में हमारे घर में कोई यीशु को नहीं जानता था, और मैंने भी कभी बाइबल खोलकर नहीं देखा था। किसी ने बुलाया, तो एक छोटे-से ग्रुप में जाकर बैठ गया और देखता रहा, बस इतना ही। मेरी पत्नी बीमार पड़ी और डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए, तब उन लोगों ने प्रार्थना की — और वह ठीक हो गई। हमसे कहा गया था कि हमारे बच्चे नहीं होंगे; प्रभु ने हमें एक बेटा दिया। फिर पड़ोसी खुद आकर पूछने लगे। आज हम दोनों के बीच चार ग्रुप चल रहे हैं। इसमें मेरी कोई बड़ाई नहीं है, सब उन्हीं की दया है। मेरी इच्छा है कि यह पुस्तक आपके घर में भी वैसी ही दया ले आए।
अनिल, पेट्रोल पंप कैशियर
हमारी बहनें अपने आपको छोटा समझती हैं — यह मैं वर्षों से देखती आ रही हूँ। "वह तो बड़े लोगों का काम है, मुझसे नहीं होगा" — यह बात कितने ही मुँह से सुनी है। एक समय वह बात मेरे अपने मुँह से भी निकली थी। पर प्रभु ने हमारा ओहदा नहीं देखा, हमारा मन देखा। यह पुस्तक पढ़ते हुए मुझे लगा कि यह तो वही काम है जो हमारी माँओं और नानियों ने घर में ही किया था। यह हमारे लिए नई बात नहीं है — यह वह बात है जिसे हम भूल गए हैं। बहनो, इसे पढ़कर एक तरफ़ मत रख दीजिए। जो एक नाम आपके मन में आता है, उसी से शुरू कीजिए। प्रभु आपके घर को आशीष दे।
डॉ. मैरी एलिज़ाबेथ तातपूड़ी, डायमंड्स डॉटर्स
हमारी कलीसियाओं में प्रचार का जो स्थान है, उसका मैं आदर करता हूँ। इसलिए पहले मेरे मन में थोड़ा संदेह था। मुझे लगा कि अगर सदस्य खुद ही वचन पढ़ने लगेंगे तो प्रचार छोटा पड़ जाएगा। ऐसा नहीं हुआ। हमारी कलीसिया में ग्रुप शुरू होने के बाद, सदस्य रविवार को मेरे पास सवाल लेकर आने लगे। पूरे हफ़्ते पढ़कर, उस पर चलकर, वह अनुभव साथ लेकर आते हैं। अब मेरे प्रचार के लिए भूखे होकर आने वाले ज़्यादा हो गए हैं। साथी पास्टरों से मेरी विनती यही है। पहले आप पढ़िए, फिर दो-तीन परिवारों को दीजिए। प्रभु आपके झुंड को आशीष दे।
पास्टर नेरुसुला करुणाकर, कवनेंट चर्च
हमारे बुज़ुर्गों ने जो बीज बोया, आज हम उसी पर खड़े हैं। सेवकों को भेजना और उन्हें थामे रखना मेरी ज़िम्मेदारी है। इसलिए मैं जानती हूँ कि यह काम कितना माँगता है। हमारे सामने जितने ज़िले हैं, हर एक में एक सेवक भेजने की क्षमता हमारे पास नहीं है। फिर भी जिन गाँवों में हमने पैर तक नहीं रखा, वहाँ फ़सल बढ़ रही है। वहीं के लोग उसे उठाए हुए हैं। हमारे सेवकों की ज़रूरत घटी नहीं है — उनके हाथ और दूर तक पहुँच रहे हैं। सेवकाई में लगे लोगों से मैं बस एक बात कह सकती हूँ। परमेश्वर ने आपके अपने ही लोगों में आपके मनुष्यों को छिपा रखा है।
सिमोना दर्शनी, एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर, जीसीए
आराधना ख़त्म होने के बाद वह हॉल ख़ाली हो जाता है। उस चुप्पी को मैं अच्छी तरह जानता हूँ। गीत अच्छे हुए, बच्चों की आँखों में आँसू आए, हाथ उठे। उसके बाद? सोमवार को वे कहाँ होते हैं, यह मुझे पता नहीं। यह सवाल बहुत दिनों तक मेरा पीछा करता रहा। मैं समझता था कि परमेश्वर की उपस्थिति तक ले आना ही हमारा काम है। वहीं रुक नहीं जाना चाहिए — यह इस पुस्तक ने मुझे सिखाया। आराधना अगुवों और युवाओं के अगुवों से एक बात। हम जो गवाते हैं वह कुछ घंटों का है, वे जो जीते हैं वह पूरा हफ़्ता है। उस हफ़्ते में हमें भी उनके साथ जाना है।
प्रेम बेज्जला, आराधना अगुवा (वर्शिप लीडर)
धन्यवाद2 मिनट
सबसे पहले, प्रभु, तुझे ही मेरा धन्यवाद। इस काम को, इन लोगों को, और हमें रास्ते भर चलानेवाला तू ही है। जो माँगना भी मुझे नहीं आता था, वह तूने हमारे जीवन में किया।
सारा, चार आदतों के लिए मेरे पास शब्द बनने से पहले, तुम उन्हें जी रही थीं। काम में मेरी साथी, और लिखने में मेरा हौसला बनकर खड़ी रहीं। तुम्हें मेरा हार्दिक धन्यवाद।
सिमोना, शायना, अमीरा, जियाना, जेम्स, जोएल — तुम छहों मेरे जीवन का आनंद हो। इतने वर्षों तक अपने पिता को इस काम के साथ बाँटने के लिए तुम सबका धन्यवाद।
मेरे भाई जेसी पॉल, मेरी बहन वेल्मा एलिज़ाबेथ, मेरे चाचा सिम्पसन — मेरे पूरे जीवन में आप मेरे सहारे रहे।
पूरे दक्षिण एशिया में इस काम को उठाते आए ज़ोनल, रीजनल और एरिया कोऑर्डिनेटरों को, मास्टर ट्रेनरों को, राष्ट्रीय मिशनरियों को, और डिस्कवरी बाइबल स्टडी ग्रुप चला रहे सब सामान्य शिष्यों को धन्यवाद। ज़िलों के पार, इलाक़ों के पार इस काम को आगे ले जा रहे आप ही हैं। आपमें से कुछ के नाम, काम की सुरक्षा के कारण, यहाँ छाप नहीं पा रहा। आप भी मेरे परिवार का हिस्सा हैं।
सिमोना, मेरी सोने जैसी बेटी, दूसरों से हमने जो सीखा, उसे लेकर, इस पुस्तक में दिए गए डिस्कवरी ग्रुप और कोचिंग को कोई भी सामान्य शिष्य इस्तेमाल कर सके — इतना सरल तुमने ही बनाया। अब ग्लोबल कवनेंट को चला भी तुम्हीं रही हो। इसीलिए यह काम किसके हाथों में है, इस बात को लेकर मेरा मन शांत है।
1991 में मुझे पहली बार भेजनेवाले पास्टरों को, तब से मुझे गढ़ते आए बुज़ुर्गों को, और दशकों से अपनी प्रार्थनाओं और भेंटों से इस काम को चुपचाप खड़ा रखनेवाले दोस्तों और सहभागियों को — आपने भेजा, आपने खड़ा रखा, आपके बिना इनमें से कुछ भी नहीं है। धन्यवाद।
इस हिन्दी अनुवाद को धीरज से पढ़कर पन्ना-पन्ना सुधारनेवाले जितेन्द्र कुमार को — आपकी आँखों ने ही इस पुस्तक को भरोसे लायक़ बनाया।
किसी भी देश के, जिनकी आज्ञाकारिता किसी पत्रिका में कभी नहीं छपी, ऐसे सब सामान्य शिष्यों को धन्यवाद। मुझे आशा देनेवाले आप ही हैं। और आख़िर में पेरय्या जी को — आपके लोग ही मेरे लोग हैं। किसी डिग्री के लिए रुके बिना आगे बढ़ने के लिए धन्यवाद।
लेखक के बारे में2 मिनट
गॉस्पेल मूवमेंट पर लिखी क़रीब-क़रीब सारी पुस्तकें बाहर से आई हैं — यानी किसी मूवमेंट को शुरू होने में मदद करके, फिर हवाई जहाज़ पकड़कर घर लौटकर उसकी बात सुनानेवाले मेहमानों की पुस्तकें। पर जेम्स पॉल गॉस्पेल मूवमेंट के भीतर से ही लिख रहे हैं। ये उनके अपने लोग हैं, यह उनका अपना जीवन है।
जेम्स पॉल पाँचवीं पीढ़ी के मसीही हैं। तीन पीढ़ियों से उनका परिवार यही काम कर रहा है। माताओं, पिताओं, भाइयों, बहनों और पड़ोसियों को एक घर से दूसरे घर सुसमाचार पहुँचाते देखते हुए वे बड़े हुए। इस काम के लिए शब्द मिलने से पहले ही, उन्होंने इसे अपने माता-पिता से ही सीख लिया था। तीस वर्षों से इसी काम में रहते हुए, उन्होंने अपनी आँखों से देखा कि यह कुछ परिवारों से शुरू होकर अनगिनत घरों और गाँवों तक फैल गया।
समय के साथ, बरसों पहले जो सम्मेलन और तरीक़े उन्होंने ख़ुद शुरू किए थे, उन्हें उन्होंने एक तरफ़ रख दिया। क्योंकि वे उससे भी सरल एक विश्वास तक आ पहुँचे — यीशु की दी हुई महान आज्ञा सिर्फ़ पूरे समय के सेवकों के कंधों पर खड़ी रहने के लिए नहीं बनी, हर विश्वासी को उसे थामना है। मिशनरी का रास्ता, स्थानीय कलीसिया का रास्ता, और इन्हीं के बग़ल में चलनेवाले इस रास्ते को उन्होंने तीसरा मार्ग नाम दिया — सामान्य शिष्य, जहाँ वह पहले से जी रहा है वहीं, सुसमाचार को अगले व्यक्ति तक पहुँचाए। उन्होंने यह पाया — जाने की आज़ादी मिल जाए, तो सामान्य लोग सुसमाचार को उनकी कल्पना से कहीं दूर तक ले जाते हैं।
वह काम अब उन्होंने अपनी बेटी सिमोना के हाथों में सौंप दिया है। ग्लोबल कवनेंट को अब वे ही चला रही हैं। जेम्स अब दुनिया भर के मूवमेंट अगुवों और उनकी टीमों के साथ चल रहे हैं।
यह पुस्तक, इस काम को उठानेवाले सामान्य लोगों से उन्होंने जो सीखा, वही है। उनमें से एक बन जाइए — यह पुस्तक यही निमंत्रण है।
और जानने के लिए: thethirdway.global
तीसरा मार्ग सामान्य शिष्यों के लिए है, और उनके साथ चलने के लिए बुलाए गए लोगों के लिए भी। आप इसे किसी भी उम्र में पढ़ रहे हों, यह आप तक पहुँचे — उनकी यही आशा है।
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सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं। समीक्षाओं और आलोचनात्मक लेखों में उद्धृत कुछ छोटे वाक्यों को छोड़कर, लेखक की लिखित अनुमति के बिना इस पुस्तक का कोई भी भाग किसी भी रूप में पुनः मुद्रित या वितरित नहीं किया जा सकता।
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इस पुस्तक के पवित्रशास्त्र के अंश, उन स्थानों को छोड़कर जहाँ लेखक ने अपने ही शब्दों में कथा के रूप में कहा है, पवित्र बाइबल हिन्दी (BSI Old Version) से लिए गए हैं। © The Bible Society of India. अनुमति से प्रयुक्त।
पाठकों के लिए। इस पुस्तक में वर्णित कार्यकर्ताओं, समुदायों और परिवारजनों की सुरक्षा के लिए कुछ नाम, स्थान और पहचान से जुड़े विवरण बदले गए हैं। घटनाएँ सच्ची हैं।
हिन्दी प्रथम संस्करण: 2026
प्रकाशन: Global Covenant Press
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